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कर्नाटक से टूटेगी प्रदेशों में भाजपा की तंद्रा
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कर्नाटक (Karnataka) में रिवाज बरकरार रहा और भाजपा (BJP) को बेदखल कर कांग्रेस (Congress) सत्ता में आ गई। लेकिन जिस तरह के नतीजे आए, उसे सिर्फ रिवाज कहकर छोड़ना उचित नहीं होगा। हकीकत यह है कि भाजपा को प्रदेश में अब तक की दूसरी सबसे बुरी हार का सामना करना पड़ा है और उसके सामने अक्सर लाचार नजर आती रही कांग्रेस को दूसरी सबसे बड़ी जीत मिली है।

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नई दिल्ली : कर्नाटक (Karnataka) में रिवाज बरकरार रहा और भाजपा (BJP) को बेदखल कर कांग्रेस (Congress) सत्ता में आ गई। लेकिन जिस तरह के नतीजे आए, उसे सिर्फ रिवाज कहकर छोड़ना उचित नहीं होगा।
हकीकत यह है कि भाजपा को प्रदेश में अब तक की दूसरी सबसे बुरी हार का सामना करना पड़ा है और उसके सामने अक्सर लाचार नजर आती रही कांग्रेस को दूसरी सबसे बड़ी जीत मिली है। क्यों, इस पर भाजपा को गंभीर विचार करना पड़ेगा क्योंकि कर्नाटक न सिर्फ दक्षिण में पार्टी का अकेला गढ़ था बल्कि इसलिए भी क्योंकि इसी साल कई दूसरे राज्यों में चुनाव होने हैं और वहां भी कुछ वैसी ही समस्याएं हैं जैसी कर्नाटक में थीं। हालांकि उन राज्यों में कांग्रेस के लिए वैसी अनुकूल स्थिति नहीं है जैसी यहां थी। कर्नाटक के नतीजे ने वर्तमान राजनीति को ये चार कदम आगे बढ़ाकर उस मुकाम पर ला दिया है जहां से विमर्श का नया दौर शुरू होगा। नई रणनीतियां बनेंगी और लोकसभा चुनाव के लिए कमर कसी जाएगी। शनिवार को जय कर्नाटक के नतीजे आ रहे थे, उसी वक्त उत्तर प्रदेश निकाय चुनाव के भी नतीजे आ रहे थे जहां भाजपा ताबड़तोड़ गति से जीत रही थी। जालंधर लोकसभा उपचुनाव (Lok Sabha by-election) सीट की भी झलक दिख रही थी जहां आम आदमी पार्टी कांग्रेस ढाई दशक के दबदबे को खत्म कर कोसों आगे चल रही थी। लेकिन कर्नाटक के नतीजों में यह सब दब गया। कर्नाटक में विशेष रूचि का कारण यह जिज्ञाषा थी कि क्या कमजोर चेहरा, कमजोर प्रशासन और सत्ता विरोधी लहर के बावजूद भाजपा ऐसे दक्षिणी राज्य में रिवाज को तोड़ सकती है जहां कांग्रेस में अपेक्षाकृत मजबूत चेहरा है या जहां हिंदुत्व पर जाति का प्रभाव ज्यादा है। उत्तर आया- नहीं। भाजपा को इसक अहसास था, इसीलिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (PM Narendra Modi) समेत अन्य नेताओं को जोर लगाना पड़ा।
विपक्षी एकता की धुरी बन सकती है कांग्रेस
कर्नाटक का नतीजा एक ऐसे विमर्श को भी तेज कर सकता है जो कई विपक्षी क्षेत्रीय दलों को शायद रास न आए। वह विमर्श यह कि कांग्रेस विपक्षी एकता की धुरी बन सकती है। कर्नाटक की जीत ने कांग्रेस का मनोबल बढ़ाया है और यह मानकर चलना चाहिए कि विपक्षी एकता की जो तैयारी चल रही है, उसमें अब कांग्रेस बतौर नेता कूद सकती है। उसका परिणाम क्या होगा, वह देखने की जरूरत है लेकिन वह याद रखते हुए कि राज्य और देश के चुनाव अलग होते हैं।

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