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कांग्रेस की कर्नाटक जीत का अर्थ
By EditorialPublished on
क्या कर्नाटक के चुनाव (Karnataka elections) का 2024 के लोकसभा चुनावों (Lok Sabha elections) पर भी असर पड़ेगा? 1990 के दशक से आज तक यह प्रदेश विधानसभा (Assembly) और लोकसभा (Lok Sabha) के लिए अपनी अलग-अलग पसंद जाहिर करता रहा है। लेकिन इतना तय है कि इस जीत ने कांग्रेस को विपक्ष के अन्य सहयोगियों के मोल-तोल से जूझने की शक्ति दे दी है।
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शशि शेखर
क्या कर्नाटक के चुनाव (Karnataka elections) का 2024 के लोकसभा चुनावों (Lok Sabha elections) पर भी असर पड़ेगा? 1990 के दशक से आज तक यह प्रदेश विधानसभा (Assembly) और लोकसभा (Lok Sabha) के लिए अपनी अलग-अलग पसंद जाहिर करता रहा है। लेकिन इतना तय है कि इस जीत ने कांग्रेस को विपक्ष के अन्य सहयोगियों के मोल-तोल से जूझने की शक्ति दे दी है।
विधानसभा के चुनाव में दस्त बहुमत हासिल कर शाबाशी का हक हासिल कर लिया है। यह प्रदेश पहले से देश की सबसे पुरानी पार्टी को संजीवनी देने का काम करता रहा है, लेकिन इस बार पार्टी को एक बड़े राज्य में जीत की बेहद जरूरत थी ।
इस चुनाव में कांग्रेस ने पुरानी गलतियां न दोहराने का संकल्प कर रखा था। कार्यकर्ताओं और नेताओं को बेजा बोल या अंदरूनी मतभेद सार्वजनिक तौर पर न व्यक्त करने की कड़ी हिदायत थी। यह काम आसान न था । एस सिद्धरमैया और डी के शिवकुमार में पुरानी तनातनी के कारण भितरघात का भय था । इससे निपटने के लिए अनोखी रणनीति अपनाई गई। राहुल गांधी की 'भारत जोड़ो यात्रा' के दौरान दोनों नेता एक-दूसरे को गलबहियां डाले दिखे थे। यह सिलसिला चुनाव तक कायम रहा। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने भी अपने चुनावी अभियानों को नए तेवर दिए। इसके चलते कभी प्रियंका डोसा बनाती दिखतीं, तो राहुल दौड़ती सिटी बस में महिलाओं से बात करते होते थे। 'भारत जोड़ो यात्रा' के दौरान भी राहुल गांधी ने यहां करीब तीन हफ्ते का वक्त बिताया था। वह जिन जगहों से गुजरे, वहां पर कांग्रेस का बेहतर प्रदर्शन बताता है कि राहुल अपनी पुरानी छवि बदलने में कामयाब हुए हैं। हिमाचल के बाद कर्नाटक की जीत ने पार्टी के अंदर और बाहर प्रियंका गांधी के बढ़ते प्रभाव को साफ तौर पर रेखांकित किया है।
आप चाहें, तो याद कर सकते हैं कि हिमाचल में उन्होंने चुनाव की कमान अकेले संभाली थी। सोनिया गांधी ने स्वास्थ्य कारणों से खुद को दूर रखा था और राहुल 'भारत 'जोड़ो यात्रा' में व्यस्त थे। कर्नाटक में राहुल और प्रियंका, दोनों ने अपने भाषणों और भेंट वार्ताओं में पार्टी या खुद को 'प्रोजेक्ट' करने की जगह आम आदमी के दुख-दर्द को तरजीह दी। यही वजह है कि कांग्रेस ने इस चुनाव में प्रदेश के सभी हिस्सों और समुदायों में बेहतर प्रदर्शन किया। खासतौर पर लिंगायत बहुल सीटों में कांग्रेस ने प्रतिद्वंद्वियों से ज्यादा सीटें हासिल कर प्रेक्षकों को चौंका दिया है। इस समुदाय के सबसे प्रभावी नेता येदियुरप्पा तक कांग्रेस के विजय रथ की रास नहीं थाम सके। इसके साथ वोक्कालिगा वोटों में सेंधमारी कर कांग्रेस ने जनता दल (एस) की भी नींव पर प्रहार किया है। जद (एस) के नेतृत्व और कार्यकर्ताओं को सपने में आशंका नहीं रही होगी कि घर का चिराग तक अपनी सीट गंवा देगा। रामनगरम् से एच डी कुमारस्वामी के पुत्र निखिल की हार बताती है कि वोटर को बपौती नहीं माना जा सकता। यह चुनाव कांग्रेस ने हुकूमत के ढीले रवैये और भ्रष्टाचार के विरूद्ध लड़ा था । आजिज मतदाताओं ने भी धर्म के जंजाल में फंसे बिना सिर्फ बदलाव के लिए वोट दिया। यही वह मुकाम है, जहां से कांग्रेस की चुनौती शुरू होती है। उसे पांच साल स्थिर सरकार देनी है और इसके लिए ऐसा मुख्यमंत्री चुनना है, जो जनहित के एजेंडे को आगे बढ़ा सके। सभी चुनाव पूर्व सर्वे में मुख्यमंत्री पद के लिए सिद्धरमैया को सर्वाधिक लोगों ने पसंद किया था। क्या आलाकमान उन्हें मौका देगा? क्या डी के शिवकुमार और उनके समर्थक इसका धैर्यपूर्वक समर्थन करेंगे? यह भी चर्चा है कि ये दोनों गुट यदि एक-दूसरे के निषेध पर दृढ़ हो जाते हैं, तो मल्लिकार्जुन खड़गे को कमान सौंपी जा सकती है। यदि ऐसा होता है, तो कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष कौन होगा? या, आम सहमति के अभाव में कर्नाटक के किसी अन्य नेता की बन आएगी? यकीनन, पार्टी इस पर मंथन कर रही होगी, मगर राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट की तनातनी को देखते हुए यह चुनौती विकराल हो जाती है। कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष सलीम अहमद ने डी के शिवकुमार को मुख्यमंत्री पद का सबल दावेदार बताकर आशंकाओं की आग में घी झोंक दिया है। कांग्रेस आलाकमान के लिए अगले कुछ दिन आग और पानी के होंगे।
अब भारतीय जनता पार्टी पर आते हैं। भाजपा ने सत्ता जरूर गंवाई है, पर आधार नहीं वह विधानसभा से सड़क तक सरकार की नाक में दम करने की क्षमता रखती है। हासिल आंकड़ों के मुताबिक, भाजपा ने शहरी क्षेत्रों में अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया है। क्या प्रधानमंत्री की जबरदस्त 'कैंपेनिंग' सत्ता-विरोधी रूझान को कम करने में सफल रही ? ग्रेटर बेंगलुरू का उदाहरण बहुत कुछ साफ कर देता है। यहां प्रधानमंत्री मोदी ने कई किलोमीटर लंबा रोड शो किया था। इस इलाके में भाजपा को कांग्रेस से ज्यादा सीटें मिली हैं।
यह प्रधानमंत्री के आकर्षण की मुनादी अवश्य करता है, परंतु भारतीय जनता पार्टी को सबक लेने की प्रेरणा भी यहीं से मिलनी चाहिए। नरेंद्र मोदी की चुंबकीय स्वीकार्यता के बावजूद यह सत्य है कि प्रदेशों के चुनाव स्थानीय मुद्दों पर लड़े जाते हैं। उदाहरण देता हूं। हिमाचल प्रदेश से मोदी का सीधा लगाव रहा है। उन्होंने वहां खुद को दांव पर लगा दिया था, मगर भाजपा हार गई। क्यों? मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर की अलोकप्रियता और संगठन की अंदरूनी दरारों से पार्टी का वोट बैंक लगातार रिस रहा था। कर्नाटक इस सिलसिले की अगली कड़ी साबित हुआ है।
भाजपा को तयशुदा तौर पर काम करने वाले क्षत्रपों की सख्त जरूरत है। उत्तर प्रदेश की सरकार और योगी आदित्यनाथ इसके जीते- जागते उदाहरण हैं। कर्नाटक के साथ उत्तर प्रदेश के नगर निकाय चुनावों और विधानसभा उप- चुनावों के नतीजे भी आए। दोनों उप-चुनाव भाजपा गठबंधन ने जीते। इसके साथ मेयर की सभी 17 सीटें और सर्वाधिक नगर पालिकाओं में जीत हासिल कर भगवा पार्टी ने अपना वर्चस्व बढ़ाने का काम किया है। सात वर्ष के सत्ता - काल के बावजूद एंटी इन्कंबेंसी को अपने से दूर रखना साधारण बात नहीं। जालंधर लोकसभा सीट का उप-चुनाव जीतकर आम आदमी पार्टी ने भी यही संदेश दिया है।
एक और बात | कर्नाटक में जनता दल (एस) अपने संस्थापक एच डी देवेगौड़ा की तरह वार्धक्य की ओर बढ़ रहा है। अगर पुरानी कहावत का सहारा लें, तो एच डी कुमारस्वामी उस बंदर की तरह घात लगाए बैठे थे, जो दो बिल्लियों की लड़ाई में रोटी उड़ा ले जाता है। पिछली बार कांग्रेस और भाजपा, दोनों बहुमत से दूर रहे थे और उन्हें मुख्यमंत्री बनने का मौका मिल गया था। इस बार उनको निराशा का सामना करना पड़ा है। क्या कर्नाटक के चुनाव का 2024 के लोकसभा चुनावों पर भी असर पड़ेगा? 1990 के दशक से आज तक यह प्रदेश विधानसभा और लोकसभा के लिए अपनी अलग-अलग पसंद जाहिर करता रहा है। लेकिन इतना तय है कि इस जीत ने कांग्रेस को विपक्ष के अन्य सहयोगियों के मोल तोल से जूझने की शक्ति दे दी है। यकीनन, आने वाले दिन राजनीति में रुचि रखने वालों के लिए दिलचस्प साबित होने जा रहे हैं।

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