Suresh Goyal
रेलयात्रा : न्यूयार्क (New york) में वो अंतिम दिन था। अगली सुबह में चार दिन की रेल यात्रा (Train journey) पर निकलने वाला था। अभी तक तो राजा साथ था इसलिए कोई फिकर नहीं थी। अब चार दिन तक एकदम अकेले अमेरिका के पूर्वी छोर से पश्चिमी छोर तक 5 हजार किमी. की यात्रा करनी थी, दिल अभी से धक धक करने लगा था कि कैसे मैं यह कर पाऊंगा। अमेरिका (America) की क्रोस कन्ट्री रेल यात्रा का अनुभव लेने की मेरी बरसों की तमन्ना थी। पूर्व की यात्राओं में भी सोचा था मगर कर नहीं पाया था। लॉस एजलेस जाना था। न्यूयार्क से बस तथा ट्रेन से ही जाने की सोची। पर ट्रेन में स्लीपर रूम भी थे, मगर उनका टिकिट बहुत महंगा था। इसलिए चेयर बर्थ का ही टिकिट बुक कराया। इसकी सीटें लम्बी हो जाती थी इस कारण सीटों पर सोना आसान हो जाता था। इस बात की भी चिन्ता थी कि इन सीटों पर सो भी पाऊंगा कि नहीं, कहीं बदन अकड़ गया तो वगैरा वगैरा। मगर टिकिट बुक करा लिया था, मन में भी संकल्प था, इसलिए जो होगा देखा जायगा ठान कर चिन्ताओं को विराम दिया।
ट्रेन (Train) सुबह 6 बजे के पेन स्टेशन से रवाना होने वाली थी, इसलिए सुबह 4 बजे ही उठने की ठानी। मैं तो वैसे भी सुबह जल्दी उठता ही हूं। राजा व क्रिस को ही उठाना था। दोनों मुझे छोड़ने आने वाले थे। सारी पैकिंग रात को ही कर के सोये थे। मेरे पास दो बड़ी अटैचियां थी जो चेक इन में जाने वाली थी। यहां ट्रेनों में हवाई जहाज की तरह ही लगेज चेक इन होता है जो आपको गंतव्य पर जाकर मिल जाता है, रास्ते में आप कितनी ही ट्रेनें चेन्ज करो, सामान लादे लादे नहीं फिरना पड़ता।
मेरा टिकिट बुक कराया तो मुझे बताया गया कि मुझे शिकागो में ट्रेन बदलनी पड़ेगी। मैं चिन्ता में पड़ गया कि दो भारी भरकम अटैचियां और एक हाथ का बैग लेकर मैं कैसे ट्रेन चेन्ज करूंगा ? क्या पता कोई पुल चढ़ना-उतरना पड़े, लम्बा चलना पड़े, ट्रोली मिले ना मिले मगर जब यह पता चला कि सामान सीधे पहुंच जायगा तो राहत मिली। एक अन्य ट्रेन जो सुबह 10 बजे निकलती थी वह मैंने इसलिए नहीं ली थी क्योंकि वह दो बार बदलनी पड़ती थी, पहले वाशिंगटन में और फिर शिकागो में अब सुबह जल्दी निकलना पड़ रहा था तो मैं यही सोच रहा था कि 10 बजे वाली ट्रेन ही ले लेता तो अच्छा था।
सुबह में और क्रिस तो समय पर तैयार हो गए मगर राजा ने देर कर दी। वापस उसी दिन जैसा टेन्शन हो गया, जिस दिन बफेलो गये थे। तेज गति से गाड़ी चलाने का टिकिट जेब में था, फिर भी परवाह किये बिना वह गाड़ी भगाये जा रहा था। इतनी सुबह मेनहट्टन जाने वाला ट्राफिक गजब था, ऐसे में टोलनाके पर रूकने का एक एक पल भारी पड़ता जा रहा था।
सुरंग पार कर हम मेनहट्टन में प्रवेश हुए। पेन स्टेशन के आसपास कहीं पार्किंग नजर नहीं आ रही थी, समय होता जा रहा था, राजा ने स्टेशन के समक्ष गाड़ी रोकी, सामान उतारा, मुझे और क्रिस को उतारा और क्रिस को यह कहकर कि वो चक्कर लगा रहा है, तुम दादा को छोड़कर जल्दी आ जाओ, गाड़ी आगे बढ़ा दी।
एक अटैची और बैग मैंने लिया, एक अटैची और बेग क्रिस ने लिया। हाथ के सामान के दो बैग थे, दोनों भारी थे। इनमें चार दिन के कपड़े, दवाईयां, टायलेट का सामान, खाने-पीने के पुड़के वगैरा भर दिये थे क्यूंकि यही साथ रहने वाले थे, अटैचियां तो चौथे दिन लॉस एंजलेस पहुंचकर मिलने वाली थी।
पेन स्टेशन अत्यन्त व्यस्त स्टेशन है। यह भूमिगत है। यहां से कनाड़ा तथा मैक्सिको हेतु अन्तर्राष्ट्रीय ट्रेनें भी चलती है। न्यूयार्क का मेट्रो स्टेशन भी यहीं है। हमें सामान के साथ एस्केलेटर से नीचे उतरना था। एस्केलेटर बहुत नीचे तक था, इसे देख कर ही मेरी जान सूख गई। क्रिस तो सामान लेकर दूसरे एस्केलेटर से एकदम उतर गई। उसे देखकर मेरी भी हिम्मत बढ़ी, मैं सामान घसीटकर एस्केलेटर पर खड़ा हो गया, बाकी काम उसी ने कर दिया, सामान को खींच नीचे उतरने लगा।
स्टेशन पर बहुत भीड़ थी। इतने लोग आ जा रहे थे कि पता ही नहीं चल रहा था कि किधर जाना है। क्रिस को वापस लौटने की जल्दी थी क्यूंकि राजा गाड़ी में प्रतीक्षा कर रहा था, वह सामान मेरे पास छोड़, मुझे गले लगा चली गई, जाते- जाते यह जरूर कह गई कि एम ट्रेक के बोर्ड देखकर आगे बढ़ते रहना। उसके जाते ही मैं अनाथ सा महसूस करने लगा। कलेजा मुँह को आ गया
मैंने स्वयं को संयत किया। एक हाथ में एक, दूसरे हाथ में दूसरी अटैची त दोनों कंधों पर दोनों बैग लेकर एम ट्रेक के बोर्ड देखते हुए आगे बढ़ा। शीघ्र ही में एम ट्रैक के परिसर में पहुँच गया। भीड़ कम हो गई थी। यहां सिर्फ एम ट्रैक से यात्रा करने वाले लोग ही थे।
जगह जगह टी.वी. लगे हुए थे जिन पर विभिन्न ट्रेनों के नाम, उनके रवाना होने का समय और उनकी ट्रेक संख्या लिखी हुई थी। मेरा लास एंजलेस का टिकट था पर उसका तो नाम कहीं था ही नहीं। मैंने सोचा में गलत स्थान पर आ गया हू आगे बढ़ा तो सब जगह यही सूचना प्रदर्शित हो रही थी। इनके साथ ट्रेन संख्या भी आ रही थी। मैंने अपने टिकिट में ट्रेन संख्या देखी तो उस नं. की ट्रेन की रवानगी का समय आ रहा था मगर उसका गंतव्य शिकागो ही था। अब मुझे समझ में आया, यह ट्रेन शिक गो तक ही जा रही थी इसलिये उसी का नाम था। यह जानकारी मिलने के बाद थोड़ी तसल्ली हुई मगर चेक इन करने वाला सामान अभी तक मेरे हाथ में ही था। एक काउन्टर पर बैठी महिला को मैंने टिकिट बताया और सामान चेक इन कहां कराना है पूछा तो वह फटाफट कुछ बोली और एक तरफ बैठने का इशारा कर दिया तो मैं उधर जाने लगा, मेरे हाथ में सामान देख कर उसने पूछा कि इसे चेक इन नहीं कराना क्या? इस बार उसकी बात मेरे पल्ले पड़ गई। मैंने हो कहा तो उसने दूसरी तरफ जाने और वापस यहीं आकर बैठ जाने को कहा।
मैं सामान ले उस तरफ बढ़ा तो सामने बेगेज चेक इन लिखा था। अपना टिकिट बता दोनों अटेचियां दे दी तो उसने तुरन्त दो टिकिट दे दिये और बोला कि यह सामान लोस एंजलेस में ले लेना। मैं हाथ के दोनों बेग लेकर वापस उस महिला के काउन्टर के पीछे आकर बैठ गया। यहां अन्य कई यात्री बैठे थे। सामान का चेक इन जिस तरह मिनटों में इतनी सहजता से हो गया था मैं हतप्रभ रह गया।
न्यूयार्क के दो बड़े स्टेशन हैं, एक पेन और दूसरा ग्राण्ड सेन्ट्रल। दोनों बहुत पुराने हैं। यहां से लम्बी व छोटी दूरी की ट्रेनें चलती हैं साथ ही लोकल ट्रेनों के भी यही स्टेशन है। मैनहटन एक द्वीप है जिसके एक तरफ समुद्र है और तीन तरफ नदियां। इसमें आने के लिये भूमिगत मार्ग हैं। यहां लोकल ट्रेनें भी भूमिगत ही चलती हैं। न्यूयार्क के अधिकांश भाग में लोकल ट्रेनें भूमिगत चलती हैं, कहीं कहीं एलीवेटेड हैं तो कहीं कहीं जमीन पर भी चलती है।
दुनिया के अधिकतम घने बसे शहरों जो समुद्र की खाड़ी में अवस्थित हैं वहां लोकल ट्रेनें भूमिगत ही चलती है। हमारा मुम्बई शहर भी खाड़ी पर ही अवस्थित है। नीले परबत बरफानी झीलें मगर अंग्रेजों ने भेदभाव करते हुए व ज्यादा खर्चे से बचने के उद्देश्य से यहां भूमिगत लोकल ट्रेनों की स्थापना नहीं की। आज से सौ सवा सौ साल पहले ही मुम्बई की लोकल ट्रेनें भूमिगत हो जाती तो सोच लो इस शहर ने और कितना अधिक विका कर लिया होता। यह दुर्भाग्य की बात है कि आजादी के बाद भी सरकारों ने भी इस तरफ ध्यान नहीं दिया और अंग्रेजों द्वारा छोड़े गये रेलों के ढांचों में ही थोड़ा बहुत बदलाव कर काम चलाते रहे। केन्द्र में मोदी सरकार के आने के बाद अब जरूर जाकर इस दिशा में प्रयत्न किये जा रहे हैं, देखना होगा कि ये प्रयत्न कार्यरूप में कब परिणित होते है।

Editorial

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