Pratahkal - Lekh - Suresh Goyal
आलोक जोशी
भारतीय राजनीति (Indian politics) में कर्नाटक (Karnataka) की अहमियत जगजाहिर है । पिछले कई महीनों से वहां की राजनीतिक हलचल पर पूरे देश की निगाहें टिकी थीं। कर्नाटक का चुनाव इसलिए भी काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा था, क्योंकि यह देश के अमीर राज्यों में एक है। यह उन पांच राज्यों में शुमार है, जो 'वन ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी' बनने की दौड़ में लगे हैं। हालांकि, अभी पांचों में से एक के लिए भी यह मंजिल आसान नहीं लगती, पर आर्थिक मोर्चे पर कर्नाटक जिस मुकाम पर पहुंचा है, उसे भी एक तरह का चमत्कार कहा जा सकता है, क्योंकि दस साल पहले यह राज्यों की जीडीपी के पैमाने पर देश में 16वें नंबर पर होता था ।
प्रति व्यक्ति आय के पैमाने पर भी कर्नाटक पांचवें स्थान पर है। भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार, 2020-21 में इसकी प्रति व्यक्ति जीडीपी 2,36,451 रूपये पर पहुंच गई थी। हालांकि, गोवा, सिक्किम, दिल्ली व चंडीगढ़ इस सूची में आगे थे। मगर इन सबसे कर्नाटक का मुकाबला नहीं किया जा सकता। पिछले 10 वर्षों में, खासकर 2010 के बाद के दशक में इसने जिस तेजी से तरक्की की है, वह वास्तव में मिसाल है। राज्य की जीडीपी (JDP) इस दौरान हर साल लगभग 10 फीसदी से ज्यादा की रफ्तार से बढ़ती रही। 2013-14 में तो यह वृद्धि 17.44 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। हालांकि, 2019-20 में यह रफ्तार गिरकर 9.28 प्रतिशत हुई, और उसके बाद कोरोना ने बाकी दुनिया की तरह कर्नाटक को भी झटका दिया, जिससे इसकी विकास दर 2020-21 में बस एक फीसदी रह गई, मगर इस झटके से उबरने में भी यह राज्य काफी तेजी से सफल रहा। बाद के वर्षों में इसकी जीडीपी फिर 10 प्रतिशत से ज्यादा की रफ्तार से बढ़ने में कामयाब रही।
बेंगलुरू (Bangalore) कई दशकों से भारत की 'सॉफ्टवेयर राजधानी' रहा है। कर्नाटक की तरक्की में और कोरोना के झटके से उबरने में भी सॉफ्टवेयर या डिजिटल इकोनॉमी (Digital economy) का बहुत बड़ा योगदान रहा। सॉफ्टवेयर, सर्विसेज, एजुकेशन टेक्नोलॉजी और गिग इकोनॉमी ने कोरोना के झटके से उबरने में खूब मदद की । प्रदेश की जीडीपी में यह दिखता भी है। राज्य की जीडीपी का 64 प्रतिशत हिस्सा सर्विसेज से ही आता है, जबकि 21 फीसदी उद्योगों से और 15 प्रतिशत खेती से । यही नहीं, निर्यात के मोर्चे पर भी यह देश के अग्रणी राज्यों में एक है। सेवाओं के निर्यात में यह देश में सबसे आगे है, तो उत्पादों के निर्यात में चौथे नंबर। पिछले वित्त वर्ष 2022-23 में भारत की जीडीपी में कर्नाटक का हिस्सा 8.2 प्रतिशत था । 2018 से 2023 तक, यानी पांच साल का हिसाब देखें, तो इस राज्य की जीडीपी में 68 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है, जबकि इसी दौरान भारत की जीडीपी 59 प्रतिशत बढ़ी।
बात सिर्फ कमाई की नहीं है। कर्ज और खर्च के मामले में भी राज्य का प्रदर्शन काफी अच्छा रहा है। कोरोना के तुरंत बाद सबकी तरह कर्नाटक सरकार को भी भारी कर्ज लेना पड़ा और खर्च बढ़ने से सरकारी खजाने का घाटा भी बेकाबू होता नजर आया। मगर इन दोनों मोर्चों पर राहत आने में भी बहुत देर नहीं लगी। पिछले पांच साल में राज्य का सरकारी घाटा लगभग 98 प्रतिशत बढ़ा है। 2018 में यह 31, 101 करोड़ रूपये था, जबकि 2022-23 में इसके 61,564 करोड़ रूपये होने का अनुमान राज्य के बजट में दिया गया है। 2023-24 के बजट में सरकारी घाटा 60,581 करोड़ रूपये होने का अनुमान है, जो राज्य की जीडीपी का 2.6 प्रतिशत होगा, जबकि इसी समय भारत का सरकारी घाटा जीडीपी का 5.9 प्रतिशत रहने का लक्ष्य रखा गया है।
महंगाई के मोर्चे पर भी कर्नाटक कहीं बेहतर दिखता है। मार्च में यहां खुदरा महंगाई दर 5.58 फीसदी थी, जबकि राष्ट्रीय औसत 5.66 प्रतिशत था। पिछले वित्त वर्ष में यहां महंगाई 4.19 से 6.39 प्रतिशत के दायरे में ही रही और किसी भी महीने में यह राष्ट्रीय औसत से ऊपर नहीं जा सकी। सवाल यह है कि तेज विकास के बाद भी यहां महंगाई और बेरोजगारी कैसे समस्या बनी हुई है? वह भी तब, जब कर्नाटक में बेरोजगारी दर ज्यादातर दूसरे राज्यों के मुकाबले बेहद कम है।
इसका पहला जवाब तो इस बात से मिलता है कि यदि राजधानी बेंगलुरू को नक्शे से हटा दिया जाए, तो कर्नाटक की जीडीपी 36 प्रतिशत कम हो जाएगी। राज्य के ताजा आर्थिक सर्वेक्षण के हिसाब से यहां के शेष 29 जिलों में से किसी एक की भी जीडीपी में हिस्सेदारी 10 फीसदी तक नहीं पहुंचती। जीडीपी में 36 फीसदी हिस्सेदारी वाले बेंगलुरू के शहरी इलाके में प्रदेश की कुल आबादी का लगभग छठा हिस्सा रहता है । इसका अर्थ है कि इस इलाके को छोड़कर बाकी प्रदेश की औसत आमदनी भी काफी गिर जाएगी। वैसे, एक और मोर्चे पर कर्नाटक की समस्या विकट दिख रही है। यहां रोजगार गरीबी मिटाने में मदद नहीं कर पा रहा है। इसका अर्थ यह है कि जो लोग काम पा गए हैं, उनमें भी ऐसे लोगों की बड़ी संख्या है, जो कमा तो रहे हैं, पर गरीबी रेखा पार नहीं कर पा रहे।
गरीबों की गिनती के तौर-तरीकों पर काफी सवाल हैं, पर सरकार की तरफ से 2011-12 में जारी आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, उस वक्त कर्नाटक की आबादी का पांचवां हिस्सा गरीबी रेखा के नीचे था। राज्य के आर्थिक सर्वे में दिए गए जिलावार कमाई के आंकड़ों को देखने पर तस्वीर कुछ साफ होती है। बेंगलुरू शहरी जिले की औसत मासिक कमाई 6.2 लाख रूपये है, जिसके बाद दक्षिण कन्नड़ (4.4 लाख ), उडुपी (3.7 लाख), चिकमंगलूर (3.34 लाख), बेंगलुरू ग्रामीण (3.19 लाख) और शिवमोगा (2.7 लाख) आते हैं। बाकी 24 जिले ऐसे हैं, जिनकी कमाई राज्य के औसत से कम है। सबसे कम कमाई कलबुर्गी
जिले में है, जहां यह औसत 1.25 लाख रूपये ही रह जाती है। साफ है, कर्नाटक की सबसे बड़ी चुनौती समृद्धि के टापुओं और गरीबी के सागर का भेद मिटाना है। इसके लिए इसे अपने बजट का बड़ा हिस्सा बड़े शहरों की जगह गांवों और पिछड़े इलाकों पर खर्च करना होगा। इससे एक दूसरी समस्या भी हल हो सकती है। देश की तरक्की में महत्वपूर्ण भूमिका निभानेवाले शहर बेंगलुरु का हाल बेहद खराब है ।
बढ़ती भीड़ और चरमराता इन्फ्रास्ट्रक्चर यहां लोगों के लिए जी का जंजाल बना हुआ है। अगर राज्य के दूसरे हिस्सों में भी सुविधाएं बेहतर हो जाएंगी, तो शायद इस शहर का बोझ भी कम होगा और उसे सुधारना भी मुमकिन हो सकेगा ।
Editorial

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