Pratahkal - Lekh - Manipur
रविशंकर रवि
सुरक्षा बलों की मौजूदगी और केंद्र सरकार (Government) की तत्परता से भले मणिपुर में स्थिति सामान्य दिख रही है, लेकिन भीतर ही भीतर तनाव बरकरार है। इसीलिए इंफाल घाटी और म्यांमार (Myanmar) से सटे पहाड़ी जिलों में सुरक्षा बलों की चौकसी और पेट्रोलिंग अब भी जारी है। यह बात भी अब साफ होती जा रही है कि इस हिंसा के पीछे अफीम की खेती और म्यांमार से होने वाली अवैध घुसपैठ एक बड़ी वजह थी ।
मणिपुर सरकार का मानना है कि चुराचांदपुर (Churachandpur) जिले में भड़की हिंसा के पीछे संघर्ष विराम में शामिल कुकी उग्रवादी समूहों का हाथ है। यह हिंसा सुनियोजित थी और मैतेई समुदाय के गांवों व धार्मिक
(Religious)
स्थलों की पहचान पहले ही कर ली गई थी। अगले दिन उसकी प्रतिक्रिया में इंफाल घाटी में हिंसा भड़की और कुकी समुदाय के लोगों व कुछ चर्च को निशाना बनाया गया। इस हिंसा को मैतेई बनाम कुकी संघर्ष का रूप देने की साजिश की गई, जबकि यह सच नहीं है ।
हकीकत तो यह है कि हिंसा के दौरान दोनों समुदाय के लोगों ने बड़े पैमाने पर एक-दूसरे की मदद की है। इतना ही नहीं, इंफाल घाटी में बसे मैतेई समुदाय के ज्यादातर लोग अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा पाने के पक्ष में नहीं हैं।
दरअसल, इस हिंसा की बुनियाद पिछले कुछ दिनों से बन रही थी। इसमें नशे के सौदागरों और संघर्ष विराम कर केंद्र सरकार से वार्ता करने वाले कुकी उग्रवादियों का बड़ा हाथ है। मणिपुर सरकार द्वारा ड्रग्स के खिलाफ शुरू किया गया अभियान बड़ा कारण माना जा रहा है, क्योंकि राज्य की सीमा से सटे पहाड़ी जिलों में बड़े पैमाने पर अफीम की अवैध खेती होती है। कुकी उग्रवादी और नशे के सौदागर अफीम को बाहर भेजने का काम करते हैं। मणिपुर पुलिस के अभियान की वजह से नशीले पदार्थों का यह कारोबार बुरी तरह प्रभावित हुआ है।
दिक्कत यह भी है कि मणिपुर से सटी भारत-म्यांमार सीमा पूरी तरह खुली हुई है। सीमावर्ती इलाके में सुरक्षा बलों की मौजूदगी नहीं के बराबर है। सीमा के दोनों ओर कुकी समुदाय के लोग रहते हैं, और वे बिना रोक-टोक आते-जाते रहते हैं। म्यांमार की राजनीतिक और आर्थिक स्थिति कारण वहां के कुकी मणिपुर की सीमा में आकर बस भी रहे हैं।
उनके बीच उग्रवादी भी आम आदमी बनकर छिपकर रहते हैं। भले ही वे केंद्र सरकार से बातचीत कर रहे हैं, लेकिन अपनी आय बढ़ाने के लिए वे अफीम की खेती को बढ़ावा देते हैं।
एक बड़ी समस्या म्यांमार से होने वाला अवैध प्रवेश है। इसके खिलाफ मणिपुर सरकार सर्वेक्षण करा रही है, ताकि अवैध नागरिकों की पहचान हो सके। इन घटनाक्रमों से संघर्ष विराम कर चुके कुकी उग्रवादी खुश नहीं हैं। उधर, कुकी समुदाय के राजनीतिक नेता अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए म्यांमार से आने वाले अवैध नागरिकों को बसाने में मदद कर रहे हैं। यही वजह है कि म्यांमार सीमा से सटे इलाकों में कुकी समुदाय की कई नई बस्तियां उग आई हैं। इस हिंसा में भी प्रभावित कुक लोगों के लिए राहत शिविर के नाम पर बैरक बनाने की जगह, अलग-अलग झोपड़ियां बनाई जा रही हैं, ताकि नई बस्तियां बसाई जा सकें। बीरेन सिंह सरकार की सख्ती की वजह से कुकी समुदाय के वैसे तत्वों में पहले से गुस्सा था। राज्य सरकार के आंकड़ों के अनुसार, अवैध नागरिकों की पहचान के लिए बनी कैबिनेट उप-समिति ने पहले चरण में टेंग्नौपाल जिले के 13 गांवों में 1147, चंदेल जिले के तीन गांवों में 881, चुराचांदपुर जिले के एक गांव में 154, कामजोंग जिले के 24 गांवों में 500 अवैध प्रवासियों की पहचान की थी, जो राज्य में म्यांमार से हो रही घुसपैठ की भयावहता को दर्शाता है। इस आग में पहाड़ी जिले से निर्वाचित कुकी समुदाय के 'कुछ विधायक
(Legislator)
भी घी डालने का काम कर रहे थे । वे कुकी बहुल इलाके के लिए अलग प्रशासनिक तंत्र की मांग कर रहे हैं। इसमें सत्तारूढ़ पार्टी के नेता भी शामिल हैं।
उनका आरोप है कि मणिपुर सरकार उनके हितों की रक्षा नहीं कर रही है, इसीलिए उनकी आबादी के क्षेत्रों को छठी अनुसूची का दर्जा मिले। उन्हें एसटी का दर्जा प्राप्त है और एसटी कोटे में सरकारी नौकरी पाने वालों में उनकी संख्या सर्वाधिक है। कुकी समुदाय के कुछ विधायकों ने अलग राज्य की मांग उठाकर स्थिति को राजनीतिक संकट की ओर मोड़ दिया है। मगर इसके लिए मणिपुर सरकार तैयार नहीं है । इस पूरी साजिश का मकसद बीरेन सिंह को हटाना भी है।
मुख्यमंत्री ने अलग प्रदेश की मांग ठुकराते हुए अवैध हथियार रखने वाले उग्रवादियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की चेतावनी दी है। मैतेई समुदाय किसी भी हाल में राज्य की भौगोलिक स्थिति में बदलाव को स्वीकार नहीं करेगा, इसलिए मणिपुर के पहाड़ी जिलों को ग्रेटर नगालैंड में शामिल करने की मांग का मुखर विरोध होता रहा है। अभी यह जरूरी है कि मणिपुर के पड़ोसी राज्य संयम और सतर्कता बरतें। फिलहाल, मामले को शांत करने के लिए सुरक्षा बलों की चौकसी बढ़ाने के साथ-साथ राज्य सरकार को मणिपुर उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ अपील करनी चाहिए, जिसमें उसने मैतेई समुदाय के लोगों को एसटी का दर्जा देने की मांग को आगे बढ़ाने के लिए कहा था। एक भाजपा विधायक ने सुप्रीम कोर्ट में अपील भी की है। इसके साथ, केंद्र सरकार को म्यांमार से होने वाली अवैध घुसपैठ को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे। इस दिशा में सुरक्षा बलों की चौकसी सीमावर्ती इलाकों में बढ़ानी होगी।
अब सेना और असम राइफल्स रिमोट एयरक्राफ्ट और एरियल सर्वे भी कर रही हैं। संघर्ष विराम समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले कुकी उग्रवादी समूह को उनके शिविर में रहने को बाध्य करना होगा।
उनके हथियारों को जब्त करना होगा। साथ ही, अफीम की खेती को बंद करने की व्यवस्था करनी होगी। अफीम की खेती करने वाले तमाम समुदायों के लोगों के खिलाफ समान रूप से कार्रवाई होनी चाहिए। सीमावर्ती इलाके में वनक्षेत्रों में अतिक्रमण रोककर अवैध घुसपैठ को रोकना होगा। कम से कम तीन पक्षों या राज्यों से जुड़ी इस समस्या का समाधान आसान नहीं है, क्योंकि इसमें सबकी अपनी-अपनी राजनीति शामिल है। देश या पूर्वोत्तर की राजनीति पर इसका क्या असर होगा, अभी यह आकलन मुश्किल है। अभी सरकार व राजनीतिक दलों की प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि तनाव जल्द दूर हो, ताकि लोग अपने घर लौट आएं।
Editorial

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