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करवट बदलेगा या दोहराएगा कर्नाटक
By EditorialPublished on
यह उदार राज्य होने की अपनी पहचान बनाए रखेगा या उत्तर प्रदेश और गुजरात (Gujarat) की तरह भगवा रंग में रंग जाएगा ? हमें संसदीय चुनावों पर इसके असर का पता भी जल्द लग जाएगा। जो मुहावरा अत्यधिक प्रयोग की वजह से अपना अर्थ खो चुका होता है, उसके लिए शब्दकोश में एक शब्द है- 'क्लिच ।' 'कर्नाटक का विधानसभा चुनाव (Karnataka assembly elections) भारतीय राजनीति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है' इस वाक्य के लिए भी आप 'क्लिच' का इस्तेमाल कर सकते हैं, पर हम इस चुनाव को कमतर नहीं आंक सकते। सोमवार देर शाम प्रचार अभियान थम गया। सवाल
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एस. श्रीनिवासन
यह उदार राज्य होने की अपनी पहचान बनाए रखेगा या उत्तर प्रदेश और गुजरात (Gujarat) की तरह भगवा रंग में रंग जाएगा ? हमें संसदीय चुनावों पर इसके असर का पता भी जल्द लग जाएगा।
जो मुहावरा अत्यधिक प्रयोग की वजह से अपना अर्थ खो चुका होता है, उसके लिए शब्दकोश में एक शब्द है- 'क्लिच ।' 'कर्नाटक का विधानसभा चुनाव (Karnataka assembly elections) भारतीय राजनीति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है' इस वाक्य के लिए भी आप 'क्लिच' का इस्तेमाल कर सकते हैं, पर हम इस चुनाव को कमतर नहीं आंक सकते। सोमवार देर शाम प्रचार अभियान थम गया। सवाल है, क्यों इसे भारत की राजनीति और इसके भविष्य के लिए अहम माना जा रहा है? इसके छह मुख्य कारक हैं।
पहला है, कुशासन पारंपरिक रूप से कर्नाटक अन्य दक्षिणी राज्यों की तरह ही एक सुशासित सूबा माना जाता है। बुजुर्ग बीएस येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद से हटाने और उनकी जगह बसवराज बोम्मई को कुरसी सौंपने से इस धारणा को गंभीर चोट पहुंची। बोम्मई निष्प्रभावी और कमजोर मुख्यमंत्री माने जाते रहे हैं। शुरूआत में तो यह चर्चा थी कि उन्हें जल्द ही बदल दिया जाएगा, पर जैसे-जैसे समय बीतता गया, यह साफ हो गया कि उन्हें जान-बूझकर पार्टी के आक्रामक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए लाया गया है, जिसका विरोध येदियुरप्पा कर रहे थे ।
असल में, येदियुरप्पा भगवा पार्टी में होने के बावजूद अल्पसंख्यकों के प्रति सहानुभूति रखने वाले नेता रहे हैं, जबकि बोम्मई को लेकर यही सोच नहीं है। सीएए विरोधी दंगों के दौरान जब अल्पसंख्यक समुदाय के दो लोग मारे गए थे, तब बतौर मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने उनके लिए 10 लाख रूपये मुआवजे की घोषणा की थी, पर हिंदुत्ववादी समूहों के विरोध के कारण उनको यह वापस लेना पड़ा। मगर, बोम्मई प्रवीण नेतारू के घर गए, जिनकी मौत सांप्रदायिक दंगे में हो गई थी और उनके परिवार को मुआवजा, नौकरी एवं घर देने की पेशकश की। सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में भी बोम्मई प्रभावी साबित नहीं
हुए। खबरों के मुताबिक, भ्रष्टाचार (Corruption) काफी बढ़ गया और इसीलिए कांग्रेस ने ' 40 प्रतिशत की सरकार' का नारा बुलंद किया है।
दूसरा कारक हिंदुत्व है। उत्तर भारत में मिली व्यापक सफलता को देखते हुए भाजपा दक्षिण में भी इसे आगे बढ़ाना चाहती है। कर्नाटक इसका प्रवेशद्वार माना गया था, पर ऐसी राजनीति (Politics) के बेपटरी होने की भी आशंका खूब होती है। पार्टी वर्षों से हिंदुत्व के अपने एजेंडे को अंजाम तक पहुंचाना चाहती है। 'जय बजरंग बली' का आह्वान इसका स्पष्ट संकेत है। कांग्रेस के घोषणा- पत्र में बजरंग दल को प्रतिबंधित करने का वायदा भाजपा के काम आया है, जिसने कांग्रेस पर पीएफआई के जरिये मुसलमानों को तुष्ट करने का आरोप लगाया है। ऐसा करते हुए इस तथ्य को पूरी तरह से नजरंदाज कर दिया गया कि कांग्रेस के घोषणा-पत्र में पीएफआई पर भी प्रतिबंध लगाने का वायदा किया गया है।
हलाला, हिजाब और अल्पसंख्यक समुदाय के दुकानदारों को हिंदू धर्म की पूजन सामग्रियों को बेचने से रोकने जैसे विवादों ने भी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण बढ़ाया है। जहां भाजपा ने ओबीसी समुदाय के भीतर मुसलमानों को मिले चार फीसदी का आरक्षण वापस ले लिया है, वहीं कांग्रेस ने इसे फिर से बहाल करने का वायदा किया है। इन तमाम गुणा-भाग का एकमात्र मकसद है, मतदाताओं का 'हिंदूकरण' और राज्य के जातिगत समीकरणों को तोड़कर उसे व्यापक रूप से हिंदुत्व - छत्र के नीचे एकजुट करना ।
तीसरा, भाजपा का जातिगत समीकरण । भाजपा के चुनाव प्रबंधक अनवरत राज्य के जातिगत समीकरण पर काम कर रहे हैं। लिंगायत पिछले कुछ दशकों से भाजपा को समर्थन दे रहे हैं, लेकिन यही काफी नहीं है, इसीलिए पार्टी वोक्कालिगा जैसे प्रतिद्वंद्वी समूहों और बड़ी दलित जातियों में भी सेंध लगाने की कोशिश कर रही है। मुस्लिम आरक्षण कोटे को लिंगायत और वोक्कालिगा के बीच बराबर-बराबर बांट दिया गया और दलितों की कुल हिस्सेदारी बढ़ा दी गई । बेशक, सुप्रीम कोर्ट ने फैसले पर नाराजगी जताई है, पर भाजपा इसे कांग्रेस के खिलाफ एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की इच्छुक है, जो मुस्लिमों को फिर से आरक्षण देने का वायदा कर रही है। इसे तुष्टीकरण की राजनीति बताते हुए भाजपा ने पूछा है कि क्या इसका मतलब लिंगायतों और वोक्कालिगा के बढ़े हुए आरक्षण को खत्म करना है?
चौथा कारण है, क्षेत्रीय असमानता । कर्नाटक की राजनीति छह अलग-अलग क्षेत्रों में बंटी हुई है और सबकी अपनी विशेषता है। बेशक भाषायी आधार पर कर्नाटक का जन्म हुआ और यहां भाषा को नई पहचान बनाने की कोशिश की गई थी, पर इसने क्षेत्रीय भावना को एक नहीं किया। इसीलिए, मुंबई कर्नाटक, हैदराबाद कर्नाटक, तटीय कर्नाटक, दक्षिण तटीय और मैसूर क्षेत्रों की अपनी अलग पहचान है। भाजपा जहां तटीय कर्नाटक में मजबूत है, वहीं जेडी(एस) की मैसूर में पकड़ है। कांग्रेस की मौजूदगी अलग-अलग इलाकों में है। उत्तरी कर्नाटक में लिंगायतों की संख्या ज्यादा है। इनमें से कुछ क्षेत्रों में भाजपा और कांग्रेस की किस्मत बदलती रही है और भगवा पार्टी की कोशिश इसे पाटने व हिंदुत्व तले ध्रुवीकरण की है।
पांचवां कारक है, नैरेटिव भाजपा (BJP) राज्य में अपना आधार मजबूत करने के लिए तरह-तरह के नैरेटिव गढ़ रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने कांग्रेस (Congress) पर हमला करते हुए कहा कि महज नारे के रूप में 'गरीबी हटाओ' का इस्तेमाल किया गया । उन्होंने कांग्रेस को ऐसी पार्टी के रूप में भी पेश किया, जिसने समाज में आतंकी गुटों को जड़ जमाने का मौका दिया है। गृह मंत्री अमित शाह ने तो यह तक आरोप लगाया कि कांग्रेस पीएफआई (PFI) के एजेंडे पर काम करती है ।
छठा है, मोदी-करिश्मा। बेंगलुरू में सप्ताह अंत में प्रधानमंत्री का 34 किलोमीटर लंबा रोड शो भारत की आईटी राजधानी में वोटरों को लुभाने और कर्नाटक के बाकी हिस्सों में संदेश देने के लिए किया गया था। भाजपा का मानना है कि प्रधानमंत्री के आकर्षण से पार्टी राज्य की तमाम मुश्किलों से पार पा लेगी।
जाहिर है, यह चुनाव राज्य के मतदाताओं की परीक्षा है कि वे विधानसभा और लोकसभा चुनावों में कितना अंतर कर पाते हैं। सवाल है क्या कर्नाटक उदार राज्य होने की अपनी पहचान बनाए रखेगा या यूपी- गुजरात की तरह भगवा रंग में रंग जाएगा? साल 2024 के संसदीय चुनावों पर इसके असर का हमें जल्द ही पता चल जाएगा।

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