A person sitting in America devoted to Rajasthanis
इसी बीच भारत से फोन आ गया तो सकुशल न्यूयार्क पहुँचने की सूचना दे दी। न्यूयार्क में पहले ही दिन जिस अभूतपूर्व तरीके से मेरा अभिनन्दन और अभिषेक होने वाला था उसकी तो मैं सपने में भी कल्पना नहीं कर सकता था।
भारत (India) से फोन आ गया था इसका मतलब मेरा फोन चालू था। यहीं से जा नहीं रहा था। राजा की पत्नी क्रिस से मैंने पूछा तो उसने बताया कि इस इलाके के सभी लोग किसी भी टेलीफोन कम्पनी को अपने टावर यहां लगाने नहीं देते इस कारण नेटवर्क की समस्या हमेशा रहती है। मैं आश्चर्य चकित था कि अमेरिका जैसे उन्नत देश भी नेटवर्क समस्या का कोई निदान ढूंढ नहीं पाये तो शेष विश्व से क्या अपेक्षा करें। खबरें तो बहुत सुनने को मिलती है कि टावर की जरूरत नहीं, ये वो मगर यथार्थ में वही ढाक के तीन पात।
थोड़ी देर बाद राजा का भी फोन आ गया कि वह शीघ्र पहुँच रहा है, इस बीच मुझे नहा धोकर तैयार रहने के लिये कहा। मैंने पूछा क्यूं-तो मजाक करने लगा कि आपके आगमन पर एक शानदार पार्टी रखी है उसमें चलना है। मैंने सोचा उसके अन्य मित्र भी आये हैं तो कहीं खाना खाने जाते होंगे।
मैं 24 घन्टों से पेन्ट शर्ट पहने पहने उकता गया था, सोच रहा था कि नहा धो कर कुर्ता पाजामा पहन लूं जिससे थोड़ी सहजता की अनुभूति हो मगर वहीं जाने की बात से वह संभावना भी खतम हो गई। मैं जल्दी से नहा कर तैयार हो गया। मेरा महाना क्या शावर के नीचे खड़े हो खखोला खा लिया और हो गया नहाना मगर यहा तो शायर हा चालू नहीं हो रहा था। नल एकदम नीचे था जिससे मना असंभव था। मैंने शावर चलाने की बहुत कोशिश की मगर उसका सूत्र कहले ही नहीं। मैं इतने देशों में घूमा हू, हर जगह बाथरूम में अलग अलग तरह के शावर अलग अलग तरीकों से खुलते हैं, सब जगह खोल लेता हूं, मगर यहां तो पता है नहीं चल रहा था कि यह चलता कहां से है, कोई चीज तो हो जिससे चले मगर थी ही नहीं।
मैं कई बार सोचता रहता हूं कि देश भले ही कितने ही अलग अलग हों, कुछ चीजें तो समान रहती ही हैं। फिर नल की टूटी और शावर के साथ इनका क्या पंगा है जो हर जगह अलग अलग तरीके से बनाते हैं। ऐसे जैसे नहाने वाले की परीक्षा ले रहे हों कि अपने आपको बहुत बुद्धिमान समझता है ना, मुझे खोल कर बता। कई नलों की टूटियां तक चलाने में परेशानी आ जाती है, उसकी पेंटी मरोड़ मरोड़ कर थक जाओ मगर एक बून्द पानी नहीं निकलता, मगर अचानक हाथ इधर उधर पड़ जाए तो पानी की धारा फूट पड़े। कई जगह मिन्टों टूटी के नीचे भरे हुए हाथ लेकर खड़े रहो मगर चलने का नाम नहीं, उसे पुराने तरीके से दबाओ तो चल पड़े। यही हाल शावरों का निर्माताओं ने कसम खा रखी है कि सहजता से चल पड़ने वाले शावर तो बनाने ही नहीं। कभी चल भी जाएं तो इतना गर्म पानी शुरू हो जाता है कि उसे ठण्डे में परिवर्तन करना तो दूर बन्द करना भी मुश्किल हो जाता है। मैंने धक हार कर शोवर से नहाना त्यागा।
वाश बेसिन के नल से ही हाथ पैरों पर पानी डाला और टावेल गीला कर शुष्क स्नान किया और वापस पेन्ट शर्ट धारण कर लिया, कन्टाला तो बहुत आ रहा था मगर क्या करता, वैसे ठीक भी रहा वरना उस रात पाजामा कुर्ता पहन लिया होता तो गंभीर संकट में पड़ जाता।
थोड़ी ही देर में राजा अपने मेहमान भारत से आये मेहता व उनकी पत्नी के साथ लौट आया। ये उदयपुर के ही थे और हम एक दूसरे को अच्छी तरह पहचानत भी थे। राजा ने बताया कि उसके एक मित्र प्रेम भण्डारी ने हमें डिनर पर बुलाया है। मैंने कहा प्रेम यहां है क्या, तो उसने कहा आप उन्हें जानते हो? मैंने और मेहता ने कहा कि डा. प्रेम भण्डारी को कौन नहीं जानता, उदयपुर के मशहूर गजल गायक है तब राजा ने बताया कि ये प्रेम जोधपुर के है और बरसों से यहीं रह रहे हैं।
हम पांच लोग हो गये थे। एक ही कार में बैठ सब गंतव्य की तरफ चल पड़े। इलाका सुनसान था, सड़कें वीरान पड़ी थी, कहीं कोई ट्राफिक नजर नहीं आ रहा था फिर भी हर ट्राफिक सिग्नल पर रेड लाईट पर गाड़ी खड़ी हो जाती थी। न इधर न उधर एक भी गाड़ी दूर दूर तक नहीं थी फिर भी रूकना जरूरी था। रूकने का उद्देश्य कानून की पालना नहीं था वरन भारी जुर्माना लगने से बचना अधिक था। शीघ्र ही हम कुछ मकानों व दुकानों की बस्ती में पहुँच गये। यहां कई भारतीय प्रतिष्ठान भी नजर आ रहे थे। प्रेम ने हमें जहां बुलाया था वह ठिकाना मिल नहीं रहा था इसलिये एक जगह गाड़ी खड़ी कर ढूंढने लगे। इस बीच मैं इधर उधर चहल कदमी करने लगा तो दुकानों के बाहर व सड़क पर कचरा बिखरा हुआ नजर आया। आसपास कहीं कचरा पात्र भी नहीं दिख रहा था। लोग पानी की बोतलें, पेप्सी की केनें, थैलीयां वगैराह सड़कों पर ही फेंक देते थे। यह लोगों की आदत का परिणाम था या कचरा पात्र नहीं होने का कह नहीं सकता मगर थोड़ी देर के लिये यही एहसास हुआ जैसे मैं अब भी भारत में ही हूं।
हम लोग गलत दिशा में आ गये थे। वापस गाड़ी में बैठकर दूसरी तरफ गये तो प्रेम दूर से ही हाथ हिलाता हुआ नजर आ गया। दिखने में तो बहुत साधारण ही लग रहा था, मैं तो समझ रहा था अमेरिका का कोई बहुत बड़ा भारतीय होगा मगर पास आये तो देखा यह तो बिल्कुल अपने जैसा है। मुँह में गुटका दबाये और हाथ में माणकचन्द की पुड़की लिये ठेठ देसी मारवाड़ी में उसने हमारा स्वागत किया। सामने ही एक रेस्टोरेन्ट था, सब उसी दिशा में अग्रसर हुए राजा ने सबका परिचय कराया। प्रेम अपनी पत्नी के साथ आया था।
अन्दर जाकर कुर्सियों पर बैठे जितने प्रेम का बोलना जारी था। वह एसे अद्भुत व्यक्तित्व का स्वामी प्रतीत हो रहा था जो मिन्टों क्या सेकण्डों में किसी के साथ घुल मिल जाये। जबसे हम मिले थे, वही बोले जा रहा था और वह भी अपनी रोजमर्रा की मारवाडी - मेवाडी में। मैं आश्चर्यचकित था कि इतने वर्षों से अमेरिका में रह रहा व्यक्ति कैसे एसी धाराप्रवाह मारवाड़ी इतनी सहजता से बोल सकता था वह भी इस बात की परवाह किये बगैर कि अगला आपकी बात का जवाब हिन्दी में हमारे यहां तो हालत यह है कि राजस्थानी भाषा का आन्दोलन चलाने लोग खुद भी राजस्थानी नहीं बोलते। एक बार उदयपुर में किसी समाचार प राजस्थानी भाषा के आन्दोलन से जुड़े कुछ लोग मुझसे मिलने आये और राजस्थानी भाषा को मान्यता दिलाने के लिये मेरे समर्थन की अपेक्षा की। मैं स राजस्थानी या मेवाड़ी का जितना पक्षधर हू उतना और कोई क्या होगा? मैं ही दिन रात मेवाड़ी में ही बात करता हू मगर मजे की बात यह है कि राजस्थानी समर्थन मांगने आये लोग खुद मुझसे हिन्दी में बात कर रहे थे और मैं मेवाड़ी में। ज इस बात से मैंने उनको अवगत कराया तो शर्म से पानी पानी हो गये। फिर मैंने उन्हें कहा कि राजस्थानी को सरकार मान्यता दे देगी तो क्या हो जायगा, मान्यता तो हम देंगे जब काम चलेगा ना। आज हमारा कोई नेता मेवाड़ी में भाषण नहीं दे जबकि गुजराती, मराठी, बंगाली, तमिल, कन्नड़ सब अपनी अपनी भाषाओं में भाषण देते। हमारे नेताओं को राजस्थानी बोलने से किसने रोका। क्या मान्यता मिल जाने से ये नेता मेवाड़ी में भाषण देने लगेंगे।
इस कड़वी सच्चाई के विपरीत अमेरिका में बैठे इस व्यक्ति के राजस्थानी के प्रति समर्पण को देख कर मैं नत मस्तक हो उठा। हम एक भारतीय रेस्टोरेन्ट में बैठे थे। चारों तरफ भारतीय ही भारतीय नजर आ रहे थे। ये रेस्टोरेन्ट एक दिन पूर्व ही खुला था। इस इलाके में एसा कोई रेस्टोरेन्ट था नहीं इसलिये हर कोई इसके खुलने से प्रसन्न था। लोग एक दूसरे से परिचय कर रहे थे, गले मिल रहे थे। एसा महसूस कर रहे थे जैसे अपने देश में ही आ गये हों।
बातचीत का क्रम आगे बढ़ा तो पता लगा कि प्रेम ने अमेरिका में राजस्थानी आप्रवासियों व राजस्थानी भाषा के लिये ही अपना जीवन समर्पित कर दिया है। प्रेम का इस बात का रिकार्ड है कि भारत से आने वाला एक भी मंत्री, अधिकारी या नेता एसा नहीं होगा जिससे वह यहां नहीं मिला हो और राजस्थानियों के उत्थान के लिये उन्हें ज्ञापन न दिया हो। हमसे मिलने के पीछे भी यही कारण था कि हम राजस्थान से आये हैं। वह राजा का अच्छा दोस्त है, राजा ने जब बताया कि उदयपुर से हम लोग आ रहे हैं तो इसने कहा कि वह खुद हमारा स्वागत करेगा और आते ही यह कार्यक्रम तय कर लिया। मुझे अमेरिका में पांव रखे अभी तीन घन्टे भी नहीं हुए होंगे मगर लग एसा रहा था जैसे कई दिनों से यहां हूं।
Editorial

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