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निकाय चुनावों को गंभीरता से लेने का समय
By EditorialPublished on
यदि हम इन चुनावों को भी विधानसभा (Assembly) या लोकसभा चुनावों (Lok Sabha elections) की भांति अधिक गंभीरता प्रदान करें तो यह हमारे लिए बहुत उपयोगी होगा . अगर यह कहा जाए कि इस वर्ष के अंत तक देश में चुनावी सरगर्मी बढ़ी रहेगी तो शायद ही किसी को कोई आश्चर्य हो । आखिर हर वक्त कहीं न कहीं किसी न किसी प्रकार के चुनाव चलते ही रहते हैं। इस वर्ष के आरंभ में पूर्वोत्तर के तीन राज्यों में चुनाव संपन्न हुए हैं। गत दिवस कर्नाटक (Karnataka) का जोरदार चुनाव अभियान खत्म हुआ। वर्ष के अंत तक लगभग पांच और राज्यों में चुनाव होन
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तरूण गुप्त
यदि हम इन चुनावों को भी विधानसभा (Assembly) या लोकसभा चुनावों (Lok Sabha elections) की भांति अधिक गंभीरता प्रदान करें तो यह हमारे लिए बहुत उपयोगी होगा ....
अगर यह कहा जाए कि इस वर्ष के अंत तक देश में चुनावी सरगर्मी बढ़ी रहेगी तो शायद ही किसी को कोई आश्चर्य हो । आखिर हर वक्त कहीं न कहीं किसी न किसी प्रकार के चुनाव चलते ही रहते हैं। इस वर्ष के आरंभ में पूर्वोत्तर के तीन राज्यों में चुनाव संपन्न हुए हैं। गत दिवस कर्नाटक (Karnataka) का जोरदार चुनाव अभियान खत्म हुआ। वर्ष के अंत तक लगभग पांच और राज्यों में चुनाव होने हैं।
फिर अगले साल सभी मुकाबलों में महामुकाबला माने जाने वाले लोकसभा चुनावों का कार्यक्रम नियत है। ऐसे में यह जानकर कि यह आलेख स्थानीय निकाय चुनावों की चर्चा पर केंद्रित है तो संभव है कि कुछ लोगों को उबासी भी आ सकती है। जब डिजिटल (Digital) और जमीनी स्तर पर चर्चा का विषय यही हो कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र (Democracy) और पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था (Economy) की कमान किसे मिलेगी तो निस्तेज पड़ी स्थानीय निकाय संस्थाओं की परवाह भला किसको हो । असल में, यही उदासीनता ही स्थानीय निकाय चुनावों में अपेक्षाकृत कम मतदान होने का एक प्रमुख कारण है। हमारे त्रि- स्तरीय लोकतंत्र में तृतीय स्तर पर स्थानीय निकायों की संकल्पना मूलभूत बुनियादी मुद्दों के बेहतर समाधान को केंद्र में रखकर की गई । स्मरण रहे कि लोग किसी देश या राज्य के निवासी होने के साथ ही मूलभूत रूप से उन स्थानीय आवासीय क्षेत्रों जैसी सूक्ष्म इकाई से जुड़े होते हैं, जहां वे रहते हैं। ऐसे में निकायों को लेकर मंशा यही थी कि स्थानीय सरकार आपके द्वार तक पहुंचे। क्या वास्तव में ऐसा हो सका है? हमारे शहरों के बढ़ते आकार को देखते हुए नगर निगम पार्षद वार्ड में आबादी का दायरा 30,000 से 50,000 के बीच पहुंचता दिख रहा है। ऐसे में प्रत्यक्ष जुड़ाव की बात भले ही ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी कायम हो, लेकिन शहरी स्तर पर यह कड़ी खासी कमजोर हुई है। इसका समाधान चुने हुए पार्षदों की संख्या बढ़ाने में नहीं हो सकता । आबादी के लिहाज से देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) में इस समय निकाय चुनाव चल रहे हैं। इनमें मेयर - चेयरपर्सन और पार्षदों के पदों के लिए करीब 20,000 प्रत्याशी चुनकर आएंगे। ऐसे में इस संख्या को और बढ़ाने का कोई कारगर लाभ होता नहीं दिखता। असल में, चुने हुए प्रतिनिधियों का प्रदर्शन और स्थानीय निकायों की क्षमता ही हमारे शहरी जीवन में सबसे बड़ी व्यथा है ।
हमारे शहर आर्थिक वृद्धि के इंजन हैं। जल्द ही देश की आधे से अधिक आबादी इन शहरों में वास करेगी। इन शहरों की दशा सुधारने की दिशा में पहला कदम तो यही उठाना होगा कि स्थानीय निकाय चुनाव मतदान में भारी बढ़ोतरी हो । इसके साथ ही जनता की सहभागिता को केवल चुनाव में भागीदारी तक ही सीमित नहीं किया जा सकता। ऐसे में प्रबुद्ध नागरिकों से यही अपेक्षा है कि वे विमर्श की शुरूआत करें, एजेंडा निर्धारित करें और नेताओं एवं जनप्रतिनिधियों को जवाबदेह बनाएं। ऐसी कई प्रत्यक्ष समस्याएं हैं, जिन्होंने समूचे शहरी परिदृश्य को अपनी चपेट में लिया हुआ है। इनकी थाह लेने के लिए आपको आर्किटेक्ट (Architect) या नगर नियोजक होने की आवश्यकता नहीं । उद्वेलित करने वाला कचरा प्रबंधन, कालबाह्य निकासी तंत्र और अक्षम सीवेज-प्रवाह परिशोधन क्षमताएं बड़ी दुखदायी हैं। ये अभिशाप हमारी प्रगति को अवरूद्ध कर हमें ऐसी शर्मनाक परिस्थितियों में रहने के लिए विवश करते हैं, जिसकी सभ्य समाज में कोई जगह नहीं हो सकती ।
मुद्दे एकदम सीधे - सपाट हैं। हमारे नगर निगमों का प्राथमिक दायित्व स्वच्छता के पैमानों पर खरे उतरने का है। इस मामले में निकाय जनप्रतिनिधि अक्सर असमर्थता जताते हैं। निःसंदेह, वे सर्वअधिकारों से संपन्न भले न हों, लेकिन फिर भी यह प्रश्न अवश्य उठता है कि क्या वे वह कार्य भी कर पा रहे हैं, जिनके लिए वे संवैधानिक रूप से सशक्त हैं? उनका विजन क्या है? क्या उन्होंने उचित मंचों पर प्रश्न उठाए, सही मुद्दों पर आवाज मुखर की, उचित प्राधिकारी संस्थाओं के समक्ष कारगर योजनाएं प्रस्तुत कर उन्हें उपयुक्त आवश्यकताओं से अवगत कराया? क्या उनके प्रयासों में गंभीरता और सक्रियता भाव स्पष्ट दिखा ? क्या उन्होंने जनता की राय को सही दिशा देने और उसे सत्ता के समक्ष रखने का प्रयास किया? भले ही उनके पास कार्यकारी अधिकार न हों, लेकिन नेता होने के नाते उनसे सामुदायिक एकीकरण की अपेक्षा तो सर्वथा उचित है। वस्तुतः, परिस्थितियों के समक्ष घुटने टेककर निराश होने वालों के बजाय हम स्थितियों का सामना कर समाधान खोजने वाले जनप्रतिनिधियों को प्राथमिकता दें।
हमारे नगर निगमों का राजस्व सृजन निराशाजनक है। विकसित और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले भारत में जीडीपी के अनुपात में निकाय राजस्व बहुत दयनीय स्तर पर है। ऐसे परिदृश्य में राज्यों एवं केंद्र सरकार पर निर्भरता स्वाभाविक है और निकाय स्वायत्तता एक मृगमरीचिका बनकर रह जाती है। जबकि राजस्व बढ़ाने की भारी गुंजाइश है। संपत्ति कर एवं जल कर में उपयुक्त वृद्धि और बेहतर अनुपालन, विज्ञापन होर्डिंग्स से आय और उचित आर्थिक हर्जाना आदि लगाकर राजस्व में भारी वृद्धि की संभावनाएं हैं। आखिर नगर निगमों को ऐसा करने से कौन रोक रहा है? इसमें कोई संवैधानिक अवरोध तो कतई नहीं है। वास्तविकता यही है कि लोकलुभावनवाद और भ्रष्टाचार इस मामले में उनकी राह रोके हुए हैं।
फिलहाल उत्तर प्रदेश में निकाय चुनाव चल रहे हैं। कुछ समय बाद उत्तराखंड में होंगे। फिर देश की सबसे धनी नगर निकाय बीएमसी के चुनावों की बारी आएगी। पंजाब में भी नगर निकायों का कार्यकाल पूरा हो गया है, मगर अभी चुनाव की घोषणा नहीं हुई। इन क्षेत्रों में बड़ी नगरीय आबादी रहती है। ऐसे में, यदि हम इन चुनावों को भी विधानसभा या लोकसभा चुनावों की भांति अधिक गंभीरता प्रदान करें तो यह हमारे लिए बहुत उपयोगी होगा। और हां, कृपया धन- संसाधनों की कमी को नगरीय निकायों के लचर प्रदर्शन की वजह के रूप में कभी स्वीकार न करें। हमसे आर्थिक रूप से कमजोर कई देश भी हमसे कहीं ज्यादा साफ-सुथरे हैं। जनसंख्या की दृष्टि से अब हम विश्व के सबसे बड़े देश हैं। इतनी बड़ी संख्या हमारे लिए वरदान सिद्ध होगी या अभिशाप, यह काफी हद तक हमारे शिक्षा - स्वास्थ्य जैसे पहलुओं से निर्धारित होगा। ऐसे में इस प्रश्न का उठना स्वाभाविक है कि जिन बच्चों की परवरिश गंदगी भरे माहौल में होती है, क्या वे कभी आदर्श नागरिक बन सकते हैं?

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