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टोरन्टो 3. एसा लग रहा था जैसे हम फ्रान्स पहुँच गये
By EditorialPublished on
जैसे भगवान ने मेरी सुन ली। घनघोर वर्षा के बीच एक हरी सी आकृति मेरी तरफ बढ़ती नजर आई। राजा ने हरा शर्ट पहना था। पहले भी एसी हरी आकृतियां नजर आई थीं, मैं खुश हो जाता था मगर पास आती तो ये आकृतियां किसी ओर की होती। मैं टकटकी लगाए उधर देखता रहा और कामना करता रहा कि इस बार तो राजा ही हो, मेरी खुशी का पारावार नहीं था जब यह आकृति राजा की ही निकली। तमाम आशंकाएं, अनिश्चितताएं जैसे पल भर में काफूर हो गई।

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जैसे भगवान ने मेरी सुन ली। घनघोर वर्षा के बीच एक हरी सी आकृति मेरी तरफ बढ़ती नजर आई। राजा ने हरा शर्ट पहना था। पहले भी एसी हरी आकृतियां नजर आई थीं, मैं खुश हो जाता था मगर पास आती तो ये आकृतियां किसी ओर की होती। मैं टकटकी लगाए उधर देखता रहा और कामना करता रहा कि इस बार तो राजा ही हो, मेरी खुशी का पारावार नहीं था जब यह आकृति राजा की ही निकली। तमाम आशंकाएं, अनिश्चितताएं जैसे पल भर में काफूर हो गई। डरा सहमा, लाचार व्यक्ति अचानक फिर विश्वास, अहंकार से भर उठा। अपने ही आत्म विश्लेषण से मैं मन ही मन शर्मसार हो उठा।
राजा बुरी तरह भीग गया था और थर थर कांप रहा था। मैंने उसे बहुत डांटा कि इतनी देर क्यूं लगाई, इस अंतराल में मैंने क्या क्या सोच लिया था यह भी बताया तो वह हंसने लगा। उसके हाथ में बड़ा सा पेकेट था, उसे आगे करते हुए उसने बताया कि मैं आपके लिये गरमा गरम रोटियां और दाल बनवा रहा था, इसमें देर लगी, निकलने लगा तो तेज बारिश आ गई इसलिये रूक गया। मैं विचलित था इसलिये उसे बहुत डांटा फटकारा, मैंने जब उसे कहा कि मैं रोने लगा था उसने जोर जोर से हंसते हुए मेरी बहुत मजाक उड़ाई।
वर्षा अबाध गति से जारी थी। वह थर थर कांप रहा था, हमने सोचा कि कार में जा कर हीटर चला देते हैं जिससे कुछ गर्मी आ जायेगी। एसी वर्षा में कार तक जाना भी संभव नहीं था इसलिये हम थोड़ी देर रुक गये। हमारे सब्र का बांध टूट रहा था, भीग तो गये ही थे, तेज वर्षा में भी हम कार की तरफ बढ़ गए।
बिजलियां कड़क रही थी, साइरनें चीख रही थी, तेज हवाएं जैसे हमें उठा कर फेंक देने को उद्यत थी और पानी की धार शरीर पर हमला कर रही थी फिर भी हम जैसे तैसे अपनी कार के करीब पहुँचे। पार्किंग मीटर में हमने सिर्फ दो घंटे के पैसे भरे थे, मगर हमें बहुत घंटे लग गये थे। ऐसे में पुलिस द्वारा कार पर टिकिट चिपका देना सामान्य बात है. मगर शायद एसी वर्षा के कारण हम बच गये थे।
हमारे यहां भी कार पार्क हैं मगर बड़े बड़े शहरों तक में इनका अभाव है। छोटे शहरों की तो बात ही क्या इसलिये लोग जहां मर्जी हो गाड़ी लगा देते हैं। यहां ऐसा नहीं हैं, गलियों में भी फुटपाथ पर पार्किंग मीटर लगे होते हैं, आपको जितनी गाड़ी पार्क करनी होती है उतनी देर का पैसा उस मीटर में डालना पड़ता है, मीट हरी लाईट चमकने लगती है। समय पूरा होते ही मीटर की लाईट लाल हो जाती है इससे पहले आपने गाड़ी उठा ली तो ठीक वरना इधर उधर घूमते पुलिस वाले की नजर लाल लाईट पर पड़ गई तो वो गाड़ी पर टिकिट चिपका देता है जिसक जुर्माना भरना पड़ता है।
गीले कपड़ों के साथ ही हम गाड़ी में बैठ गये। हीटर ओन कर दिया और व किसी छोटी जगह पर होटल देख कर रुक जायेंगे, यही सोच रहे थे। टोरन्टोमें होटलें बहुत महंगी हैं इसलिये उसका तो विचार ही नहीं किया।
एकाएक वर्षा थम गई तो हमने राहत की सांस ली। हम शहर के घने इलाके में थे, इसे यहां डाउन टाउन कहा जाता है, बाहर निकलने का किसी को रास्ता पूछ कर हम आगे बढ़े। जल्द ही हम टोरन्टो से बाहर निकल गये। देर रात हो गई थी आसपास होटल तलाशने लगे मगर कहीं नजर नहीं आया। दूर से एक होटल नजर भी आया तो वह फाईव स्टार निकला। आगे बढते हम एकदम सुनसान इलाके में पहुँच गये, सिर्फ सड़क थी और हम, कहीं किसी वाहन तक का नाम नहीं।
हमारे फोनों में और गाड़ी में सब जगह जी.पी.एस. सिस्टम था मगर न तो मुझे और न ही राजा को यह चलाना आता था। हमें यह भी पता नहीं था कि जिस दिशा में हम जा रहे है वह सही भी है कि नहीं। हम एक तरह से गुम गये थे फिर भी राजा गाड़ी चलाये जा रहा था, यही सोच कर कि कहीं तो कोई मिलेगा।
हमारे यहां के हाई वेज के मुकाबले यहां के हाई वेज में एक खराबी मुझे नजर आई। हमारे यहां तो हाईवे पर पड़ने वाले बड़े बड़े शहरों की दूरियां निरन्तर साईन बोर्ड पर आती रहती है। यहां साईन बोर्ड तो प्रचुरता से होते हैं मगर उन पर आसपास के इलाकों की ही जानकारी होती है, उस राह में आने वाले शहरों की कोई जानकारी नहीं होती। हम चलते गये, चलते गये, अन्ततः एक गाड़ी नजर आई। उसे लाईट देकर रोकने की कोशिश की तो गाड़ी रूक गई। राजा ने खिड़की का कांच नीचा कर उससे पूछना शुरू किया तो उस व्यक्ति ने गाड़ी एक तरफ रोकी, गाड़ी से उतरा और हमारे पास आकर पूछा कि क्या हम लोग गुम गये हैं। उसे बताया कि हमें मोन्ट्रियल की दिशा में जाना है और आस पास अगर कोई सस्ता होटल मिल जाए तो रात हम वहां बीता लें।
व्यक्ति ने अपना नाम नील बताया और हमें आश्वस्त किया कि हम सही दिशा में ही जा रहे हैं, उसने हमें उसकी गाड़ी के पीछे पीछे आने को कहा और बोला कि मैं आपको एक होटल तक छोड़ देता हूं फिर वापस अपनी राह पकड़ लूंगा। नील जैसे हमारे लिये भगवान बनकर आया। खराब मौसम की वजह से सड़कें सुनसान थी, सब अपने अपने घरों में दुबक गये थे, ऐसे में यह व्यक्ति अपनी राह छोड़ हमारी मदद कर रहा था, ऐसे उदाहरण कम ही देखने को मिलते हैं।
नील आगे चलता रहा और हम उसके पीछे पीछे। थोड़ी ही देर में उसने हमें एक होटल के बाहर लाकर खड़ा कर दिया। हमने उसका बहुत बहुत आभार व्यक्त किया और उसे विदा किया। होटल छोटा था, मगर बाहर बहुत गाड़ियां लगी हुईं थी, इससे एक और आशंका हो गई, कहीं होटल में कमरा खाली नहीं हुआ तो ? राजा अन्दर पूछने गया और जब तक नहीं लौटा तब तक दिल धक धक ही कर रहा था। मैंने भी सोच लिया कि यहां जगह नहीं मिली तो कार में ही सो जाएंगे। और करते भी क्या ?
जल्द ही राजा लौट आया, कमरा भी मिल गया था और हमारी अपेक्षा से सस्ता भी था। होटल का मालिक भी एक गुजराती ही था। हमने सामान निकाला और अन्दर गये। होटल में वाई फाई सुविधा भी थी इसलिये कमरे में पहुँचते ही
सारी थकान भूल अपने देश की दिन भर की घटनाओं की जानकारी लेने अपने आई पेड पर नेट खंगालने लगा। सुबह जल्दी 5 बजे उठ कर ट्विटर भेजना था ही। ठिकाना मिला, आराम मिला तो अब तक की व्यग्रता भी दूर हो गई और भूख लगने लगी। राजा जो खाना बनवा कर लाया था उस पर टूट पड़े। अगले दिन जल्दी ही उठ कर मोन्ट्रियल की राह पर निकल पड़े। होटल में नाश्ता फ्री था, खाना कब कहां मिले यही सोच कर डट कर नाश्ता कर लिया।
अब तक हम कनाडा के ओन्टेरियो प्रदेश में थे। शीघ्र ही हम क्यूबेक प्रदेश में प्रवेश कर गये कनाडा में कुल 10 प्रदेश तथा 3 केन्द्र शासित क्षेत्र हैं। अमेरिका की तरह कनाडा में भी दुनिया भर से लोग यहां आये और बस गये, इसी के साथ ब्रिटेन, फ्रान्स, पुर्तगाल, स्पेन आदि देशों ने अपनी अपनी कोलोनियां भी बना ली। भारत, अमेरिका और अन्य देशों की तरह यहां भी स्वतन्त्रता संग्राम हुए और अन्ततः देश आजाद हो गया। पूरा कनाडा अधिकतर अंग्रेजी बोलने वालों का था मगर एक बहुत बड़ा इलाका क्यूबेक का था जहां फ्रांसिसी प्रभाव अत्यधिक था।
कनाडा की आजादी के बाद क्यूबेक कनाडा से अलग होने का निरस्त संघर्ष करता रहा। दो बार इसके लिये जनमत संग्रह भी हुआ मगर आधे से अधिक जनता ने अलग होने का प्रस्ताव ठुकरा दिया।
ज्यूंही हम क्यूबेक में प्रविष्ठ हुए अचानक एसा लगा जैसे सब कुछ बदल गया ने ले लिया, सभी साईन बोर्डों से अंग्रेजी यकायक गायब हो गई। जिधर देखो फ्रेन्च में ही साईन बोर्ड नजर आ रहे थे। कहीं किसी से रूक कर बात भी अगले को अंग्रेजी तक नहीं आती थी, वह फ्रेन्च ही बोलता था। यह आश्चर्यजनक था। हमारे यहां भी प्रादेशिक भाषा भाषी प्रदेश हैं फिर भी टूटी फूटी हिन्दी या अंग्रेजी तो सब बोल या समझ ही लेते हैं। हिन्दी में नहीं तो सर्वत्र प्रादेशिक भाषा साथ साथ अंग्रेजी में तो बोर्ड नजर आ ही जाते हैं, मगर यहां एसा कुछ नहीं था, एसा लग रहा था जैसे हम फ्रान्स पहुँच गए हों।

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