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पुराने वजीर-ए-आजम से क्यों दुश्मनी
By EditorialPublished on
इमरान खान (Imran Khan) को अप्रैल 2022 में अविश्वास प्रस्ताव के जरिये सत्ता से बेदखल कर दिया गया था, लेकिन कुछ ही दिनों में यह भी साफ हो गया कि इमरान कुरसी खिसकते ही पाकिस्तान की सियासत में बेमानी नहीं होने वाले । हुकूमत के खिलाफ वह मजबूत विपक्ष (Opposition) बनकर डटे हुए हैं। शायद इसीलिए उनकी मुश्किलें बढ़ती चली गई और अब तो आलम यह है कि उनको डर भी सताने लगा है। उन्हें लगता है कि सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) से जमानत मिलने के बावजूद सेना व सरकार (Government) उन्हें देशद्रोह के इल्जाम में 10 साल के लिए जेल भे

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इमरान खान (Imran Khan) को अप्रैल 2022 में अविश्वास प्रस्ताव के जरिये सत्ता से बेदखल कर दिया गया था, लेकिन कुछ ही दिनों में यह भी साफ हो गया कि इमरान कुरसी खिसकते ही पाकिस्तान की सियासत में बेमानी नहीं होने वाले । हुकूमत के खिलाफ वह मजबूत विपक्ष (Opposition) बनकर डटे हुए हैं। शायद इसीलिए उनकी मुश्किलें बढ़ती चली गई और अब तो आलम यह है कि उनको डर भी सताने लगा है। उन्हें लगता है कि सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) से जमानत मिलने के बावजूद सेना व सरकार (Government) उन्हें देशद्रोह के इल्जाम में 10 साल के लिए जेल भेज सकती है।
कुछ लोग आशंका जता रहे हैं कि इमरान खान का भुट्टो वाला हाल होगा। वैसे, पाकिस्तान में शायद ही कोई ऐसा वजीर-ए-आजम हुआ, जो इस कुरसी के बाद जेल न गया हो । पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री हुसैन शहीद सुहरावर्दी को 1960 में गिरफ्तार किया गया, तो बिना सुनवाई कराची सेंट्रल जेल में बंद कर दिया गया। यूसुफ रजा गिलानी को 2008 में भ्रष्टाचार के मामले में गिरफ्तार किया गया। खुद नवाज शरीफ को कारगिल जंग के बाद सत्ता से बाहर होना पड़ा। दस साल देश से बाहर वह लंदन में रहे और पाकिस्तान लौटने पर गिरफ्तार कर लिए गए। बेनजीर और उनके पिता जुल्फिकार अली भुट्टो, और खुद जिया-उल- हक का तो बहुत ही दर्दनाक अंत हुआ। यह पाकिस्तान का दुखद व शर्मनाक पहलू है।
इमरान खान भी जब सत्ता से बेदखल हुए, तब शहबाज शरीफ और बिलावल भुट्टो जरदारी की गठबंधन सरकार ने उन पर सैंकड़ों मामले दर्ज करा दिए। कादिर ट्रस्ट मामले में जब इमरान अदालत के परिसर से घसीटते हुए ले जाए गए और गिरफ्तार किए गए, तब पाकिस्तान की सड़कों पर अवाम और इमरान समर्थकों का तगड़ा गुस्सा दिखा। पाकिस्तान में सबसे ताकतवर संस्था फौज के खिलाफ लोग सड़कों पर आ गए। सेना मुख्यालय तक में वे दाखिल हो गए। दुनिया की नजरों में भी यह साफ हो गया है कि लोगों का समर्थन पाकिस्तान के लोकप्रिय क्रिकेट कप्तान रहे इमरान खान के साथ है। लोगों के प्रिय कप्तान ने सेना से टकराव की ठान ली है। इतिहास गवाह है, पाकिस्तान में फौज से टकराकर कोई शासन नहीं कर पाया है, तो क्या इमरान इस नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाएंगे? कोई शक नहीं कि इस समय उनकी सबसे बड़ी समस्या सेना है। गौर करने की बात है, जब से इमरान सरकार से बाहर हुए हैं, उन्हें अदालत से काफी सहयोग मिला है। जब उनको सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिली, तो मरियम नवाज ने तंज कसा कि अदालत में फैसला कर रहे जज तहरीक- ए-इंसाफ पार्टी के समर्थक के तौर पर इमरान के हक में फैसला दे रहे हैं । अदालत से उन्हें हमेशा जमानत मिली है। यह भी माना जा रहा है कि फौज ने खुद को सियासत से कुछ दूर किया है और इससे जो शून्य पैदा हुआ है, उसे अदालत ने भर दिया है।
बहरहाल, यह बिल्कुल साफ है कि सेना और इमरान के बीच रिश्ते पूरी तरह टूट गए हैं। कोर्ट से अपनी ताजा जमानत के बाद भी इमरान सीधे फौज पर आरोप लगा रहे हैं कि उन्हें देशद्रोह के मामले में दस साल के लिए जेल भेजने की साजिश हो रही है। उन्होंने यह भी डर जताया है कि उन्हें फांसी दी जा सकती है। वह पहले ही आईएसआई के मुखिया नदीम अंजुम पर जानलेवा हमले के आरोप लगा चुके हैं। लोग भूले नहीं हैं कि इमरान 2018 में पाकिस्तान की फौज की मदद से ही सत्ता में आए थे। वह फौज के चहेते थे, तब सेना नवाज को बाहर का रास्ता दिखाने के लिए एक नया चेहरा ढूंढ रही थी। तब इमरान से बेहतर चेहरा और कौन हो सकता था? साल 2018 का चुनाव ऐसे वक्त हुआ था, जब पाकिस्तान की अदालत ने नवाज शरीफ के किसी भी सरकारी दफ्तर में काबिज होने पर पाबंदी लगा दी थी।
तब इमरान खान की फौज ने पूरी मदद की, लेकिन वह जब फौज के लिए मुश्किलें खड़ी करने लगे, तब सेना ने शहबाज शरीफ की मदद से 2022 में इमरान को निशाने पर लिया। सेना के साथ टकराव की शुरूआत तब हुई, जब सेनाध्यक्ष जनरल कमर जावेद बाजवा ने लेफ्टिनेंट जनरल फैज हमीद का पेशावर ट्रांसफर कर दिया । इमरान खान बतौर वजीर- ए-आजम फैज हमीद को आईएसआई का मुखिया बनाए रखना चाहते थे । खबर यह भी थी कि इमरान उनको सेना प्रमुख बनाने की तैयारी में थे। यहीं से शुरू हुआ टकराव । वैसे पाकिस्तान में जो मौजूदा राजनीतिक-आर्थिक अस्थिरता है, उसके पीछे फौज के अंदर की फूट भी एक बड़ी वजह है। अधिकतर सैनिक और निचले ओहदों पर तैनात लोग इमरान के समर्थक हैं, लेकिन ज्यादातर जनरल उनके पक्ष में नहीं हैं। पाकिस्तान जैसा देश अपनी नाकामी के लंबे रास्ते पर इसलिए भी चलता चला जा रहा है, क्योंकि वहां सियासी सत्ता बहुत गहराई तक खंडित है। वहां हमेशा से दोहरा शासन रहा है, जहां सेना ही वास्तविक शक्ति है और नागरिक सत्ता को उसके तहत काम करना होता है। फौज ने रेखाएं खींच रखी हैं, जिसके अंदर ही सरकार को काम करना होता है। हालांकि, अब हम जो देख रहे हैं, वह पाकिस्तान की राजनीति में एक बड़े विभाजन का संकेत है, जो एक ऐसे खतरनाक बिंदु पर पहुंच गया है, जहां यकीनन देश की अहम सियासी ताकत- इमरान खान और उनकी पीटीआई- सेना को सीधी चुनौती दे रही है।
सेना की समस्या यह है कि वह वास्तव में एक विश्वसनीय कुशल नागरिक नेता चुनने में कभी कामयाब नहीं हुई है। साल 1985 में जनरल जिया-उल-हक ने एक अज्ञात सिंधी राजनेता मुहम्मद खान जुनेजो को प्रधानमंत्री के रूप में चुना था, लेकिन वह रिश्ता भी तीन साल में टूट गया। 1990 के दशक में बेनजीर भुट्टो को निशाने पर लेने के लिए सेना ने नवाज शरीफ को सहारा दिया था, पर सेना ने ही नवाज का तख्तापलट कर दिया। जनरल परवेज मुशर्रफ ने कमांडर-इन-चीफ और राष्ट्रपति, दोनों पदों का आनंद लिया, मगर एक दिन आया, जब मुशर्रफ को देशद्रोह के लिए मौत की सजा सुनाई गई और उन्हें देश छोड़कर जाना पड़ा।
और अब, पाकिस्तान के पास इमरान खान हैं । उन पर दुनिया भर की निगाहें टिकी हैं कि पाकिस्तान अभी अपने काले इतिहास को दोहराएगा या कोई नई सभ्य लकीर खींचेगा?

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