Mukhtar Ansari
गैंगस्टर एक्ट के मामले में एमपी- एमएलए कोर्ट से माफिया मुख्तार अंसारी को 10 साल तथा उसके भाई अफजाल अंसारी को 4 वर्ष की सजा आज भले ही किसी को सामान्य लगे, पर कुछ वर्ष पहले इसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती थी। पूर्व विधायक कृष्णानंद राय और वाराणसी के कोयला कारोबारी एवं विश्व हिंदू परिषद के नेता नंदकिशोर रूंगटा की हत्या के मामले में दोनों को सजा हुई है, उसमें पहले सीबीआई की अदालत को कोई सुबूत नहीं मिला था।
कांग्रेस, सपा या अन्य विरोधी दल के नेता योगी आदित्यनाथ सरकार की कानून- व्यवस्था को लेकर कुछ भी कहें, लेकिन आम लोगों को पता है कि इनके शासनकाल में इन दोनों की हैसियत इतनी बड़ी थी कि कोई पुलिस अधिकारी उन्हें छूने का साहस नहीं कर सकता था। कृष्णानंद राय हत्याकांड का एक घिनौना पक्ष यह था कि हत्यारों ने उन पर एके-47 से केवल सैंकड़ों गोलियां ही नहीं बरसाईं, बल्कि उनकी शिखा भी काट ले गए थे। किसी की शिखा काट लेने का मतलब क्या था? आखिर उन हत्यारों की सोच में ऐसा क्या रहा होगा, जिससे किसी हिंदू की हत्या करने के बाद उसकी शिखा काट दी जाए?
हम सामान्यतः मजहबी इरादे से किए गए अपराध के पहलू की चर्चा से बचते हैं, किंतु सच तो सच है। वैसे एमपी एमएलए कोर्ट ने भी इस पर कोई टिप्पणी नहीं की है, लेकिन उसने कहा है कि माफिया मुख्तार का एक गैंग है, जिसका उद्देश्य न केवल व्यवस्था को अस्त-व्यस्त करना है, बल्कि आर्थिक लाभ के लिए अपराध करना भी है। अंसारी परिवार के आतंक से लोग इनके खिलाफ गवाही देने को तैयार नहीं होते थे या इनके पक्ष में आ जाते थे। इस कारण ये दोषमुक्त हो जाते थे । इस पृष्ठभूमि में वर्तमान फैसले का महत्व आसानी से समझ में आ सकता है।
मुख्तार अंसारी की हैसियत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जब योगी आदित्यनाथ की सरकार ने उसके विरूद्ध कानूनी कार्रवाई आरंभ की तब उसने उससे बचने का रास्ता निकाल लिया। पंजाब में तत्कालीन कांग्रेस सरकार के दौरान राज्य के किसी व्यापारी को धमकाने का उसके खिलाफ मामला दर्ज हुआ। पंजाब पुलिस मामले में पूछताछ करने के लिए उसे ले गई । इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार लगातार उसे वापस लाने की कोशिश करती रही, लेकिन वहां की कांग्रेस सरकार उसके पक्ष में मुकदमा लड़ती रही। अब पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार के कानून मंत्री ने बताया है कि उसका मुकदमा लड़ने के लिए वकील की 50 लाख रू. से अधिक की फीस बकाया है।
आज देश को कांग्रेस से यह पूछना चाहिए कि मुख्तार अंसारी को पंजाब की जेल में रखने के लिए वह इस सीमा तक जाकर मुकदमा क्यों लड़ती रही? आज तक यह भी पता नहीं चला कि किस व्यापारी को उसने धमकाया था, जिसके कारण मुकदमा दर्ज हुआ? जाहिर है, उद्देश्य केवल मुख्तार अंसारी को बचाना था। एक अपराधी को सत्ता का इतना बड़ा संरक्षण कांग्रेस के शासनकाल में मिला तो देश को यह जानने का हक है कि ऐसा क्यों किया गया? मुख्तार अफजाल अंसारी के परिवार पर मुकदमों की एक लंबी सूची है। मुख्तार पर कुल 61 मामले दर्ज हैं, जिनमें 8 हत्या के हैं। भाई अफजाल पर सात, भाई सिबगतुल्लाह पर तीन, पत्नी अफशा पर 11, बेटे अब्बास पर आठ, उसकी पत्नी निखत बानो पर एक और बेटे उमर पर छह आपराधिक मामले दर्ज हैं। अपराधी एवं दंगाई होने के बावजूद मुख्तार मऊ सदर से लगातार पांच बार विधायक बना। दो बार बसपा, दो बार निर्दलीय और एक बार कौमी एकता दल से उस क्षेत्र में राजनीति में जो भी उभरता उसे इस परिवार का या तो सामना करना पड़ता या उसके सामने समर्पण । कृष्णानंद राय भी राजनीति में उसे तगड़ी चुनौती दे रहे थे। मुख्तार - अफजाल अंसारी के परिवार ने अपने लाभ के लिए क्षेत्र में हिंदू-मुस्लिम विभाजन पैदा कर हिंसा की और कराई। अगर उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार नहीं होती तो मुख्तार - अफजाल को सजा मिलना संभव नहीं होता । राज्य से माफिया और अपराधियों का कानूनी रूप से विनाश करने के प्रति योगी आदित्यनाथ की प्रतिबद्धता संदेह से परे है। ऐसा नहीं होता तो अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी के परिवार का राज्यव्यापी आपराधिक एवं आर्थिक साम्राज्य ध्वस्त नहीं होता मुख्तार को यह पहली सजा नहीं मिली है। वर्ष 2022 से अब तक चार मामलों में उसे सजा मिल चुकी है। आज हालत यह है कि मुख्तार का बड़ा बेटा अब्बास एवं उसकी पत्नी निखत बानो जेल में हैं। मुख्तार की पत्नी अफशा तथा दूसरा बेटा उमर फरार हैं। अफशा पर अनुसूचित जाति के लोगों को डरा-धमकाकर उनकी जमीनें अपने नाम लिखाने के मामले में गैंगस्टर कानून के तहत मुकदमा दर्ज है और वह 12 इनामी अपराधियों की सूची में शामिल है।
मुख्तार की अब तक 291 करोड़ रू. से ज्यादा की संपत्ति जब्त हो चुकी है तथा 284 करोड़ रू. से अधिक की संपत्ति ध्वस्त कर दी गई है। वहीं अफजाल को सजा होने के बाद उसकी लोकसभा सदस्यता भी खत्म हो गई है। ऐसे माफिया परिवार की ऐसी दुर्दशा की कल्पना पहले किसी ने नहीं की थी। इस कानूनी कार्रवाई के साथ माना जा सकता है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश से माफिया का प्रभुत्व अब खत्म हो जाएगा। वास्तविक रूप में प्रदेश भयमुक्त समाज की ओर अब जाकर अग्रसर हुआ है। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य के लिए निश्चित रूप से यह ऐतिहासिक उपलब्धि है। अब इसके समानांतर पुलिस-प्रशासन के अंदर व्यापक सुधार और परिवर्तन की भी आवश्यकता है, ताकि जो लोग अपराधमुक्त राज्य के मार्ग की बाधा बनते हैं वे वर्तमान शासन के अनुरूप अपनी सोच बदलें ।
-अवधेश कुमार
Editorial

Editorial

Next Story