PM Narendra Modi
नई दिल्ली : पिछले हफ्ते कर्नाटक चुनाव प्रचार (Karnataka Election campaign) के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) का बेंगलुरू (Bangalore) में रोड शो दो दिनों तक चला। जिसमें शहर के 10 लाख से अधिक निवासी सड़कों पर निकले। यह प्र.म. मोदी का कर्नाटक के विधानसभा चुनाव प्रचार के लिए अंतिम अभियान था। प्रधानमंत्री ने चुनावी राज्य में कई रैलियां कीं, लेकिन बेंगलुरू और मैसूरू में उनके रोड शो ने लोगों का ध्यान सबसे ज्यादा अपनी ओर खींचा। भाजपा नेताओं और सरकारी सूत्रों ने बताया कि मोदी के बड़े रोड शो अब सभी चुनावी अभियान योजनाओं और प्रधानमंत्री मोदी के अन्य राज्यों के दौरे का केंद्र बन गए हैं क्योंकि उन्हें सार्वजनिक रैली
(Public Rally)
की तुलना में लोगों की कई गुना अधिक प्रतिक्रिया और पब्लिक जुड़ाव मिलता है।
उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) में पिछले साल के विधानसभा चुनावों (Assembly elections) के दौरान वाराणसी (Varanasi) में प्रधानमंत्री के रोड शो की सफलता, गुजरात चुनाव के दौरान अहमदाबाद में उनका 'ऐतिहासिक और सबसे लंबा 50 किलोमीटर लंबा रोड शो और अब बेंगलुरू का रोड शो इसकी गवाही देता है। आखिर प्रधानमंत्री मोदी के रोड शो से क्या फर्क पड़ता है? इस तरह के आयोजन के दौरान लोग मोदी से निजी जुड़ाव का अनुभव करते हैं क्योंकि वह घंटों तक लगातार हाथ हिलाते और इशारे करते हैं, मिडिल क्लास के वोटर उन्हें अपने आसपास के इलाके में देखने के लिए बाहर आते हैं। वे सार्वजनिक रैली में नहीं जा सकते हैं। बुजुर्ग भी इस अभियान में शामिल हो रहे हैं। भाजपा के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि रोड शो में प्रधानमंत्री की तस्वीरों या वीडियो को करीब से लेकर लोगों अपनी यादों को रिकॉर्ड करने के साथ ही कहीं अधिक सहज प्रतिक्रिया जताते हैं।
मिडिल क्लास वोटर पब्लिक रैली में जाने से बचता है
भाजपा (BJP) के एक नेता ने कहा कि यह सब सार्वजनिक रैली में नहीं हो सकता है, जब प्रधानमंत्री मंच पर कुछ दूरी पर मौजूद रहते हैं। सबसे पहले तो बुजुर्ग और मध्यम वर्ग के वोटर पब्लिक रैली में जाने या अपने बच्चों को साथ लाने की जहमत नहीं उठाते हैं। लेकिन अगर प्रधानमंत्री का रोड शो रूट आपके पड़ोस में पड़ता है, तो इस बात की बहुत अधिक संभावना होती है कि ऐसे वोटर प्र.म. को देखने के लिए सड़क पर आएंगे। बेंगलुरू के रोड शो में इसकी झलक देखने को मिली, जब कई बुजुर्ग और बच्चों के साथ लोग प्रधानमंत्री को देखने के लिए सड़क पर कतारबद्ध नजर आए।

Karnataka election campaign
प्रधानमंत्री मोदी का निजी जुड़ाव
प्र.म. के रोड शो (Road show) में दूसरा बड़ा फायदा प्रधानमंत्री मोदी से निजी जुड़ाव का है। एक सूत्र ने कहा कि एक रैली की तुलना में सड़क के किनारे खड़ा एक शख्स रोड शो के दौरान प्र.म. मोदी को करीब से देख सकता है। साथ ही प्रधानमंत्री निजी रूप से बहुत संवादात्मक हैं और विपक्षी नेताओं की तुलना में बहुत अधिक ऊर्जा दिखाते हैं। वह आपको हाथ हिलाएंगे, आप पर फूल फेंक सकते हैं. यह किसी के लिए भी जिंदगी भर का यादगार पल होता है। जनता की प्रतिक्रिया कहीं अधिक सहज है क्योंकि लोग तस्वीरें क्लिक करते हैं और प्रधानमंत्री के वीडियो रिकॉर्ड करते हैं और फिर इन्हें सोशल मीडिया पर शेयर करते हैं।
रैली की तुलना 10 गुना लोगों तक पहुंच
इसलिए भाजपा ने महसूस किया है जुटाने के लिए बहुत कम कोशिश की जरूरत होती है। जबकि एक मामूली- सफल रैली से केवल 40,000 - 50,000 लोगों तक पहुंच बन सकती है, वहीं एक रोड शो उसकी तुलना में लगभग 10 गुना लोगों तक पहुंचता है। एक सूत्र ने बताया कि पिछले महीने तमिलनाडु (Tamil Nadu) के चेन्नई में भी प्रधानमंत्री के रोड शो को शानदार प्रतिक्रिया मिली थी, हालांकि यह चुनावी राज्य नहीं था । बहरहाल भाजपा को एक चुनाव प्रचार का नया तरीका मिल गया है। लेकिन प्र.म. के रोड शो में एक बड़ा संकट जनता के साथ मोदी की निकटता में सुरक्षा का मुद्दा बना हुआ है। हाल ही में रोड शो के दौरान उनकी गाड़ी पर मोबाइल फोन फेंके जाने की कुछ घटनाओं ने एजेंसियों को सतर्क कर दिया है। इसलिए बेंगलुरू में दो रोड शो के दौरान प्रधानमंत्री के वाहन पर और उसके आसपास सख्त एसपीजी सुरक्षा देखी जा सकती थी।
Editorial

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