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हर मुकाबले में परचम लहराती बेटियां
By EditorialPublished on
यह मेहनती लड़कियों की बड़ी कामयाबी का दौर है। सिविल सेवा परीक्षा 2022 (Civil Services Exam 2022) के नतीजे संघ लोक सेवा आयोग ने जारी कर दिए । गौर कीजिए, इशिता किशोर ने इस परीक्षा में टॉप किया है, तो दूसरे स्थान पर गरिमा लोहिया रहीं, तीसरे स्थान पर उमा हरति और चौथे स्थान पर स्मृति मिश्रा मतलब, शीर्ष चार स्थानों पर बेटियों ने अपने परचम लहरा दिए। जिस प्रजातंत्र के गलियारे में महिला सांसद 33 प्रतिशत आरक्षण के लिए वर्षों से जूझ रही हैं, वहीं, स्कूलों से शीर्ष प्रतियोगिताओं तक तमाम परीक्षाओं में लड़कियों की जीत सु

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नन्दितेश निलय
यह मेहनती लड़कियों की बड़ी कामयाबी का दौर है। सिविल सेवा परीक्षा 2022 (Civil Services Exam 2022) के नतीजे संघ लोक सेवा आयोग ने जारी कर दिए । गौर कीजिए, इशिता किशोर ने इस परीक्षा में टॉप किया है, तो दूसरे स्थान पर गरिमा लोहिया रहीं, तीसरे स्थान पर उमा हरति और चौथे स्थान पर स्मृति मिश्रा मतलब, शीर्ष चार स्थानों पर बेटियों ने अपने परचम लहरा दिए। जिस प्रजातंत्र के गलियारे में महिला सांसद 33 प्रतिशत आरक्षण के लिए वर्षों से जूझ रही हैं, वहीं, स्कूलों से शीर्ष प्रतियोगिताओं तक तमाम परीक्षाओं में लड़कियों की जीत सुखद और उत्साह से लबरेज है।
सिविल सेवा परीक्षा को हिन्दुस्तान में सबसे कठिन माना जाता है, पर लड़कियों ने मानो, इसे बहुत आसान बना दिया है। एक समय वह भी था, जब लड़कियों ने पुरूष वर्चस्व वाले समाज की तमाम बाधाओं के बीच सिर उठाकर जीना और अपने सपनों को साकार करने के लिए संघर्ष शुरू किया था। तभी तो आज जब परीक्षा परिणाम आते हैं, तो लगता है, लड़कियों की पिछली पीढ़ियों की मेहनत सफल होने लगी है। पिछले सप्ताह सीबीएसई बोर्ड (CBSE) की 10वीं और 12वीं की परीक्षाओं के परिणामों में एक बार फिर लड़कियों का दबदबा रहा और लड़कों की अपेक्षा लड़कियों ने ज्यादा प्रतिशत अंक हासिल किए। जहां 12वीं में छात्राओं के पास होने का प्रतिशत 90.68 फीसदी रहा, वहीं 12वीं की बोर्ड परीक्षा में 84.67 फीसदी लड़के पास हुए। 10वीं में 94 फीसदी लड़कियां पास हुईं और 92.72 फीसदी लड़के।
जब भारतीय संविधान का मसौदा तैयार किया जा रहा था, तब संविधान सभा में सिर्फ 15 महिला सदस्य थीं, जो एक बेहतर भारत के लिए अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए दृढ़ थीं। तब संविधान सभा में विद्वान पुरूषों और महिलाओं के बीच समानता की आवाज कड़वी के बजाय मीठी हो गई थी और अब हम उस मिठास को लगभग हर क्षेत्र में महसूस करने लगे हैं। यह संभावना पहले से ही थी कि लड़कियों को मौके मिलेंगे, तो वे निःसंदेह आगे आकर खुद को साबित करेंगी। यह लड़कियों की मजबूती की ज्यादातर देशों में यह महसूस किया जा रहा है।
अगर हम वार्षिक यूनेस्को लैंगिक - रिपोर्ट देखें, जिसमें एक वैश्विक तस्वीर पेश करने के लिए प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा में 120 देशों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है। निष्कर्ष यह निकला कि प्रारंभिक वर्षों में लड़के गणित में लड़कियों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन करते हैं, लेकिन बाद में यह अंतर गायब हो जाता है। यह शोध इस बात की भी पुष्टि करता है कि सबसे गरीब देशों में भी अब सीखने में लैंगिक अंतर बहुत कम हो गया है। अनेक देश हैं, जहां लड़कियां आगे हो गई हैं। जैसे कक्षा 8 तक गणित के परिणाम लड़कियों के पक्ष में दिखे हैं, जैसे मलयेशिया (Malaysia) में 7 प्रतिशत अंक, कंबोडिया में 3 अंक, कांगो में 1.7 अंक और फिलीपींस में 1.4 अंक के आनुपातिक अंतर से लड़कियां आगे निकल गई हैं। जो मध्यम व उच्च आय वाले देश हैं, उनमें भी माध्यमिक विद्यालय में लड़कियां विज्ञान में भी ज्यादा अंक लाने लगी हैं। हालांकि, इसके बावजूद वैज्ञानिक करियर चुनने की उनकी संभावना अब भी कम है । इसका मतलब है, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग व गणित ( एसटीईएम मतलब स्टेम) क्षेत्रों में लड़कियों की आगे की शिक्षा में पक्षपात या भेदभाव बाधा बन रहा है।
नई सदी में अगर हम भारत की बात करें, तो अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस के मुकाबले भारत में 'स्टेम' में लड़कियां शानदार प्रदर्शन कर रही हैं। 'स्टेम' में लड़कों की संख्या कम हो रही है, जबकि लड़कियों की संख्या बढ़ रही है। विश्व बैंक के भी अनुसार, स्टेम में भारतीय महिलाओं की संख्या अनेक विकसित देशों से ज्यादा है। मीके वैन हाउते के एक शोध का विषय था, 'लड़कियों की तुलना में लड़के स्कूल में कम अंक क्यों हासिल करते हैं = लड़कों और लड़कियों की शैक्षणिक संस्कृति में अंतर'। शोध में फ्लैंडर्स (बेल्जियम) के 34 स्कूलों के माध्यमिक शिक्षा के तीसरे और चौथे वर्ष के 3,760 विद्यार्थियों के डाटा का उपयोग किया गया और पाया गया कि लड़कियों को मिलने वाली संस्कृति की तुलना में लड़कों को मिलने वाली संस्कृति कम अध्ययन उन्मुख है । मतलब, लड़कियों के बीच जो संस्कृति विकसित हो रही है, वह पढ़ाई की ओर ज्यादा झुकी हुई है। नई सदी में लड़कियों ने समझ लिया है कि वे पढ़ाई से एक बड़ा अंतर या बड़ी कामयाबी हासिल कर सकती हैं।
यहां लड़कों की योग्यता को कतई कम नहीं आंका जा रहा, सिर्फ लड़कियों की कामयाबी को परखने की कोशिश है। तमाम तरह की सामाजिक, आर्थिक, दैहिक मुश्किलों के बीच जब लड़कियों ने सपने देखे होंगे, साथ ही, पिता-माता के सम्मान व मूल्यों की परवाह की होगी, तभी बड़े कमाल संभव हो पाए हैं। लड़कियों के पास सेवा, सहनशीलता और साहस जैसे मूल्य तो आमतौर पर रहे हैं । यह कहना गलत नहीं कि स्त्री जब अपनी हीनता- बोध से बाहर निकलती है, तो सिर्फ उड़ान भरती है। समय आ गया है, हम इस उड़ान को सकारात्मक बल प्रदान करें।
जब स्वामी विवेकानंद से किसी पत्रकार ने पूछा, 'स्वामी जी, क्या भारतीय स्त्री जीवन के संबंध में हम इतने संतुष्ट हैं कि हमारे समक्ष उसकी कोई भी समस्या नहीं है?' तब उन्होंने स्त्री शिक्षा का महत्व समझाते हुए कहा था, 'भारत की स्त्रियों को ऐसी शिक्षा दी जाए, जिससे वे निर्भय होकर भारत के प्रति अपने कर्तव्यों को भली-भांति निभा सकें और संघमित्रा, लीला, अहिल्याबाई तथा मीराबाई आदि भारत की महान देवियों द्वारा चलाई गई परंपरा को आगे बढ़ा सकें एवं वीर - प्रसूता बन सकें।' आज सिविल सेवा परीक्षा में कामयाब उन संघर्षशील लड़कियों को देखिए, जो हार मानने को तैयार नहीं हुई ।
किसी लड़की ने दो नाकामी, तो किसी ने चार बार नाकामी के बावजूद कामयाबी का पीछा नहीं छोड़ा। सिविल सेवा परीक्षा में टॉप करने वाली इशिता किशोर भी दो बार नाकाम रही थीं । अब सफलता के बाद उनका कहना है, 'प्रथम स्थान मिलना सपने के सच होने जैसा है। अधिकारी बनने के बाद मैं महिला सशक्तिकरण की दिशा में काम करूंगी।' वाकई, एक कामयाबी ही दूसरी कामयाबी के लिए राह तैयार करती है। कामयाबी दर कामयाबी, बेटियों को बढ़ते जाना है ।

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