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कर्नाटक की हार का मर्म समझे भाजपा
By EditorialPublished on
कर्नाटक चुनाव (Karnataka election) में भाजपा (BJP) और कांग्रेस (Congress) की जीत का विश्लेषण तमाम राजनीतिक विश्लेषक (Political analyst) अपने-अपने ढंग से कर रहे हैं। कोई इसे राष्ट्रीय मुद्दों पर स्थानीय मुद्दों की जीत बता रहा है तो कोई पिछली सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार को इसका मूल कारण बता रहा है। हमेशा की तरह छद्म पंथनिरपेक्षतावादी धड़ा इसे सांप्रदायिकता और ध्रुवीकरण की राजनीति पर एकता एवं भाईचारे की जीत करार दे रहा है।
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प्रणय कुमार
कर्नाटक चुनाव (Karnataka election) में भाजपा (BJP) और कांग्रेस (Congress) की जीत का विश्लेषण तमाम राजनीतिक विश्लेषक (Political analyst) अपने-अपने ढंग से कर रहे हैं। कोई इसे राष्ट्रीय मुद्दों पर स्थानीय मुद्दों की जीत बता रहा है तो कोई पिछली सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार को इसका मूल कारण बता रहा है। हमेशा की तरह छद्म पंथनिरपेक्षतावादी धड़ा इसे सांप्रदायिकता और ध्रुवीकरण की राजनीति पर एकता एवं भाईचारे की जीत करार दे रहा है। भाजपा की चाहे हार हो या जीत यह धड़ा सदैव यही राग अलापता है। भाजपा यदि जीती तो ये उसे ध्रुवीकरण एवं सांप्रदायिक गोलबंदी की जीत और यदि हारी तो सांप्रदायिकता, ध्रुवीकरण एवं नफरत की राजनीति की हार बताते हैं । ये छद्म पंथनिरपेक्षतावादी विश्लेषक ऐसे सुविधावादी, सरलीकृत एवं एकपक्षीय विश्लेषण के माहिर खिलाड़ी हैं। दूसरी ओर, वे बड़ी चतुराई से कांग्रेस एवं अन्य क्षेत्रीय दलों द्वारा किए जाने वाले घनघोर तुष्टीकरण को जानबूझकर अनदेखा कर देते हैं ।
कर्नाटक में हुए इस चुनाव में भी बजरंग दल पर प्रतिबंध लगाने की बात कर कांग्रेस ने अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण का खेल खेला और उसका उसे भरपूर लाभ भी मिला। हद तो तब हो गई जब उसने पीएफआई जैसे जिहादी संगठन के साथ बजरंग दल की तुलना की । इसका सीधा असर अल्पसंख्यक मतदाताओं पर पड़ा और पारंपरिक रूप से जेडीएस के प्रभाव वाले क्षेत्रों में भी उन्होंने लामबंद होकर कांग्रेस के पक्ष में मतदान किया। जेडीएस (JDS) को पांच प्रतिशत कम और कांग्रेस को पांच प्रतिशत अधिक मतों का सामूहिक एवं रणनीतिक हस्तांतरण अल्पसंख्यकों की नीति एवं मंशा को पूर्णतया स्पष्ट करता है।
अल्पसंख्यकों (Minorities) का वोट बटोरने के उद्देश्य से कांग्रेस ने उस हिजाब आंदोलन का भी खुलकर समर्थन किया था, जिसके विरोध में ईरान से लेकर पूरी दुनिया की प्रगतिशील एवं न्याय तथा समानता में विश्वास रखने वाली स्त्रियां आज भी संघर्षरत हैं। जिस टीपू सुल्तान के शासनकाल में बड़ी संख्या में बहुसंख्यकों का नरसंहार हुआ, उसे भी कांग्रेस एक नायक की तरह प्रस्तुत करती रही है। दरअसल भारतीय राजनीति में सेक्युलरिज्म का अर्थ ही अल्पसंख्यकों का व्यापक तुष्टीकरण है। सेक्युलरिज्म के नाम पर अजब-गजब फैसले किए जाते हैं। भारत की राजनीति (Politics of India) में सेक्युलरिज्म उस गंगोत्री की तरह है, जिसमें डुबकी लगाने के बाद राजनीतिक दलों और नेताओं के न केवल सारे पाप धुल जाते हैं, बल्कि चुनावी वैतरणी भी पार लग जाया करती है । विभाजन, पलायन, उत्पीड़न, मतांतरण एवं तुष्टीकरण आदि का दंश झेलकर भी कथित सेक्युलरिज्म के सुर में सुर मिलाना - इस देश में उदारता और प्रगतिशीलता का प्रतिमान बना दिया गया है। बात-बात पर पंथनिरपेक्षता की दुहाई देने वाले राजनीतिक दल, नेता एवं तथाकथित बुद्धिजीवी इस वास्तविकता की अनदेखी कर देते हैं कि भारत का मूल चरित्र यदि पंथनिरपेक्ष एवं बहुलतावादी है तो उसमें सर्वाधिक योगदान इस देश के बहुसंख्यकों का ही है ।
देश के अलग-अलग हिस्सों में आए दिन होने वाले दंगे-फसाद, आतंक - उपद्रव आदि को देखकर सार्वजनिक विमर्श में प्रायः यह प्रश्न तैरता मिल जाता है कि क्या जनसांख्यिकीय संतुलन बिगड़ने के बाद भारत का पंथनिरपेक्ष स्वभाव बना और बचा रह सकेगा? पंथनिरपेक्षता का एकतरफा ढोल पीटने वाले लोग आखिर क्यों कैराना, केरल, कश्मीर और बंगाल का नाम गलती से भी अपनी जुबान पर नहीं लाना चाहते ? क्या पंथनिरपेक्षता को बनाए एवं बचाए रखने की जिम्मेदारी केवल बहुसंख्यकों की बनती है या यह सभी वर्गों की साझा जिम्मेदारी है ?
भारतीय राजनीति में भाजपा इसके अपवाद के रूप में जानी जाती थी। विकास, सुशासन, सर्वसमावेशी हिंदुत्व एवं राष्ट्रीयता उसकी मूलभूत पहचान रही है। व्यक्ति से बड़ा दल एवं दल से बड़ा देश उसका उद्घोष रहा है। न्याय सबके लिए, पर तुष्टीकरण किसी का नहीं - उसकी संस्कृति रही है। सर्वस्पर्शी विकास, समान व्यवहार एवं कानून का राज उसका घोषित लक्ष्य रहा है, परंतु गत वर्ष राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के बाद से भाजपा अल्पसंख्यकों विशेषकर मुसलमानों को रिझाने - लुभाने की दृष्टि से तमाम कोशिशें कर रही है । इस दृष्टि से उसने मुस्लिम समुदायों के बीच सूफी संवाद महाअभियान, स्नेह-यात्रा आदि का औपचारिक आयोजन तो किया ही, बोहरा, बरेलवी, शिया एवं हाल में पसमांदा मुसलमानों को साथ लाने के लिए भी अनेक लुभावने कार्यक्रम आयोजित किए और उन्हें बढ़-चढ़कर प्रचारित भी किया।
'सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास एवं सबका प्रयास' के स्थान पर 'तृप्तीकरण' और 'संतृप्ति' की बात जोर-शोर से कही जाने लगी।
भाजपा के स्वाभाविक एवं परंपरागत मतदाताओं तथा कार्यकर्ताओं को उसकी यह बदली बदली चाल रास नहीं आई। उसके बदले रवैये ने उन्हें निराश कर दिया, जिसका खामियाजा उसे कर्नाटक की हार के रूप में भुगतना पड़ा। भाजपा के इस बदले रवैये के कारण ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा चुनाव के अंतिम चरण में दिए गए वक्तव्य- कांग्रेस रामलला के बाद बजरंग बली को भी ताले में बंद करना चाहती है' का कोई व्यापक असर नहीं पड़ा ।
वास्तव में आज का मतदाता गोलमोल एवं दोहरी बातें बिल्कुल पसंद नहीं करता। उसे नीति एवं नीयत में सर्वथा स्पष्ट तथा इरादों में अटल नेता चाहिए। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ और असम में हिमंत बिस्वा सरमा को चुनाव- दर चुनाव मिलने वाली सफलता बहुत कुछ कहती है। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को उस सफलता में निहित सार एवं संदेश को समय रहते समझना चाहिए, अन्यथा छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में जीत की राह भी उसके लिए आसान नहीं होगी।

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