Pratahkal - Suresh Goyal
हमारे होटल के सामने से ही लारेन्स नदी बह रही थी, नियाग्रा (Niagara) प्रपात का पानी बहता हुआ यहीं से गुजर रहा था। पानी ऊंची नीची चट्टानों से गिर कर आगे बढ़ रहा था, जिसने जगह जगह झरने का रूप ले लिया था। नदी के किनारे ऊंचे ऊंचे घने पेड़ थे इसलिये ये झरने दिखाई नहीं दे रहे थे। एक जगह से झरने देख सकते थे तो वहाँ जाने का टिकिट था। यह अचरज की ही बात थी कि नियाग्रा प्रपात देखने का कोई टिकिट नहीं था मगर यहां मामूली से झरनों का टिकिट था।
नदी के उपर ही एक पुल बना था। उस तरफ अमेरिका था, इधर कनाडा । अमेरिका (America) से वाहन आ रहे थे उनकी इधर चेकिंग हो रही थी। एसा लगता है कि नदी पर एसे कई पुल हैं। इस पूरे इलाके में होटल ही होटल थे। कई भारतीय रेस्टोरेन्ट
(Indian restaurant)
भी नजर आ रहे थे। एक पेसेज टू इन्डिया नाम का रेस्टोरेन्ट नज़र आया तो हम उसमें घुस गये। रेस्टोरेन्ट एक पाकिस्तानी औरत का था मगर नाम इण्डियन रखा था क्यूंकि इस नाम से भारतीय उपमहाद्वीप के तमाम देशों के लोग खिंचे चले आते है।
यहां खाना भी उपलब्ध था और अन्य वस्तुएं भी। खाना बफे में था जिसके 20 डालर थे, खाने की चीजें तरह तरह की थी मगर मैं तो सिर्फ एक सब्जी और रोटी ही खाता हूं। उसके भी उतने ही पैसे देने पड़े तो जान जल गई। इससे तो अच्छा राजा रहा, उसने समोसे मंगाए। 5 डोलर में दो बड़े बड़े समोसे आ गये, उसका तो उन्हीं से पेट भर गया।
थोड़ा इधर उधर घूम घाम कर कमरे में आकर सो गये। अगले दिन 31 जुलाई 2016 रविवार को कनाडा
(Canada)
छोड़ने से पहले नियाग्रा के डाउन टाउन इलाके का एक चक्कर लगा लिया। यहां पार्किंग कहीं 25 तो कहीं 35 डोलर थी। सड़क पर ही गाड़ी रोक राजा गाड़ी में बैठा रहता और मैं इधर उधर घूम आता, फिर मैं गाड़ी में बैठ जाता और वो घूम लेता। यहां चारों तरफ तरह तरह के एम्यूजमेन्ट पार्क (Amusement park) जैसे स्थान थे। हमें उनमें जाना नहीं था। थोड़ी देर यहां बीता कर बोर्डर क्रोस करने के लिये निकल गये।
सीमा पर ड्यूटी फ्री शोप थी यहां कई तरह की वस्तुएं सस्ते दामों में उपलब्ध थी। मुझे तो कुछ लेना नहीं था, राजा जरूर स्मारक के रूप में कुछ लेना चाहता था। शोप बहुत बड़ी थी। हम इधर उधर देख रहे थे तभी कुछ कांच का सामान टूटने की आवाज आई। सबकी निगाहें उधर उठ गई। एक स्त्री के हाथ से एक बोतल नीचे गिर कर फूट गई थी, उसका अन्दर का सारा तरल पदार्थ जमीन पर फैल गया था। मैं टकटकी लगाये उधर देखता रहा कि अब जरूर इस स्त्री से उस बोतल का पैसा वसूला जायगा। एसा कुछ नहीं हुआ। शोप के एक कर्मचारी ने बोतल के टूकड़े उठाए और तरल पदार्थ साफ किया। स्त्री से पैसा मांगने की बजाय वह पूछने लगा कि उसे कहीं लगी तो नहीं। यह अनुभव कुछ साल पहले थाईलेण्ड में मेरे साथ हुए एसे ही हादसे के एकदम विपरीत था।
थाईलेण्ड (Thailand) में हमें घुमाने वाले द्वारा जबर्दस्ती एक दुकान पर ले जाया गया। ताकि हम वहां से कोई खरीदारी करें वहां टूर कम्पनियां हर पर्यटक को हीरे जवाहरात व चाकलेट की फेक्ट्रियों में ले जाती हैं ताकि वहां बिक्री हो । पर्यटक मूर्ख बन इसका विरोध नहीं करते। हमारे साथ भी एसा ही हुआ और इस दौरान हमारे साथी के हाथ से एक दुकान पर कांच का कोई सामान नीचे गिर पड़ा। दुकान ने तपाक से उस वस्तु का बिल हमें थमा दिया। मैंने बहुत झगड़ा किया, हमारी क गलती, हम तो यहां आना नहीं चाहते थे वगैरह मगर नहीं माने। मैं भी अड़ गया इस चीज का पैसा तो हम नहीं देंगे। हमारे साथ जो टूर मेनेजर था में उस पर पड़ा कि तेरे कमीशन के चक्कर में ये सब हो रहा है। दोनों ने अपनी भाषा में के बात की अन्ततः यह तय हुआ कि जितनी राशि का सामान टूटा है उतनी राशि क कोई चीज हम वहां से खरीद लें। हमने भी मान लिया और कोई चारा भी नहीं था।
ड्यूटी फ्री शोप से सामान खरीदने के बाद आप वापस बाहर नहीं जा स थे, आपको कनाडा (Canada) के बाहर निकलना ही पड़ता है। हमारे पास तो कार था, इस कारण हमे सामान नहीं दिया गया। हम कार लेकर कनाडा की तरफ जा रहे पुल पर आये तो हमारा सामान वहां लाकर दे दिया गया। पुल पार किया और हम कनाडा स बाहर निकल अमेरिका में पहुँच गये। यहां जगह जगह कस्टम के अधिकारी सबकी डिक्कियां खुलवा कर सामान की जांच कर रहे थे, हमने भी अपना सामान खोल कर बता दिया, कुछ खास नजर नहीं आया तो उन्होंने हमें जाने दिया। हम वापस अमरीकी शहर बफेलो में पहुँच गये।
न्यूयार्क (New york) वापसी की हमारी उड़ान शाम को थी। दिन चढ़ने लगा था तो खाने का जुगाड़ करने की सोची। यहां कई भारतीय रेस्टोरेन्ट
(Indian restaurant)
नजर आये। हमें क्याब एण्ड करी नामक रेस्टोरेन्ट ठीक महसूस हुआ, उसके वहां पार्किंग की बहुत जगह थीं तो हम उसी में घुस गये। रेस्टोरेन्ट एक पाकिस्तानी परवेज मिन्हास का था। मिन्हास नाम सुना तो मैंने कहा ये तो हिन्दुओं में भी होते हैं। इस पर उसने कहा कि उसके बाप दादा हिन्दू राजपूत ही थे। आज भी उसके परिवार में कई लोगों के नाम के आगे सिंह लगता है। परवेज बहुत खुशमिजाज व्यक्ति था जो 20-25 साल पहले लाहौर से यहां आकर बस गया था।
यहां भी खाना बफे में ही उपलब्ध था मगर कीमत सिर्फ 12 डालर थी जो वाजिब थी। खाने में पपड़ी चाट, रगड़ा पेटिस जैसी चीजें देख कर मैं हैरान रह गया। गाजर का हलवा, खीर, जीरा राईस, दाल, रोटी अन्य सब्जियां सब देख कर ही ऐसा लगता था जैसे हम भारत के ही किसी रेस्टोरेन्ट में हों। खाने का स्वाद भी बहुत अच्छा था।
परवेज को जब पता चला कि हमारी फ्लाईट शाम की है तो उसने कहा कि हम चाहें तो यहीं वक्त गुजार सकते हैं। वहां लोबी में सोफे लगे थे, टी.वी. चल रहा था। यहां शौचालय में पहली बार मुझे टायलेट पेपर के साथ साथ एक छोटी सी पानी की केतली के दर्शन हुए। भारतीय रेस्टोरेन्ट था तो एक आम भारतीय की आवश्यकताओं का भी भलि भांति खयाल रखा गया था।
हमारे पास तीन-चार घंटे थे। सोचा थोड़ा बफेलो में ही घूम लिया जाय। हम डाउन टाउन इलाके की तरफ बढ़ चले। यहां एक बड़ा सा स्टेडियम था जिसमें कोई फुटबाल या बेसबाल का मेच हो रहा था। बेसबाल यहां बहुत लोकप्रिय है, जिस तरह हमारे यहां क्रिकेट की दीवानगी है वैसी ही यहां बेसबाल को लेकर हैं। मैं छोटा था जब मेरी बड़ी बहनों के स्कूल में जरूर मैंने उन्हें बेसबाल खेलते देखा था मगर बाद में यह कैसे लुप्त हो गया पता ही नहीं चला।
मेच के कारण बहुत भीड़ थी। जगह जगह सड़कें बन्द थी। पास ही ट्राम का स्टेशन था। हम गाड़ी खड़ी करके वहीं बैठ गये। ट्राम स्थानीय आवागमन का बहुत अच्छा साधन है। हमारे यहां पहले कई शहरों में ट्रामें चलती थी, पता नहीं क्या सोच कर इन्हें बन्द कर दिया गया। यूरोप व अमेरिका के शहरों में आज भी इनका चलन बहुतायत से नजर आता है।
भारतीय शहरों में इन्हें अगर वापस चलाया जाय तो यह एक अच्छी पहल होगी। मेट्रो रेलों पर हजारों करोड़ रूपये खर्चने की बजाय पांच-पांच, दस दस लाख की आबादी वाले शहरों में इन्हें आसानी से चलाया जा सकता है। इनकी पटरियां सड़क के अन्दर होती हैं इसलिये जब ट्राम नहीं गुजर रही होती है उस वक्त ट्राफिक सामान्य रूप से चलता रहता है।
जयपुर, अहमदाबाद, पूना जैसे कई शहरों में बसों के लिये रेपीड ट्रांजिट सिस्टम के नाम पर जो अरबों रूपये खर्च किये गये तथा व्यस्त सड़कों का महत्वपूर्ण भाग इनके लिये आरक्षित कर दिया गया वह नितान्त अव्यावहारिक सिद्ध हुआ है। इसकी बजाये तो अत्याधुनिक ट्रामें चलाई जाती तो ज्यादा उपयोगी व कारगर सिद्ध होती और व्यस्त सड़कों को भी कोई आंच नहीं आती।
नीले परबत बरफानी झीलें
Editorial

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