Pratahkal - Lekh - Imran
मरिआना बाबर
अपने व्यक्तिगत अनुभव से मैं बता सकती हूं कि एक पुराने और घनिष्ठ मित्र के साथ हमेशा अच्छा और स्वस्थ संबंध बनाए रखना मुश्किल होता है, खासकर तब, जब वह एक महत्वपूर्ण राजनेता भी हो। यह तब और भी मुश्किल होता है, जब आप उनसे अलग हों और उनकी राजनीतिक भावना से सहमत न हों। एक कामकाजी पत्रकार (Journalist) के रूप में मैं किसी राजनीतिक पार्टी (Political party) का समर्थन नहीं करती और अपने स्वतंत्र राजनीतिक विचारों के लिए जानी जाती हूं।
लेकिन पाकिस्तान (Pakistan) तहरीक ए इंसाफ (पीटीआई) पार्टी की पूर्व मानवाधिकार मंत्री डॉ. शिरीन मजारी (Dr. Shireen Mazari) के साथ मेरी दोस्ती की इस हफ्ते परीक्षा हुई। पाकिस्तान के इतिहास के सबसे काले दिनों में से एक 9 मई के बाद जब पीटीआई कार्यकर्ताओं एवं समर्थकों के कारण पूरे मुल्क में दंगे, लूट और आगजनी की घटनाएं हुई थीं, तब मैंने शिरीन मजारी को एक संदेश भेजकर सावधान रहने के लिए कहा था ।
9 मई को वह अपने घर पर थीं और किसी आंदोलन में शामिल नहीं हुई थीं, लेकिन मैं देख रही थी कि पीटीआई (PTI) के शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ सरकार (Government) पूरी ताकत से टूट पड़ने वाली है। शिरीन मजारी पार्टी की वरिष्ठ उपाध्यक्ष थीं। जब पार्टी के कई नेताओं ने घर छोड़ दिया और सरकार की नजरों से छिपने लगे थे, तब शिरीन अपने घर पर ठहरी हुई थीं। वह उस वक्त इस्लामाबाद में ही थीं, जब पुलिस गिरफ्तारी (Police arrest) वारंट लेकर उनके पास आई और उन्हें गिरफ्तार करके रावलपिंडी के अदियाला जेल ले गई।
जेल में उन्हें सी श्रेणी में रखा गया था । जबकि उन पर कोई मुकदमा नहीं चलाया गया था और न ही अदालत से उन्हें सजा मिली थी, ऐसे में एक राजनेता और पूर्व मंत्री होने के नाते उन्हें ए या बी श्रेणी में रखा जाना चाहिए था ।
वैसे भी उनकी कोठरी गंदी थी और बिजली के पंखे काम नहीं कर रहे थे, जबकि भयानक गर्मी के इन दिनों में तापमान बहुत ज्यादा था । लेकिन 72 साल की इस उम्र में तबीयत बिगड़ने पर भी शिरीन ने शिकायत नहीं की। जैसे ही उनके मामले को उनके वकील ने अदालत में उठाया, उन्हें जमानत मिल गई। लेकिन जिस वक्त उन्होंने जेल से बाहर कदम रखा, उसी क्षण पुलिस ने उन्हें फिर से गिरफ्तार कर लिया। ऐसा पांच बार हुआ और कई बार ऐसा लगा, जैसे उनका अपहरण हुआ हो, क्योंकि कोई नहीं जानता था कि उन्हें कहां ले जाया गया है।
आखिरकार, मंगलवार को पीटीआई (PTI) को सबसे बड़ा झटका तब लगा, जब शिरीन मजारी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में घोषणा की कि वह पार्टी छोड़ रही हैं। पार्टी छोड़ने की घोषणा करते हुए उन्होंने कहा, बार-बार रिहाई और गिरफ्तारी तथा इससे मेरी बेटी को जिन मुश्किलों का सामना करना पड़ा, उसका असर मेरे स्वास्थ्य पर भी पड़ा, इन्हीं वजहों से मैंने फैसला किया है कि मैं सक्रिय राजनीति
(Politics)
छोड़ दूंगी। और मैं यह जोड़ना चाहती हूं कि आज से मैं पीटीआई या किसी अन्य राजनीतिक दल का हिस्सा नहीं बनूंगी।
इमरान खान की विवादास्पद गिरफ्तारी और 9 मई को हुई हिंसा के बाद से पूरे पाकिस्तान में, पीटीआई के दो दर्जन से अधिक नेताओं ने पार्टी छोड़ दी है। ये तमाम नेता पार्टी छोड़ने के लिए मजबूर करने के लिए शाहबाज शरीफ सरकार और सुरक्षा प्रतिष्ठान को दोषी ठहराते हैं। अपने समर्थकों के पार्टी छोड़ने से हैरान इमरान खान ने कहा, हम सभी ने पाकिस्तान में जबरन शादी के बारे में सुना था, लेकिन पीटीआई के लिए एक नई घटना सामने आई है - जबरन तलाक। मुझे इस बात से भी हैरानी हो रही है कि मुल्क के सभी मानवाधिकार संगठन आखिर कहां गायब हो गए हैं !
लेकिन इमरान खान को इस बात का एहसास नहीं है कि जब वह प्रधानमंत्री थे, तब मानवाधिकार संगठनों के वह बहुत खिलाफ थे। तब उन्होंने विपक्ष के नेताओं को बेरहमी से जेल में डाल दिया था, मीडिया के अधिकार छीन लिए थे और कई टेलीविजन चैनलों का प्रसारण बंद कर दिया था।
वैसे भी इस साल चुनाव होने की उम्मीद की जा रही है। इमरान का साथ छोड़ने वाले कई लोगों को इस बात का एहसास है कि पीटीआई के टिकट पर चुनाव जीतना इस बार मुश्किल होगा। वे शायद निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ेंगे या किसी अन्य राजनीतिक दल में शामिल होंगे। पार्टी से इस्तीफा देने वाले पीटीआई के कुछ सदस्य पहले ही पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) में शामिल हो गए हैं। ये राजनेता अपने निर्वाचन क्षेत्रों की गतिशीलता और सत्ता की संभावनाओं के बारे में जानते हैं।
हालांकि, अतीत में भी सुरक्षा प्रतिष्ठान ने पाकिस्तान मुस्लिम लीग एन (पीएमएल एन ) और पीपीपी जैसे राजनीतिक दलों को तोड़ने की कोशिश की है, लेकिन वे सफल नहीं हुए हैं।
इमरान खान के सामने अब जो समस्या है, वह उनके राजनीतिक अस्तित्व के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। उन्हें समझना होगा कि जिस लोकलुभावनवाद के साथ उन्होंने राजनीति की शुरूआत की थी, वह मौजूदा तरीके से जारी नहीं रह सकता है। उन्होंने एक ही समय में अपने राजनीतिक विरोधियों और सुरक्षा प्रतिष्ठान, दोनों को निशाने पर लेना शुरू कर दिया। उनके 9 मई के अभियान की विफलता के बाद, जिसमें उनके समर्थकों ने देश भर में सैन्य संस्थानों को निशाना बनाया था, शाहबाज शरीफ सरकार और सुरक्षा प्रतिष्ठान एकजुट हो गए हैं और वे मिलकर इमरान खान को निशाना बना रहे हैं।
अगर इमरान खान यह सोचते हैं कि उनका 9 मई का अभियान सेना में विभाजन पैदा करने वाला साबित हुआ, तो वह गलत हैं। सेना एक स्वर से एकजुट है और उसने ठान लिया है कि सार्वजनिक और निजी संपत्तियां बर्बाद करने वालों को वह नहीं बख्शेगी।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सत्ता परिवर्तन के अपने झूठे आख्यान और पीडीएम सरकार की गलत नीतियों से जनता के मोहभंग के कारण इमरान खान बड़े पैमाने पर जन समर्थन जुटाने में बेशक सफल रहे हों, लेकिन वह एक ठोस कार्यक्रम पर मजबूत राजनीतिक ढांचा बनाने में विफल रहे । राजनीतिक विश्लेषक पूछ रहे हैं कि क्या सच्चाई से सबक सीखने का इमरान खान का वक्त आ गया है?
Editorial

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