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अनुशासित श्राविका थीं सुहाग बाई
By EditorialPublished on
विलेपार्ले (Vile Parle) प्रवासी सुहागबाई का गत दिनों निधन हो गया। उनका संपूर्ण जीवन धार्मिक गतिविधियों में बीता। झालों की मदार के मेहता परिवार की बेटी सुहाग बाई का विवाह छोटा भानुजा गांव के पृथ्वीराज वडालमिया के साथ हुआ। विवाह के बाद वे मुंबई (Mumbai) आकर बस गई। विलेपार्ले में होने वाली जैन समाज (Jain Samaj) की सभी गतिविधियों में यह जीवन पर्यंत सक्रिय रही।

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मुंबई । विलेपार्ले (Vile Parle) प्रवासी सुहागबाई का गत दिनों निधन हो गया। उनका संपूर्ण जीवन धार्मिक गतिविधियों में बीता। झालों की मदार के मेहता परिवार की बेटी सुहाग बाई का विवाह छोटा भानुजा गांव के पृथ्वीराज वडालमिया के साथ हुआ। विवाह के बाद वे मुंबई (Mumbai) आकर बस गई। विलेपार्ले में होने वाली जैन समाज (Jain Samaj) की सभी गतिविधियों में यह जीवन पर्यंत सक्रिय रही। अनुशासन प्रिय जीवन जीने वाली सुहाग बाई ने 25 वर्ष पहले पति के देहांत होने के बाद भी धर्म साधना करते हुए अपने कर्मों की निर्जरा की।
अपने जीवन काल में उन्होंने चौविहार साधना का पूरा पालन किया। वह अपने जीवन काल में सभी जैन तीर्थों के दर्शन कर अच्छा आदर्श स्थापित कर गई। पति के निधन के बाद परिवार को एक सूत्र में बांध उन्होंने अपने सामाजिक दायित्व को निभाया। उनके सबसे बड़े पुत्र लक्ष्मीलाल मेवाड़ संघ के कोषाध्यक्ष हैं। पुत्र फुलचंद जीवराज व रमेश व्यापार में सक्रिय है। मेवाड़ गुरु परंपरा के अंबेश गुरु से लेकर सौभाग्य मुनि, मदन मुनि व कोमल मुनि का सानिध्य प्राप्त करने वाली सुहागबाई हमेशा कहा करती थी कि मनुष्य जीवन में हमें धर्म को प्रधानता देनी चाहिए। मृत्यु के बाद धन नहीं धर्म ही हमारे साथ आता है। वे काफ़ी समय से अस्वस्थ चल रही थी। इस दौरान पूरे परिवार ने उनकी खूब सेवा की। उनके पति पृथ्वीराज आजादी के पूर्व मुंबई आने वाले मेवाड़ जैन समाज के प्रमुख लोगों में से एक थे। उनका मेवाड़ संघ के निर्माण सहित 52 गांव की पंचायती में भी प्रमुख योगदान रहा है।

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