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बफेलो 3 : 30 फुट ऊंचा वृक्ष वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर की गाथा सुना रहा
By EditorialPublished on
क्रिस की बड़ी इच्छा थी कि एक बार वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर पर बने 9/11 के स्मारक को जरूर देखूं । वह खुद मुझे ले जाने को तैयार थी पर वह काम पर जाती थी इसलिये मैंने मना कर दिया और राजा को लेकर मेनहट्टन की तरफ निकला रास्ते में देखा कि सड़कों पर स्कूली बसों का बहुत सम्मान है। कोई स्कूल बर निकली नहीं कि सारा ट्राफिक थम जाता है, सब स्कूल बस को पहले निकलने दे हैं।
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क्रिस की बड़ी इच्छा थी कि एक बार वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर पर बने 9/11 के स्मारक को जरूर देखूं । वह खुद मुझे ले जाने को तैयार थी पर वह काम पर जाती थी इसलिये मैंने मना कर दिया और राजा को लेकर मेनहट्टन की तरफ निकला रास्ते में देखा कि सड़कों पर स्कूली बसों का बहुत सम्मान है। कोई स्कूल बर निकली नहीं कि सारा ट्राफिक थम जाता है, सब स्कूल बस को पहले निकलने दे हैं।
अमेरिका (America) में स्कूल बसें सब एक समान होती है। किसी भी बस पर किसी स्कूल का नाम नहीं लिखा होता है। ये बसें विभिन्न कम्पनियों द्वारा संचालित होती है जिन्हें केन्द्र तथा राज्य सरकारों द्वारा स्थापित मानदण्डों का निर्वहन करना पड़ता है। बसों में बच्चों की सुविधाओं का बहुत ध्यान रखा जाता है। कोई भी स्कूल बस नहीं रखता। एक शहर या टाउन के तमाम स्कूलों का ठेका एक बस कम्पनी को दे दिया जाता है, यही कम्पनी उस कस्बे के तमाम स्कूलों के बच्चों को बस सेवा प्रदान करती है।
अमेरिका में स्कूल शिक्षा फ्री (School education free) है। हर अभिभावक को अपने बच्चे को स्कूल भेजना जरूरी है। कोई माता-पिता ऐसा नहीं करे तो उन्हें जेल तक हो सकती है। यह बात और है कि छात्र ही स्कूल नहीं जाना चाहे तो किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। दुनिया के सामने फेसबुक के मार्क जुकेरबर्ग का उदाहरण है, जिसने बीच में ही स्कूल छोड़ दिया था।
न तो स्कूल की कोई फीस है, न ही बस की कोई फीस । स्कूल की एक मील की परिधि में रहने वाले छात्र को पैदल ही स्कूल जाना पड़ता है, उसके लिए बस सेवा उपलब्ध नहीं है, हालांकि अलग-अलग राज्यों में इस तरह के नियम अलग- अलग भी है।
एक कस्बे या शहर के स्कूलों का संचालन एक स्कूल बोर्ड करता है, जिसके सदस्यों का चयन उस कस्बे की जनता मतदान से करती है। यह चयनित बोर्ड स्कूलों के संचालन हेतु एक अधीक्षक नियुक्त करता है जिसे टाउन कौन्सिल वेतन देती है, वह स्कूलों का प्रशासन देखता है। बोर्ड के सदस्य अवैतनिक स्वयंसेवक होते हैं।
शिक्षा निशुल्क होने के कारण सारा वित्तीय भार टाउन कौन्सिल उठाती है। कौन्सिल यह व्यय प्रोपर्टी टैक्स के माध्यम से जुटाती है। जिस टाउन में जितना अधिक प्रोपर्टी टैक्स वसूल होगा, उस टाउन के स्कूलों को उतना ही अधिक बजट मिलेगा। इस कारण ये स्कूल ज्यादा सुविधाएं और बेहतर शिक्षा प्रदान करने में सफल रहते है।
इस वजह से अमेरिकी शहरों में प्रोपर्टी और स्कूलों का एक अनूठा सम्बन्ध हो गया है। लोग घर वहीं खरीदते है, जहां स्कूल अच्छे होते है। ऐसे स्थानों में प्रोपर्टी की वेल्यू बहुत अच्छी हो जाती है।
एक टाउन के स्कूल प्रशासन के संचालन में न तो जिले और न ही राज्य का किसी तरह का हस्तक्षेप होता है। हमारे यहां स्कूली अध्यापकों की गृह जिले के बाहर नियुक्ति और तबादलों की जो भयंकर समस्या हैं, उसका यहां नामो निशां नहीं। अध्यापक अधिकांशत: उसी कस्बे के होते है जिनका कभी कोई स्थानान्तरण नहीं होता। स्वच्छा से वे कहीं भी जाये यह उनकी मर्जी।
ये स्कूल भले ही सरकारी हों मगर इनका स्टेण्डर्ड बहुत अच्छा होता है। लोग अपने बच्चों को इन स्कूलों में भेजते हुए किसी तरह की हीन भावना महसूस नहीं करते जैसा कि हमारे यहां होता है। यहां भी निजी स्कूल होते है, उनमें भी लोग अपने बच्चे पढ़ने भेजते है मगर इन स्कूलों की फीस 10-12 हजार डालर सालाना से कम नहीं होती। थोड़े से ज्यादा अच्छे निजी स्कूलों की फीस 20-25 हजार डालर सालाना तक होती है। बहुत ज्यादा अमीर किस्म के लोग ही अपने बच्चों को इन निजी स्कूलों में भेजते है।
राज्य सरकार प्रदेश भर के स्कूलों के रिजल्ट के आधार पर उनकी रैंकिंग जारी करती है। ज्यादा रैंकिंग वाले स्कूलों में हर कोई प्रवेश चाहता है, इसके लिये उसे वहां का निवासी होना जरूरी है, इस कारण स्कूल की रैंक बढ़ते ही उस क्षेत्र की प्रोपर्टी वेल्यू भी बढ़ जाती है।
ऐसा नहीं है कि टाउन के किसी भी स्कूल में आप अपने बच्चों का प्रवेश क सको आप जहां रहते है उस क्षेत्र के स्कूल में ही आपके बच्चों को प्रवेश किसी को कोई खास स्कूल पसन्द है तो वह उस क्षेत्र में घर खरीदता है। इससे भी प्रोपर्टी वेल्यू बढ़ती है।
वहां भी स्कूलों की तीन श्रेणियां होती है। कक्षा 1 से 5 तक प्राथमिक 8 तक माध्यमिक व 9 से 12 तक हाई स्कूल । यहा स्कूल अध्यापकों का वेतन अन्य अध्यवसायों की अपेक्षा कम होता है, हालांकि यहां न्यूनतम वेतन ही इतना अधिक होता है कि अध्यापकों को मिलने वाली राशि कम नहीं होती, फिर अपेक्षाकृत कम वेतन के कारण अधिकांशत: अध्यापक महिलाएं ही होती है। कार्यों में अच्छे वेतन के कारण पुरूषों का रूझान इस तरफ कम रहता है। साल में दो महीने की गर्मियों की छुट्टियों के कारण महिलाओं को घर-परिवार देखने का वक्त मिल जाता है।
हमारे यहां तो सरकार ने गर्मियों की छुट्टियों का कबाड़ा ही कर दिया है। एक वक्त था जब बच्चे का रिजल्ट आने के बाद पूरा परिवार दो-ढाई महीने की छुद्रियों का आनन्द लेता था। देशाटन होता था, बच्चे ननिहाल जाते थे। वहां के अनुभव उनके जीवन भर की अमूल्य निधि बन जाते थे जिसका दिमाग चला जो रिजल्ट के बाद ही अगली कक्षा की पढ़ाई शुरू करवा दी जिससे छुट्टियां कम हो गई और एक अच्छी खासी पारिवारिक परम्परा ध्वस्त हो गई।
वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर की जुड़वां बिल्डिंगों के स्मारक का नाम सेप्टेम्बर 11 मेमोरियल एण्ड म्यूजियम है मगर इसे 9/11 मेमोरियल तथा 9/11 मेमोरियल म्यूजियम अलग अलग कहा जाता है। 12 सितम्बर 2001 के हमले में ध्वस्त हुए इन जुड़वां टावरों में 2977 लोगों की जानें गई। मेमोरियल जुड़वां टावरों के स्थल पर ही बनाया गया है। इस स्मारक को बनाने हेतु एक प्रतियोगिता हुई थी जिसे एक इजरायली आर्कीटेक्ट ने जीती। टावरों के स्थान पर वृक्षों का वन खड़ा किया गया है जिसके केन्द्र में दो चौकोर पूल हैं।
म्यूजियम का उद्घाटन दो साल पूर्व ही हुआ था जिसमें 23 हजार चित्र, 10 र कलाकृतियां, 2 हजार के लगभग मारे गये लोगों की जीवनीयों के ऑडियो व वीडियो संग्रहित है।
हमारे यहां भी मुम्बई में इसी तरह का हमला हुआ था जो 26/11 नाम से प्रसिद्ध है। मगर एक आम न्यूयार्कर की भावनाएं जिस तरह 9/11 से जुड़ी हुई देखने को मिलती है वैसी आम मुम्बईकर की 26/11 को लेकर नजर नहीं आती।
न्यूयार्क (New York) आने वाले हर प्रवासी को न्यूयार्कवासी आग्रह करता है कि वह 9/11 स्मारक देखने को जाए। स्मारक में जाने के लिए किसी भी प्रकार का टिकिट नहीं है हालांकि म्यूजियम में जाने का जरूर है। ध्वस्त टावरों में आठ फुट उंचा एक केलेरी पियर वृक्ष बच गया था। इसे मलबे से निकाल कर प्लाजा में पुनः रोपित किया गया। आज यह वृक्ष 30 फुट ऊंचा हो कर लहलहा बचने व संघर्ष करने की गाथा सुना रहा है जो वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर व 9/11 के इतिहास को प्रतिबिम्बित करती है।
अमेरिका में स्कूल शिक्षा फ्री (School education free) है। हर अभिभावक को अपने बच्चे को स्कूल भेजना जरूरी है। कोई माता-पिता ऐसा नहीं करे तो उन्हें जेल तक हो सकती है। यह बात और है कि छात्र ही स्कूल नहीं जाना चाहे तो किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। दुनिया के सामने फेसबुक के मार्क जुकेरबर्ग का उदाहरण है, जिसने बीच में ही स्कूल छोड़ दिया था।
न तो स्कूल की कोई फीस है, न ही बस की कोई फीस । स्कूल की एक मील की परिधि में रहने वाले छात्र को पैदल ही स्कूल जाना पड़ता है, उसके लिए बस सेवा उपलब्ध नहीं है, हालांकि अलग-अलग राज्यों में इस तरह के नियम अलग- अलग भी है।
एक कस्बे या शहर के स्कूलों का संचालन एक स्कूल बोर्ड करता है, जिसके सदस्यों का चयन उस कस्बे की जनता मतदान से करती है। यह चयनित बोर्ड स्कूलों के संचालन हेतु एक अधीक्षक नियुक्त करता है जिसे टाउन कौन्सिल वेतन देती है, वह स्कूलों का प्रशासन देखता है। बोर्ड के सदस्य अवैतनिक स्वयंसेवक होते हैं।
शिक्षा निशुल्क होने के कारण सारा वित्तीय भार टाउन कौन्सिल उठाती है। कौन्सिल यह व्यय प्रोपर्टी टैक्स के माध्यम से जुटाती है। जिस टाउन में जितना अधिक प्रोपर्टी टैक्स वसूल होगा, उस टाउन के स्कूलों को उतना ही अधिक बजट मिलेगा। इस कारण ये स्कूल ज्यादा सुविधाएं और बेहतर शिक्षा प्रदान करने में सफल रहते है।
इस वजह से अमेरिकी शहरों में प्रोपर्टी और स्कूलों का एक अनूठा सम्बन्ध हो गया है। लोग घर वहीं खरीदते है, जहां स्कूल अच्छे होते है। ऐसे स्थानों में प्रोपर्टी की वेल्यू बहुत अच्छी हो जाती है।
एक टाउन के स्कूल प्रशासन के संचालन में न तो जिले और न ही राज्य का किसी तरह का हस्तक्षेप होता है। हमारे यहां स्कूली अध्यापकों की गृह जिले के बाहर नियुक्ति और तबादलों की जो भयंकर समस्या हैं, उसका यहां नामो निशां नहीं। अध्यापक अधिकांशत: उसी कस्बे के होते है जिनका कभी कोई स्थानान्तरण नहीं होता। स्वच्छा से वे कहीं भी जाये यह उनकी मर्जी।
ये स्कूल भले ही सरकारी हों मगर इनका स्टेण्डर्ड बहुत अच्छा होता है। लोग अपने बच्चों को इन स्कूलों में भेजते हुए किसी तरह की हीन भावना महसूस नहीं करते जैसा कि हमारे यहां होता है। यहां भी निजी स्कूल होते है, उनमें भी लोग अपने बच्चे पढ़ने भेजते है मगर इन स्कूलों की फीस 10-12 हजार डालर सालाना से कम नहीं होती। थोड़े से ज्यादा अच्छे निजी स्कूलों की फीस 20-25 हजार डालर सालाना तक होती है। बहुत ज्यादा अमीर किस्म के लोग ही अपने बच्चों को इन निजी स्कूलों में भेजते है।
राज्य सरकार प्रदेश भर के स्कूलों के रिजल्ट के आधार पर उनकी रैंकिंग जारी करती है। ज्यादा रैंकिंग वाले स्कूलों में हर कोई प्रवेश चाहता है, इसके लिये उसे वहां का निवासी होना जरूरी है, इस कारण स्कूल की रैंक बढ़ते ही उस क्षेत्र की प्रोपर्टी वेल्यू भी बढ़ जाती है।
ऐसा नहीं है कि टाउन के किसी भी स्कूल में आप अपने बच्चों का प्रवेश क सको आप जहां रहते है उस क्षेत्र के स्कूल में ही आपके बच्चों को प्रवेश किसी को कोई खास स्कूल पसन्द है तो वह उस क्षेत्र में घर खरीदता है। इससे भी प्रोपर्टी वेल्यू बढ़ती है।
वहां भी स्कूलों की तीन श्रेणियां होती है। कक्षा 1 से 5 तक प्राथमिक 8 तक माध्यमिक व 9 से 12 तक हाई स्कूल । यहा स्कूल अध्यापकों का वेतन अन्य अध्यवसायों की अपेक्षा कम होता है, हालांकि यहां न्यूनतम वेतन ही इतना अधिक होता है कि अध्यापकों को मिलने वाली राशि कम नहीं होती, फिर अपेक्षाकृत कम वेतन के कारण अधिकांशत: अध्यापक महिलाएं ही होती है। कार्यों में अच्छे वेतन के कारण पुरूषों का रूझान इस तरफ कम रहता है। साल में दो महीने की गर्मियों की छुट्टियों के कारण महिलाओं को घर-परिवार देखने का वक्त मिल जाता है।
हमारे यहां तो सरकार ने गर्मियों की छुट्टियों का कबाड़ा ही कर दिया है। एक वक्त था जब बच्चे का रिजल्ट आने के बाद पूरा परिवार दो-ढाई महीने की छुद्रियों का आनन्द लेता था। देशाटन होता था, बच्चे ननिहाल जाते थे। वहां के अनुभव उनके जीवन भर की अमूल्य निधि बन जाते थे जिसका दिमाग चला जो रिजल्ट के बाद ही अगली कक्षा की पढ़ाई शुरू करवा दी जिससे छुट्टियां कम हो गई और एक अच्छी खासी पारिवारिक परम्परा ध्वस्त हो गई।
वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर की जुड़वां बिल्डिंगों के स्मारक का नाम सेप्टेम्बर 11 मेमोरियल एण्ड म्यूजियम है मगर इसे 9/11 मेमोरियल तथा 9/11 मेमोरियल म्यूजियम अलग अलग कहा जाता है। 12 सितम्बर 2001 के हमले में ध्वस्त हुए इन जुड़वां टावरों में 2977 लोगों की जानें गई। मेमोरियल जुड़वां टावरों के स्थल पर ही बनाया गया है। इस स्मारक को बनाने हेतु एक प्रतियोगिता हुई थी जिसे एक इजरायली आर्कीटेक्ट ने जीती। टावरों के स्थान पर वृक्षों का वन खड़ा किया गया है जिसके केन्द्र में दो चौकोर पूल हैं।
म्यूजियम का उद्घाटन दो साल पूर्व ही हुआ था जिसमें 23 हजार चित्र, 10 र कलाकृतियां, 2 हजार के लगभग मारे गये लोगों की जीवनीयों के ऑडियो व वीडियो संग्रहित है।
हमारे यहां भी मुम्बई में इसी तरह का हमला हुआ था जो 26/11 नाम से प्रसिद्ध है। मगर एक आम न्यूयार्कर की भावनाएं जिस तरह 9/11 से जुड़ी हुई देखने को मिलती है वैसी आम मुम्बईकर की 26/11 को लेकर नजर नहीं आती।
न्यूयार्क (New York) आने वाले हर प्रवासी को न्यूयार्कवासी आग्रह करता है कि वह 9/11 स्मारक देखने को जाए। स्मारक में जाने के लिए किसी भी प्रकार का टिकिट नहीं है हालांकि म्यूजियम में जाने का जरूर है। ध्वस्त टावरों में आठ फुट उंचा एक केलेरी पियर वृक्ष बच गया था। इसे मलबे से निकाल कर प्लाजा में पुनः रोपित किया गया। आज यह वृक्ष 30 फुट ऊंचा हो कर लहलहा बचने व संघर्ष करने की गाथा सुना रहा है जो वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर व 9/11 के इतिहास को प्रतिबिम्बित करती है।

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