Craze of stone pelting on processions
राजीव सचान : रामनवमी (Ram Navami) के अवसर पर उत्पात मचाने का जो सिलसिला महाराष्ट्र (Maharashtra) के छत्रपति संभाजी नगर (Chhatrapati Sambhaji Nagar) से शुरू हुआ था, वह वडोदरा, हावड़ा, हुगली, सासाराम, बिहारशरीफ तक जारी रहा। देश के कुछ और शहरों में भी रामनवमी पर उपद्रव की खबरें आईं। कहा नहीं जा सकता कि यह सिलसिला कब खत्म होगा, क्योंकि जो शहर रामनवमी की शोभायात्राओं पर पत्थरबाजी और हिंसा का गवाह बने, उन सभी में अभी शांति स्थापित नहीं हो सकी है। रामनवमी पर उत्पात कोई नया काम नहीं है। पिछले वर्ष यह काम और बड़े पैमाने पर कहीं अधिक शहरों में किया गया था। तब रामनवमी की शोभायात्राओं को निशाना बनाने के बाद हनुमान जन्मोत्सव की शोभायात्राओं पर भी पत्थरबाजी की गई थी। वास्तव में इसका सिलसिला हिंदू नववर्ष पर निकाली गई शोभायात्रा से ही शुरू हो गया था, जो हनुमान जंयती तक चला था। कहना कठिन है कि इस बार हनुमान जन्मोत्सव उत्पात से बचा रहेगा या नहीं? जो भी हो, आसार अच्छे नहीं हैं, क्योंकि ममता बनर्जी ने इसका अंदेशा जता दिया है। पता नहीं उनके इस अंदेशे का आधार क्या है, लेकिन इस नतीजे पर पहुंचने के अच्छे-भले कारण हैं कि शोभायात्राओं को जानबूझकर किसी साजिश और सनक के तहत निशाना बनाया जा रहा है। शोभायात्राओं पर पथराव के लिए अक्सर ऐसे बहाने गढ़ लिए जाते हैं कि शोभायात्रा मुस्लिम इलाके से निकल रही थी अथवा उसमें 'उत्तेजक' नारे लग रहे थे या फिर डीजे बज रहा था । कुछ लोगों के लिए तो 'जय श्रीराम' का नारा भी उत्तेजक और आपत्तिजनक होता है। असदुद्दीन ओवैसी और उनके दल के नेता जयश्रीराम का उल्लेख करने से भी कतराते हैं। जब उन्हें इस नारे का जिक्र करना होता है तो वे 'जेएसआर' कहकर काम चलाते हैं। इससे समझा जा सकता है कि आपत्ति वास्तव में घृणा में बदल चुकी है।
हावड़ा में हिंसा को लेकर बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (CM Mamta Banerjee) ने यह कह दिया कि आखिर शोभायात्रा मुस्लिम (Muslim) मोहल्ले से क्यों निकली ? सबसे पहला सवाल तो यही है कि क्या शोभायात्राओं के लिए मुस्लिम इलाके निषेध हैं? क्या वे विशेष आवासीय जोन हैं या फिर ऐसे इलाके हैं, जहां देश के कानून के बजाय समुदाय विशेष की मनमानी चलती है ? क्या भारत के मुस्लिम इलाकों में अफगानिस्तान की तरह शरिया लागू हो गई है? यदि ममता यह कहेंगी कि हिंदुओं की शोभायात्राएं मुस्लिम इलाकों से नहीं निकलनी चाहिए, तो फिर कोई यह भी कहेगा कि मुसलमानों के जुलूस हिंदुओं के इलाके से नहीं निकलने चाहिए। यदि ऐसा कहा जाएगा तो यह सांप्रदायिकता होगी, लेकिन ममता बनर्जी के बयान को कोई भी सांप्रदायिक नहीं बता रहा है, क्योंकि वह कथित तौर पर सेक्युलर खेमे की नेता हैं।
ममता बनर्जी के कथन ने कुछ वर्ष पहले तमिलनाडु में सामने आए उस चौंकाने वाले मामले की याद दिला दी, जिसमें पेरंबलूर जिले के कड़तूर गांव के मुसलमानों ने हिंदू (Hindu) समाज की ओर से विशेष अवसरों पर निकाली जाने वाली धार्मिक यात्राओं पर यह कहकर आपत्ति जताई कि इस्लाम में मूर्ति पूजा हराम है, इसलिए हिंदुओं को गांव में रथयात्राएं निकालने से रोका जाए। उनके अनुसार रथयात्राएं इसलिए भी नहीं निकाली जानी चाहिए, क्योंकि अब गांव में मुस्लिम आबादी अधिक हो गई है। यह दलील यही कहती थी कि जहां हमारा बहुमत हो, वहां हमारी ही चलेगी। यह मामला 2021 में मद्रास उच्च न्यायालय पहुंचा। उसने मुस्लिम समुदाय दलील को घोर असहिष्णु के साथ दुस्साहसिक भी करार दिया। उसने अपने निर्णय में कहा कि लोग और उनके समूह सांप्रदायिक हो सकते हैं, लेकिन सार्वजनिक स्थल और सड़कें नहीं हिंदुओं की धार्मिक यात्राओं पर मुसलमानों की आपत्ति यह भी स्पष्ट करती थी कि तथाकथित गंगा-जमुनी तहजीब एक धोखे के अलावा और कुछ नहीं और इसका उल्लेख लोगों को छलने और देश को मूर्ख बनाने के लिए ही अधिक किया जाता है।
इस पर ध्यान दें कि मद्रास उच्च न्यायालय ने जिसे घोर असहिष्णुता कहा था, ममता बनर्जी ने उसे नसीहत और हिदायत के रूप में पेश किया । हावड़ा में हिंसा के मामले में यह भी ध्यान रखें कि वहां शोभायात्रा पुलिस की अनुमति से और उसकी ओर से तय मार्ग से निकाली गई थी। आम तौर पर अब हर जगह ऐसा ही किया जाता है। रथयात्राएं उन्हीं मार्गों से निकलती हैं, जो पहले से तय होती हैं और जिनकी अनुमति पुलिस की ओर से दी जाती है। इतना ही नहीं, ऐसी यात्राओं के दौरान पुलिस भी उपस्थित रहती है। इसके बाद भी शोभायात्राओं पर पथराव किया जाता है। कई बार तो पुलिस वालों को भी निशाना बनाया जाता है। कभी-कभी तो थाना- चौकी भी उन्मादी भीड़ का शिकार हो जाती हैं। हावड़ा में ऐसा न होने पाए, इसके लिए थाने की बैरिकेडिंग की गई। यहां रामनवमी के दूसरे दिन शुक्रवार की नमाज के बाद भी हिंसा की गई। इस पर भी गौर करें कि ये हमले रमजान के दौरान किए गए। शोभायात्राओं के साथ पुलिस पर भी पथराव से यदि कुछ स्पष्ट होता है तो यही क आपत्ति केवल धार्मिक यात्राओं तक ही सीमित नहीं है। कायदे से तो हिंदुओं की धार्मिक यात्राओं और मुसलमानों के जुलूसों के दौरान पुलिस को अतिरिक्त चौकसी बरतने की आवश्यकता ही नहीं पड़नी चाहिए, लेकिन आज का दुर्भाग्य यही है कि ऐसा करना पड़ता है और इसके बाद भी हिंसा हो जाती है। आखिर किधर जा रहा है देश ? यह कैसी सनक है कि किसी न किसी बहाने धार्मिक यात्राओं को निशाना बनाने का सिलसिला कायम है? इस सिलसिले को तोड़ना होगा, लेकिन यह तभी टूटेगा, जब धार्मिक यात्राओं को निशाना बनाने के पीछे की घृणा से भरी जो मानसिकता है, उसे सख्ती से कुचला जाएगा ।
Editorial

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