Pratahkal - Lekh - Indecisive decision
जगमोहन सिंह राजपूत

महाराष्ट्र (Maharashtra) में उद्धव ठाकरे सरकार (Uddhav Thackeray government) गिरने और शिंदे (Shinde) सरकार के गठित होने को लेकर राज्यपाल की भूमिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने अपने हालिया निर्णय में जो कहा उसकी कानूनी स्थिति सभी पक्षों को स्वीकार करनी होगी। हालांकि, जो कानून के जानकार नहीं हैं उन्हें भी इसकी विवेचना और उसे व्यक्त करने का अधिकार होना चाहिए । सर्वोच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र के राज्यपाल रहे भगत सिंह कोश्यारी की इस मामले में भूमिका को आड़े हाथों लिया।
कोश्यारी (Koshyari) की यह आलोचना समझ से परे है। आखिर, जब राज्यपाल (Governor) के पास सरकार के विरोध में इतनी बड़ी संख्या में विधायकों के हस्ताक्षरित पत्र प्रस्तुत किए गए तो इसका एकमात्र यही निष्कर्ष था कि सरकार अल्पमत में आ गई है। पूर्व के ऐसे अनेक उदाहरण राज्यपाल के संज्ञान में रहे होंगे, जिनमें सरकारों को बर्खास्त कर दिया गया था। फिर भी, महाराष्ट्र के राज्यपाल ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने मुख्यमंत्री ठाकरे को विश्वासमत हासिल करने को कहा । यह अपने आप में एक तर्कसंगत निर्णय रहा। वहीं, मुख्यमंत्री ठाकरे ने सदन का सामना किए बिना ही त्यागपत्र दे दिया। इसका अर्थ था कि वह समझ चुके थे कि उनके नीचे से बहुमत की जमीन सरक गई है।
ऐसी स्थिति में कोश्यारी का निर्णय सर्वोच्च न्यायालय के बहुचर्चित एसआर बोम्मई मामले के अनुरूप ही था। कर्नाटक की बोम्मई सरकार को 21 अप्रैल, 1989 को अनुच्छेद 356 के अंतर्गत बर्खास्त कर राज्यपाल की संस्तुति पर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था। तब कुछ विधायकों नें विद्रोह किया था, लेकिन राज्यपाल ने मुख्यमंत्री को विधानसभा (Assembly) में बहुमत सिद्ध करने का अवसर नहीं दिया।
इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए भविष्य के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश दिए कि ऐसे प्रकरणों में सही निर्णय तक कैसे पहुंचा जाए। उसमें स्पष्ट किया गया कि किसी भी राज्य सरकार के लिए बहुमत सिद्ध कराने का केवल एक ही स्थान है और वह है विधानसभा का मंच । उक्त निर्णय में ऐसी कोई तकनीकी जटिलता नहीं थी, जिन्हें सामान्य नागरिक न समझ सके। ऐसे में यह एक पहेली बनकर रह गई है कि जब राज्यपाल के रूप में कोश्यारी उन्हीं निर्देशों का पालन कर रहे थे तो उसके बावजूद सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें कैसे गलत ठहराया। ऐसे में अब जब भी महाराष्ट्र सरीखी स्थितियां उत्पन्न होंगी तो किसी राज्यपाल के समक्ष यह निर्णय करना अत्यंत कठिन होगा कि वह बोम्मई प्रकरण के दिशानिर्देश मानें या कोश्यारी के लिए दी गई शीर्ष अदालत की नसीहत का ध्यान रखें।
भारत (India) में समय-समय पर ऐसी स्थितियां उत्पन्न होती रहेंगी, क्योंकि केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त राज्यपाल और केंद्र से इतर राजनीतिक दल वाली राज्य सरकार में राजनीतिक वैचारिक एकरूपता संभव नहीं हो सकती। दिल्ली में उपराज्यपाल और राज्य सरकार के बीच निरंतर कायम विवाद इसका एक बड़ा उदाहरण हैं । ऐसे में पारस्परिक वैचारिक आदान-प्रदान समस्याओं का समाधान निकालने में सहायक हो सकता है। विमर्श लोकतंत्र (Democracy) में सबसे प्रभावी उपकरण है जो किसी भी समस्या का समाधान प्रस्तुत करने में सक्षम है। जब ऐसा नहीं होता तो समस्याएं और टकराव बढ़ने लगते हैं। विमर्श का अभाव कई अप्रिय स्थितियों को जन्म देता है।
उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ जब बंगाल के राज्यपाल थे तो अक्सर यही देखने को मिलता था कि राज्य सरकार किसी न किसी प्रकार से उनके अपमान का प्रयास करती रहती थी । महत्वपूर्ण अवसरों पर उनके कार्यक्रम स्थल तक पहुंचने से पहले ही दरवाजे तक बंद कर दिए जाते । सरकारी अधिकारियों को उनके साथ कोई संपर्क न रखने को कहा गया। बंगाल के ही नहीं, बल्कि देश भर के भद्र लोग इस पर मौन रहे। फिर वहां नए राज्यपाल की नियुक्ति हुई। शुरूआती दौर में उनके तथा मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच सौहार्द की आशाजनक खबरें आईं। मुख्यमंत्री नें उन्हें बांग्ला भाषा की अक्षर ज्ञान की पुस्तक भी भेंट की। बाद में मालूम पड़ा कि मुख्यमंत्री विश्वविद्यालयों से राज्यपाल का कुलाधिपति के रूप में कोई निर्देश या पत्राचार तक पसंद नहीं करती हैं। अब यह बंगाल के सभी सरकारी विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति यानी राज्यपाल के समक्ष स्पष्ट हो चुका है कि या तो विश्वविद्यालयों के मामलों से दूर रहें या फिर मुख्यमंत्री के शब्द- बाण झेलने के लिए तैयार रहें।
इसमें कोई संदेह नहीं कि राज्यपाल के रूप में यदि कोई कुलाधिपति विश्वविद्यालयों की साख को पुनः प्रतिष्ठित कराने में सफल हो जाए तो वह नई पीढ़ी के समक्ष नवाचार, कौशल प्रवीणता और ज्ञान सृजन की असीमित संभावनाए प्रस्तुत कर सकता है। नई पीढ़ी का आत्मविश्वास बढ़ा सकता है। 1978-80 के दौरान मध्य प्रदेश के राज्यपाल रहे सीएम पूनाचा ने इस असंभव को संभव कर दिखाया था । उनके प्रयासों से वहां परीक्षाएं समय से होने लगीं। परीक्षा परिणाम समय से आने लगे। विद्यार्थियों और प्राध्यापकों के बीच विश्वास का परिवेश निर्मित हुआ । इस सफलता का श्रेय उस समय के नेताओं और सरकार को भी दिया जाना चाहिए जिन्होंने राज्यपाल की नीयत पर विश्वास किया और उन्हें आगे बढ़ने में पूरी सहायता की।
अब समय ने करवट बदली है। हाल के दौर में केरल, तमिलनाडु और बंगाल में कुलाधिपति के रूप में राज्यपालों के अधिकारों का अतिक्रमण किया गया। इन राज्यों के मुख्यमंत्रियों को राज्यपालों द्वारा कुलपतियों की नियुक्ति में संविधानसम्मत विधि से स्वविवेक का उपयोग पसंद नहीं आया । केरल में राज्यपाल को सूचित किए बिना ही राज्य सरकार ने कुलपतियों की नियुक्तियां कर दीं।
विमर्श मंचों पर विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता का गुणगान करने वाले नेतागण जब कुलपतियों की नियुक्ति का अधिकार अपने हाथ में लेने के लिए संवैधानिक प्रविधानों और सामान्य नैतिकता को भी भुला देते हैं तब ज्ञानार्जन के सुरम्य परिसरों पर संकट के बादल मंडराने लगते हैं। ये बादल तभी छंटेंगे जब विमर्श को विचारधारा के बंधनों से अलग किया जाए। इसके लिए प्राचीन काल से चली आ रही परंपरा के अनुसार आचार्य-अध्यक्ष यानी कुलाधिपति को सम्मान केवल सत्ता से ही नहीं, बल्कि न्यायिक व्यवस्था के शीर्ष स्तर से भी मिलना चाहिए ।
Editorial

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