Pratahkal - Lekh - Stop on revadi culture
राहुल वर्मा
कर्नाटक (Karnataka) में नवगठित कांग्रेस सरकार ने सत्ता संभालते ही चुनाव में किए गए पांच वादों को सैद्धांतिक स्वीकृति प्रदान की है। इन पांच वादों में हर गृहिणी को 2,000 रूपये प्रति माह भत्ता और घर को 200 यूनिट बिजली मुफ्त दी जानी है। गरीब परिवारों को हर महीने 10 किलो चावल और महिलाओं को निःशुल्क बस यात्रा की सुविधा मिलेगी। वहीं, डिप्लोमाधारक बेरोजगारों को हर माह 1,500 और डिग्रीधारकों को 3,000 रूपये का बेरोजगारी भत्ता दिया जाएगा। एक मोटे अनुमान के अनुसार इन पांच वादों की पूर्ति के चलते राज्य सरकार (State Government) के खजाने पर हर साल करीब 50,000 करोड़ रूपये का बोझ पड़ेगा।
वित्त वर्ष 2022-23 के लिए कर्नाटक के बजट में 61,564 करोड़ रूपये के राजकोषीय घाटे का अनुमान लगाया गया जो राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) के 3.26 प्रतिशत के बराबर है। ऐसे में 50,000 करोड़ रूपये के अतिरिक्त व्यय से राज्य के खजाने पर बढ़ने वाले भारी बोझ का सहज ही आकलन किया जा सकता है।
बहरहाल, कांग्रेस (Congress) को कर्नाटक में मिली चुनावी (Election) सफलता के बाद अन्य राज्यों में भी राजनीतिक दलों ने इस तरह की लोकलुभावन पेशकश शुरू कर दी हैं । इससे पहले दिल्ली (Delhi) और पंजाब में आम आदमी पार्टी ने इसे सफलता का राजनीतिक सूत्र बना लिया। वहीं, अब कर्नाटक की कामयाबी से उत्साहित होकर कांग्रेस ने मध्य प्रदेश
(Madhya Pradesh)
से लेकर हरियाणा में इस तरह की योजनाओं का एलान किया है। हरियाणा में तो कांग्रेस ने 100 गज के प्लाट तक देने का एलान किया है। आखिर जमीन जैसे दुर्लभ संसाधन को लेकर कोई पार्टी किस प्रकार ऐसा वादा कर सकती है। खासतौर से शहरी इलाकों में।
ऐसे में आगामी आम चुनाव से पहले इस प्रकार की घोषणाओं की बाढ़ आ सकती है। यह देश की आर्थिक स्थिति के लिए शुभ संकेत नहीं। भारतीय रिजर्व बैंक पूर्व में भी कई राज्यों को अनावश्यक खर्चों के लिए चेता चुका है। ऐसे में क्या यह नहीं सोचा जाना चाहिए कि चुनावी घोषणापत्रों को व्यावहारिक बनाने की दिशा में मंथन शुरू किया जाए। चूंकि रेवड़ियां बांटने में कोई भी दल किसी से पीछे नहीं है तो इसमें कोई सर्वमान्य हल आसानी से निकलता हुआ नहीं दिखता। इस मामले में चुनाव आयोग भी दलों के लिए कोई बाध्यकारी प्रविधान नहीं बना सकता।
वहीं उच्चतम न्यायालय ने भी 2013 में कह दिया कि वह इसमें कोई व्यवस्था नहीं बना सकता और उसने गेंद राजनीतिक दलों के पाले में डाल दी, लेकिन दलों के स्तर पर इस विषय में कोई गंभीरता नहीं दिखती। कांग्रेस द्वारा पुरानी पेंशन योजना के जिन्न को बोतल से बाहर निकालना इसका एक बड़ा उदाहरण है, जिसकी आलोचना कांग्रेस की ओर झुकाव रखने वाले बुद्धिजीवी भी कर चुके हैं।
क्या मुफ्त उपहारों की पेशकश ही चुनावों में निर्णायक सिद्ध होकर किसी दल को सत्ता दिलाने में सहायक होती है। कर्नाटक के हालिया उदाहरण को ही देखें तो वहां केवल कांग्रेस ने ही नहीं, बल्कि भाजपा और जनता दल- सेक्युलर ने भी कमोबेश इसी प्रकार के वादे किए थे। स्पष्ट है कि चुनाव में केवल यही घोषणाएं ही मायने नहीं रखतीं । इस सिलसिले में 2015 में हमने दिल्ली में एक शोध किया था । शोध में शामिल एक समूह ने माना कि बिजली और पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं उन्हें मुफ्त में मिलेंगी तो अच्छा है। वहीं जब उन्हें यह बताया गया कि इन सुविधाओं से सरकारी खजाने पर करीब 500 करोड़ रूपये बोझ बढ़ेगा तो मुफ्त सुविधाओं को पसंद करने वालों की संख्या में लगभग 20 प्रतिशत की कमी आ गई।
स्पष्ट है कि यदि जनता में इसे लेकर जागरूकता का प्रसार होगा तो संभव है कि राजनीतिक दलों को भी अपनी रणनीति बदलनी पड़ेगी। भले ही इस मामले में चुनाव आयोग और उच्चतम न्यायालय ने अपने लिए लक्ष्मण रेखा खींच दी हो, लेकिन कहीं न कहीं जनता, नागरिक समाज और राजनीतिक दलों सहित समूचे तंत्र से जुड़े अंशभागियों को इस मुद्दे का कोई कारगर हल निकालना होगा। जनता को राजनीतिक दलों से यह प्रश्न करना चाहिए कि इन वादों को पूरा करने के लिए वित्तीय संसाधन कहां से आएंगे, क्योंकि इसमें केवल वर्तमान की राजनीति का ही नहीं, बल्कि भविष्य के आर्थिक संतुलन का भी सवाल है। तब शायद दलों को इन वादों के साथ ही उन्हें पूरा करने की कार्ययोजना भी प्रस्तुत करनी पड़े और फिर जनता उसी आधार पर निर्णय करे।
फिलहाल लोकलुभावनवाद को लेकर प्रतिस्पर्धा जारी है, जिसमें सभी दल बड़े-बड़े वादे कर रहे हैं, परंतु वित्तीय संसाधनों के अभाव में राज्य उन्हें पूरा करने के लिए केंद्र से मदद की गुहार लगाने से भी गुरेज नहीं करते। जैसे पंजाब की कमान संभालते ही मुख्यमंत्री भगवंत मान ने केंद्र से 50,000 करोड़ रूपये का पैकेज मांगा। सीमित संसाधनों और वित्तीय अनुशासन को देखते हुए केंद्र सरकार के लिए ऐसे प्रस्तावों से इन्कार स्वाभाविक है।
केंद्र की ऐसी प्रतिक्रिया को लेकर भी कुछ राज्यों में आक्रोश है, क्योंकि उनका मानना है कि जीएसटी के बाद करों के मोर्चे पर उनके पास अधिकार नहीं बचे। उन्हें करों में उनके योगदान के अनुपात में राजस्व साझेदारी में हिस्सेदारी नहीं मिलती। इस मामले में दक्षिण के राज्यों की शिकायत है कि कर संग्रह में उनका योगदान अधिक होने के बावजूद संसाधन आवंटन उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों को ज्यादा होता है। संसाधनों की साझेदारी को लेकर तमिलनाडु के पूर्व वित्त मंत्री औपचारिक रूप से अपना पक्ष भी रख चुके हैं।
स्पष्ट है कि यदि रेवड़ी संस्कृति पर विराम लगाना है तो राजनीतिक दलों को अपना सुविधावादी दृष्टिकोण त्यागना होगा। एक राजनीतिक दल को मुफ्त उपहारों से जुड़ी अपनी योजना तो कल्याणकारी लगती है, लेकिन दूसरे दल की योजना रेवड़ी नजर आती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी खुद एक ओर रेवड़ी संस्कृति से मुक्ति की बात करते हैं, लेकिन ऐसी पेशकशों के मामले में उनकी पार्टी भाजपा भी पीछे नहीं रहती । निःसंदेह, रेवड़ी संस्कृति पर अंकुश लगाना समय की मांग है, लेकिन इसके लिए सभी को जिम्मेदारी का भाव और संवेदनशीलता का परिचय देना होगा। अन्यथा भारत को विकसित देश बनाने का जो स्वप्न हम देखते हैं, वह पूरा होना कठिन होता जाएगा ।

Editorial

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