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बफेलो 2 : शरीर का ज्यादा गोरापन अच्छा नहीं समझा जाता
By EditorialPublished on
ज्यू- जयूं उड़ान का समय आगे बढ़ता गया त्यूं त्यूं यह आशंका घिरने लगी कि इतनी तपस्या तापने के बाद अन्त में कहीं उड़ान रद्द ही नहीं हो जाए। हम सबको यह भरोसा था कि विमान तो यहां पड़ा ही है, मौसम साफ होते ही हमें लेकर उड़ जाएगा। मगर यह भ्रम निकला।
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ज्यू- जयूं उड़ान का समय आगे बढ़ता गया त्यूं त्यूं यह आशंका घिरने लगी कि इतनी तपस्या तापने के बाद अन्त में कहीं उड़ान रद्द ही नहीं हो जाए। हम सबको यह भरोसा था कि विमान तो यहां पड़ा ही है, मौसम साफ होते ही हमें लेकर उड़ जाएगा। मगर यह भ्रम निकला।
अब घोषणा हुई कि न्यूयार्क का मौसम और खराब हो गया है, वहां से कोई विमान उड़ान नहीं भर पा रहा है, जब तक वहां से विमान यहां नहीं आता यात्रियों को ले जाना संभव नहीं। रही सही आशा भी चली गई। हम तो इसी भ्रम में थे कि विमान यहीं है मगर अब पता चला कि विमान वहां से आयगा। रात की बारह बज गई थी, कई लोगों ने आशा छोड़ लौटना ही बेहतर समझा।
बफेलो अत्यंत व्यस्त हवाई अड्डा था। हर 10-15 मिनट में एक उड़ान उतर रही थी। हमारे आगे के द्वारों से उतरने वाले यात्री हमारे सामने से होकर गुजर रहे थे। मैंने देखा कि हर उड़ान से दो तीन भारतीय तो उतर ही रहे थे।
हमारे गर्म कपड़े भी अटेचियों में ही थे। ठंड बहुत बढ़ गई थी, ए.सी. अलग चल रहे थे। हमारी तरह कई अन्य यात्री भी थे जो गर्म कपड़े नहीं पहने थे। सब ठिठुर रहे थे। एयरलाइन्स ने घोषणा कर दी कि उड़ान रद्द होने के 70 प्र.श. आसार हैं, वे निरन्तर क्षमा भी मांगे जा रहे थे। काउन्टर पर खड़े अधिकारी 6-7 घंटे से खड़े के खड़े थे, हम सब लोग तो लेट रहे थे, बैठ रहे थे मगर वे अपनी ड्यूटी के कारण मजबूर थे। उनके पास ही सीटें खाली भी पड़ी थी, मैंने उनसे थोड़ी देर जाने के लिये भी कहा मगर वे हंस कर टाल गये।
हमारे पास जाने का कोई ठिकाना तो था नहीं सोचा उड़ान नहीं गई तो सीटों पर सिकुड़ते हुए सो जाएंगे। रात की एक डेढ़ बजे के करीब घोषणा हुई कि न्यूयार्क में तुफान थम गया है और यहां आने वाला विमान उड़ान भर चुका है। आने में उसे 70 मिनट लगेंगे। मतलब तीन बजे पहले हमारा उड़ना संभव नहीं था। राजा ने क्रिस को हमें लेने आने से मना कर दिया और अपने एक मित्र गुरप्रीत का फोन कर दिया जो हवाई अड्डे पर ही टेक्सी चलाता था। उसे अब तक फोन इसलिए नहीं किया था क्यूंकि वह पैसे नहीं लेता है। नहीं नहीं करके भी घर तक जाने के डेड सो डालर लग जाते हैं और इतनी रात को खाली लौटना पड़ता है वो अ गुरप्रील से पहले ही दादा करवा लिया कि वो पैसे ले तभी आये वरना नहीं ह हंसते हंसते मान गया।
रात की ढाई बजे के करीब विमान आ गया। सबके चेहरों पर खुशी छा ग सबने तालियां बजाकर इसका स्वागत किया। ढेर सारे यात्री जा चुके थे इसलिये हमें सीट मिलना निश्चित हो गया था। शीघ्र ही हमारी उड़ान की घोषणा हो गई गर इसके साथ ही एक और घोषणा भी हुई जिससे सब प्रसन्न हो गये और एक बार फिर तालियां गूंज उठी। एयरलाइन्स की तरफ से यात्रियों को हुई असुविधा के लिये खे व्यक्त किया गया था और प्रत्येक यात्री को 225 डालर के कूपन इ मेल से भेजे जाने की खुश खबरी दी गई। कूपन सिर्फ जेट ब्लू एयरलाइन्स में यात्रा हेतु ही प्रयुक्त हो सकते थे। मैंने राजा से कहा, चलो चालान के पैसों की तो व्यवस्था हुई।
हमारे यहां भी उड़ानें लेट होती हैं मगर इस तरह का नकद मुआवजा कभी नहीं दिया जाता। ज्यादा से ज्यादा सौ पचास रू. के नाश्ते के कूपन दे दिये जाते हमारे आने जाने का एक टिकट 260 डालर का था जिसमें से एक तरफ की यात्र में देरी हो जाने से ही 225 डालर वापस दिये जा रहे थे। अमेरिका में छोटी छोटी बातों पर मुआवजों के दावे हो जाते हैं। इससे बचने के लिये ही कम्पनियां अपने ग्राहकों को संतुष्ट रखने की पूरी कोशिश करती है। 20 डालर का कूपन पहले दिया इसे मिलाकर तो एक तरह से हमारी आने जाने की यात्रा फ्री ही हो गई थी।
रात के 4 बजे न्यूयार्क के जे. एफ. के हवाई अड्डे पर उतरे तो मौसम एकदम शांत था। वर्षा भी थम चुकी थी। गुरप्रीत हमारे लिये गर्मा गर्म रोटियां और दाल बनवा कर लाया था। रास्ते में खाते खाते घर पहुँचे। गुरप्रीत को रात को यहीं सो जाने के लिये कहा तो इंकार कर दिया, पैसे भी देने लगे तो नहीं लिये और गाड़ी लेकर फुर्र हो गया। राजा की उससे कोई खास पहचान नहीं थी। हफ्ते भर पहले ही किसी अन्य मित्र के जरिये संपर्क हुआ था। एसा नहीं कि वह कोई बहुत पैसे वाला हो, मेहनतकश था। अमेरिका जैसी जगह पर इस तरह के उदाहरण देखना अजूबा ही था।
अगले दिन सुबह देर तक सोये। दोपहर को खाना-वाना खाकर एक बीच पर चले गये। लोग आईलेण्ड पर ही प्रसिद्ध फायर आईलेण्ड है जो एक 50 मील लम्बी रेत की पट्टी सी है । यह न्यूयार्क को समुद्री तूफानों से बचाने का काम करती है। तूफान आते हैं मगर इस पट्टी से टकराने से उनका वेग कम हो जाता है। यहां का जोन्स बीच बहुत प्रसिद्ध है।
अमेरिका में बीच पर जाने का चलन बहुत अधिक है। लोग अपने परिवार के साथ पूरा पूरा दिन बीच पर गुजार देते हैं। पूरे देश में हफ्ते में दो दिन छुट्टियां होती हैं। इस कारण शनिवार तथा रविवार को इन बीचों पर इतनी भीड़ रहती है कि पांव धरने तक की जगह नहीं मिलती। पूर्वी तट पर तो ठंड भी बहुत पड़ती है इसलिये बीच पर जाने हेतु साल में चार महीने ही मिलते हैं। हर कोई इन महीनों में अधिकाधिक बीच का आनन्द उठाना चाहता है।
बीच के प्रति रूझान का आलम यह है कि जो शहर समुद्री तट के किनारे नहीं है वे भी अपने शहर की छोटी मोटी झीलों के किनारे रेत डाल कर बीच जैसा वातावरण बना देते हैं, जिससे नगरवासियों को बीच की कमी नहीं अखरती ।
हमारे यहां तो पश्चिमी तट से लेकर पूर्वी तट तक इतनी बड़ी तट रेखा है फिर भी कुछ चुनिन्दा तटीय शहरों को छोड़कर बीचों का विकास नहीं हो पाया है। यहां बीचों का उपयोग शरीर का गोरापन कम कर इसे ताम्बाई रूप देने के लिये भी किया जाता है। ज्यादा गोरापन यहां अच्छा नहीं समझा जाता इसलिये लोग समुद्री तटों पर कपड़े उतार कर लेट जाते हैं और सूर्य की किरणों से शरीर को टेन करते हैं। जिसका शरीर जितना ताम्बाई हो जाता है उसे उतना ही सुन्दर माना जाता है।
बीचों पर इतनी भीड़ उमड़ती है कि कई लोग मेटल डिटेक्टर ले कर घूमते फिरते हैं। अक्सर बीच पर अंगूठियां, सिक्के आदि गिर जाते है और रेत में गुम हो जाते हैं। मेटल डिटेक्टर से ये लोग इन्हें ढूंढ निकालते है और अपनी जेब के हवाले करते हैं। बीच पर जाने का मतलब पानी में जाना नहीं। ढेर सारे लोग जो बीच जाते हैं वे पानी में नहीं जाते और बाहर बैठ कर ही आनन्द लेते हैं।
जोन्स बीच पर हम सप्ताहान्त के दिन नहीं गये थे इस कारण ज्यादा भी नहीं थी फिर भी बिकिनियां पहनी स्त्रियों की भरमार थी, जिधर देखो उधर ये बिरंगी ताकड़ियां और वजन वजन के तोले नजर आ रहे थे। थोड़ी देर यहां बित कर हम पास ही स्थित लाईट हाउस देखने चले गये। यहां पूरे रास्ते में सोल लाइट्स लगी हुई थीं जो अन्धेरा होते ही जल जाती थी। अमेरिका में इन दिनों सा ऊर्जा पर बहुत अधिक ध्यान दिया जा रहा है।

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