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अहितकारी सिद्ध होती लैंगिक मतवादिता
By EditorialPublished on
पश्चिमी देशों (Western countries) में जेंडर यानी लैंगिक मतवादिता (Gender dichotomy) विचित्र रूप ले रही है । नारीवाद को पीछे छोड़कर समलैंगिक, परालैंगिक आदि मतवाद तरह-तरह की मांगें कर रहे हैं। उनमें अंतर्विरोध भी हैं, मगर हर मतवादी अपने रूख पर अड़ा हुआ है। नेताओं और मीडिया का एक वर्ग भी उन सभी को संतुष्ट करने में लगा है। जबकि तमाम ऐसे हैं जो इस पर कुछ बोलने से भी भयभीत हैं कि पता नहीं किस बात पर कौन सा मतवादी समूह नाराज हो जाए ।

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शंकर शरण
पश्चिमी देशों (Western countries) में जेंडर यानी लैंगिक मतवादिता (Gender dichotomy) विचित्र रूप ले रही है । नारीवाद को पीछे छोड़कर समलैंगिक, परालैंगिक आदि मतवाद तरह-तरह की मांगें कर रहे हैं। उनमें अंतर्विरोध भी हैं, मगर हर मतवादी अपने रूख पर अड़ा हुआ है। नेताओं और मीडिया का एक वर्ग भी उन सभी को संतुष्ट करने में लगा है। जबकि तमाम ऐसे हैं जो इस पर कुछ बोलने से भी भयभीत हैं कि पता नहीं किस बात पर कौन सा मतवादी समूह नाराज हो जाए ।
एक वर्ग की मांग है कि स्त्री-पुरुषों के अलग-अलग शौचालय नहीं हों। वहीं, कुछ यह स्वतंत्रता चाहते हैं कि वे स्त्री शौचालय उपयोग करें या पुरूष शौचालय । इसी तरह, खेल स्पर्धाओं की टीमों में किसी पुरूष द्वारा खुद को स्त्री या परालैंगिक बताकर शामिल होने की घटनाएं भी सामने आई हैं। ऐसे मामलों में महिला खिलाड़ियों की आपत्ति और असुविधा को अनसुना कर किसी जैविक पुरूष को महिला टीम, महिला कक्ष और स्नानागार तक में स्थान दिया गया।
लैंगिक मतवादिता स्कूलों तक पहुंचा दी गई है। कई अमेरिकी स्कूलों (American schools) में लैंगिक पहचान और पसंद को बच्चों का निजी मामला कहा जा रहा है कि उनके माता-पिता को भी इस मुद्दे से दूर रखना चाहिए। इसकी आड़ में बच्चों को तरह- तरह के विचित्र साहित्य, प्रतीक और क्रियाकलाप आदि दिए जा रहे हैं, जिससे उन्हें लैंगिक मतवादिता के अनुकूल बनाया जा सके। लैंगिक मतवादियों की मांगें और गतिविधियां भिन्न विचार वालों को शर्मिंदा और प्रतिबंधित करने की जिद रखती हैं। यहां तक कि दिवंगत लेखकों की पुस्तकों में हेर-फेर कर उन्हें चालू मतवादिता के अनुरूप बदला जा रहा है। ऐसे में पाठक पुस्तक में ऐसे विवरण पढ़ने को विवश हैं जो उस लेखक ने लिखे ही नहीं थे।
इस मतवादी सनक में कई बातें बेसिर-पैर की लगती हैं। इसे स्वर देते हुए 'हैरी पाटर' की प्रख्यात लेखिका जेके रालिंग ने प्रतिवाद में कहा है कि सभी बातों को देख-परख कर व नतीजे पर पहुंची हैं कि परालैंगिकों का आंदोलन खतरनाक और बेलगाम हो चुका है, जिसे चुनौती देनी चाहिए। उनके अनुसार ऐसा आंदोलन होना ही नहीं चाहिए था, क्योंकि इसके नाम पर 'पुरूषों द्वारा खुद को स्त्री कहकर स्त्रियों के साथ जबरदस्ती की जा रही है। परालैंगिक लोग स्त्री खेलों पर कब्जा कर रहे हैं। इससे जेलों में स्त्री कैदियों और स्कूलों में बच्चों को शारीरिक चोट पहुंचाने की आशंका बढ़ गई है। छोटे-छोटे बच्चों को यौन भावनाओं से भरा जा रहा है। उन्हें सहज पढ़ने-सीखने से दूर कर खास प्रपंचों से दुष्प्रभावित किया जा रहा है। तैराकी स्थलों पर किशोर लड़कियों को तरह-तरह के भद्दे शारीरिक आत्मप्रदर्शन देखने को बाध्य किया जा रहा है और ऐसे-ऐसे विकृत कार्य हो रहे हैं, जो पहले कभी नहीं सोचे गए।' ऐसे उदाहरणों के आधार पर रालिंग ने इस आंदोलन को खतरनाक और स्त्री - विरोधी माना है।
चालू परालैंगिक अतिवाद ने अपनी कोई सीमा नहीं बांधी है। इससे दूसरों की सुरक्षा एवं अधिकारों को मनमाने तरीके से कुचला जा रहा है। विशेषकर स्त्रियों से संबंधित क्षेत्रों में घुसपैठ कर स्त्रीत्व की सभी जैविक, सामाजिक और भावनात्मक विशेषताओं को ही मिटा देने की जिद ठानी गई है। यह वस्तुतः स्त्रियों के संपूर्ण अनुभव, भावनाओं और विशेषताओं को कुचलने का साधन बन रहा है। पश्चिम के दुर्बल नेताओं और भ्रमित शासकों ने परालैंगिक मतवादियों के समक्ष आत्मसमर्पण सा कर दिया है। भारत में भी इसका प्रभाव बढ़ रहा है। कुछ वर्ष पहले सुप्रीम कोर्ट ने तीसरे लिंग को मान्यता दी । फिर, लैंगिक रूचि को निजता के मूल अधिकार में सुरक्षा दी। इसके बाद समलैंगिकता को अवैध संबंधों की श्रेणी से मुक्त किया पिछले वर्ष बिना विवाह के साथ रहने वालों तथा समलैंगिक जोड़ों को भी सरकारी योजनाओं के लिए समान रूप से लाभार्थी घोषित किया । अब सुप्रीम कोर्ट समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने पर विचार कर रहा है। भारतीयता का दावा करने वाले दल और संगठन भी बदलती पश्चिमी हवाओं के अनुसार अपने विचार बदलते रहते हैं। इस प्रकार, कभी वे समलैंगिकता को विकृति, बीमारी का वाहक और समाज के लिए हानिकारक बताते हैं, तो कभी हमारे महान महाकाव्यों में समलैंगिकता की स्वीकृति दिखाने लगते हैं। भारत में भी परालैंगिक रहे हैं, किंतु इसे चालू पश्चिमी मतवादिता के अनुरूप खींचने की कोशिशें दूसरी बात हैं । भिन्न-भिन्न लैंगिक रूचि के लोगों के प्रति सहज रहना एक चीज है, किंतु उनके पक्ष में आक्रामक वोक- मतवादिता दूसरी चीज है। इसे स्वीकार करने और थोपने की कोशिश हमें केवल उसी दिशा में जाएगी जिस पर पश्चिम में भी रालिंग जैसी विदुषियां चिंतित हैं ।
भारतीय शास्त्रों (Indian scriptures) या लोक-परंपरा (Folk tradition) में मौजूदा वोक मतवादिता नहीं है। समलैंगिक संबंधों को अच्छा या बुरा न मानते हुए उसे अनदेखा करने का चलन रहा है, लेकिन उसे स्त्री-पुरूष विवाह के समान स्थान नहीं दिया गया । हाल तक यूरोपीय देशों में भी ऐसा ही संतुलन था। फ्रांस में समलैंगिक संबंधों को स्वीकार करते हुए भी उसका दर्जा सामान्य स्त्री-पुरुष विवाह जैसा नहीं है । जैसे, समलैंगिक जोड़े बच्चा गोद नहीं ले सकते।
पश्चिम के नए-नए चलन अपनाना कोई वैज्ञानिक या सुसंगत विचार नहीं है। विशेषकर भारत जैसी सभ्यता के लिए, जिसका सामाजिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक अनुभव यूरोप की तुलना में हजारों वर्ष पुराना एवं समृद्ध है। हिंदू शास्त्रों में विवाह के आठ प्रकारों में समलैंगिक विवाह का उल्लेख नहीं मिलता। साथ ही, समलैंगिकों को दंडित - वर्जित करने की भी कोई कठोरता नहीं रखी गई थी। यही लोक-सहमति के अनुकूल भी प्रतीत होता है। इस संतुलित समझ को चालू पश्चिमी मतवादी सनक के अनुकूल बनाने की चाह अंधानुकरण का ही दयनीय नमूना है। यदि कल को पश्चिम में मनुष्य पशु विवाह ( कुछ वर्ष पहले एक अमेरिकी राज्य में हुआ भी) का फैशन चल पड़ा तो क्या हमारे नेता या न्यायपाल उसे भी अपनाने की ओर उन्मुख होंगे ? स्मरण रहे कि भारतीय ज्ञान परंपरा और संस्कृति अधिक विवेकशील रही है। वहीं, यूरोपीय सभ्यता अपेक्षाकृत नई है। इसीलिए तरह-तरह की उठापटक और अतिवाद के बीच झूलती रहती है। इसलिए हमें अपनी महान ज्ञान परंपरा के अनुरूप विचार करते हुए हर नए मतवाद को उन्नत मानने से बचना चाहिए।

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