Fighting with everyone
विनोद शर्मा

इमरान खान (Imran Khan) बेहद लोकप्रिय हैं, पर वह सत्ता से बाहर हैं। शहबाज शरीफ और उनके सहयोगी अपने उज्जवल अतीत की एक धुंधली छाया भर हैं, पर सत्ता में हैं। आपके लिए यह भले विरोधाभास हो, लेकिन इसका दूसरा नाम पाकिस्तान (Pakistan) है !
हमेशा गुत्थमगुत्था सियासी ताकतों के बीच वह फौज खड़ी है, जिसने हमेशा सियासतदां को शतरंज की बिसात पर प्यादों की तरह घुमाया है। फौज ने एक तरह से अपनी ही उपज नवाज शरीफ के साथ भी ऐसा तब तक किया था, जब तक कि वह विद्रोही नहीं हो गए थे। कहना न होगा, क्रिकेटर नायक से राजनेता बने इमरान खान ने जाहिर तौर पर अपनी कट्टर विरोधी पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) से बहुत कम सीखा है। तभी तो रावलपिंडी ( सैन्य मुख्यालय) के औजार बनने के लिए राजी होकर फौज के पाले में खड़े हो गए थे और 2018 में अपनी हुकूमत को पाकिस्तान में किया गया अनूठा प्रयोग बता दिया था।
उनकी हुकूमत या शासन में नई बात यह थी कि उसने दो समानांतर शक्ति केंद्रों को साथ मिला दिया था, एक, समय-समय पर निर्वाचित (नागरिक शासन) और दूसरा, स्थायी तौर पर स्थिर (फौज)। हालांकि, इस बेमेल शादी में तीन साल में ही खटास घुल गई। कई अन्य वजहों ने भी टूटन को बढ़ाया, उनमें सबसे अहम इमरान खान का यह इल्जाम था कि अमेरिका (America) ने पाकिस्तानी फौज का संचालन किया, ताकि मास्को और चीन की ओर विदेश नीति के झुकाव के लिए सजा के तौर पर इमरान सरकार को सत्ता से बेदखल किया जा सके । तत्कालीन सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा से अलगाव ने भी मामले को बदतर बना दिया। बाजवा एक समय हितैषी थे और प्रधानमंत्री के रूप में इमरान को उभारने में उनका हाथ था ।
नतीजा यह हुआ कि इमरान की पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) नेशनल असेंबली में अप्रैल 2022 में अविश्वास मत हार गई। छोटे क्षेत्रीय दल साथ छोड़ गए, जिनकी वजह से संसद में वह बहुमत हासिल था, जो सेना के संरक्षण के चलते नसीब हुआ था। जो कठपुतली ऐतिहासिक रूप से नवाज शरीफ और बेनजीर भुट्टो जैसे निर्वाचित नेताओं के ईद-गिर्द घूमती थी, वह फिर खेल में लौट आई।
जैसा कि उनकी आदत है, इमरान ने संसदीय नियमों को कचरे डिब्बे में डालकर तूफान से मुकाबले की कोशिश की। अपने चुने हुए राष्ट्रपति का इस्तेमाल करते हुए असेंबली को समय से पहले भंग करके चुनाव की सिफारिश कर दी । हालांकि, सुप्रीम कोर्ट में यह दांव पिट गया। कोर्ट ने नेशनल असेंबली के स्पीकर को अविश्वास मत का संचालन करने का निर्देश दिया। पीटीआई को आखिरकार मुंह की खानी पड़ी, क्योंकि इमरान ने सदन में वोट का सामना नहीं किया।
सत्ता जाने के बाद से ही पीटीआई सड़कों पर है। पंजाब के वजीराबाद में एक विरोध मार्च के दौरान हुए हमले के बाद इमरान ने फौज, खास तौर पर इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (आईएसआई) के एक मेजर जनरल (फैसल नसीर) को तीखा निशाना बनाया और साफ आरोप लगाया कि यह अधिकारी उन्हें मारने की साजिश कर रहा है। अपनी गिरफ्तारी से पहले जारी एक वीडियो में भी इमरान ने अपने आरोपों को दोहराया है। नागरिक सैन्य प्रतिष्ठान को इमरान की गिरफ्तारी के जवाब में पूरे पाकिस्तान में सड़कों पर व्यापक गुस्से से चिंतित होना चाहिए। जो विरोध खड़ा हो रहा है, उसकी ताकत, दिशा और लंबा खिंचने पर काफी कुछ निर्भर करेगा । यदि विरोध प्रदर्शन जारी रहते हैं, तो भी सैन्य मुख्यालय और लाहौर कॉप्स कमांडर के आवास पर हमले जैसी घटनाएं पीटीआई की मदद नहीं कर पाएंगी। सैन्य कमांडर सेना को सत्तारूढ़ गठबंधन के पक्ष में ही रखेंगे, भले ही लोकप्रियता घटे या लोग मूलभूत जरूरत आटे के लिए भी कतार में खड़े हों ।
ऐसा इसलिए भी है, क्योंकि सेना ऐसे हालात में तख्तापलट के बारे में सोच नहीं सकती। पाकिस्तान को आज लोकतांत्रिक देशों, आईएमएफ व विश्व बैंक जैसे वैश्विक संस्थानों से वित्तीय मदद की जरूरत है।
यदि इतिहास कोई मार्गदर्शक है, तो पाखंडी नेताओं पर, चाहे वे किसी भी पार्टी के हों, रावलपिंडी या फौजी सत्ता ने यकीन नहीं किया है। इसकी मिसाल मारी गई बेनजीर भुट्टो भी हैं और वह नवाज शरीफ भी, जो जीवित तो हैं, पर लंदन में स्व-निर्वासन भोग रहे हैं। दरअसल, इमरान की पीटीआई हाल के वर्षों में पीएमएल-एन और पीपीपी, दोनों से बड़ी हो गई है । तुलनात्मक रूप से युवा यह पार्टी वैध रूप से चार प्रांतों और पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) में समर्थन आधार के साथ पाकिस्तान-व्यापी होने का दावा कर सकती है। यह सुनने में विडंबनापूर्ण लगे, पर इस पार्टी की जन अपील भी इसके लिए बड़ी बोझ है। मौजूदा सैन्य प्रमुख जनरल असीम मुनीर के साथ इमरान के रिश्तों का खराब इतिहास भी एक वजह है।
साल 2019 में अपने पसंदीदा लेफ्टिनेंट जनरल फैज हमीद के लिए रास्ता तैयार करने के लिए इमरान ने आईएसआई प्रमुख के पद से असीम मुनीर को हटा दिया था । समग्र विवाद में खान के प्रति अमेरिका के गहरे अविश्वास को भी जोड़ दीजिए। इमरान ने हमेशा अमेरिका को इस क्षेत्र से बाहर निकलने के लिए कहा है, क्योंकि वह अमेरिकी मौजूदगी को अफगानिस्तान-पाकिस्तान समस्या की जड़ मानते हैं ।
इस साल के आखिर में होने वाले आम चुनावों से पहले वाशिंगटन पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज के साथ सहजता से व्यवहार कर रहा है। शहबाज आर्थिक संकट को यथासंभव ठीक करने की कोशिश कर रहे हैं और उन्होंने सैन्य मुख्यालय के साथ रिश्तों में खटास पैदा करने के लिए अभी तक कुछ भी नहीं किया है। पाकिस्तान में समझदार सलाह और सुलह की अनिवार्यताओं को सभी हितधारकों, खास तौर पर इमरान खान द्वारा समझा जाना चाहिए। इमरान की वीरता लोगों को प्रभावित कर सकती है, लेकिन उनकी भाग्य रेखाओं को नहीं। वह कई मोर्चों पर लड़ते हुए लड़ाई जीत नहीं सकते हैं। बहुत दूर पहुंचने के लिए कभी कुछ झुकना भी पड़ता है । अगर वह जिद करना जारी रखते हैं और आंदोलन की राजनीति (Politics) की सीमा को नहीं पहचानते हैं, तो उनके साझा दुश्मन उन्हें आपराधिक मामलों में चुनाव लड़ने से अयोग्य करार देने के लिए गिरोह बना सकते हैं। इसकी जिंदा मिसाल उनके कट्टर दुश्मन नवाज शरीफ हैं।
Editorial

Editorial

Next Story