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टोरन्टो 2. भारत क्यूं नहीं पर्यटन के कृत्रिम स्थल पनपा कर पैसा कमाता ?
By EditorialPublished on
लाईन बहुत लम्बी थी और बहुत धीरे धीरे आगे बढ रही थी। लाईन में मेरी तरह कई वरिष्ठ स्त्री-पुरूष थे मगर कहीं कोई बैठने की व्यवस्था नहीं थी। खड़े ही पांव दुखने लगे थे मगर लाईन आगे बढ़ने का नाम ही नहीं ले रही थी। बार तो मुझे लगा कि लाईन छोड़ कर नीचे जाकर बैठ जाऊं मगर फिर इतने भारी टिकिट के व्यर्थ जाने का खयाल आते ही यह विचार त्याग दिया जिस डेढ घंटे की प्रतीक्षा की बात हो रही थी वो कब का समाप्त हो चुका था फिर भी हमारा क्रम आने का नाम नहीं ले रहा था। लघु शंका का दबाव भी बढ़ता जा रहा था मगर उसकी भी कोई व्यवस्था नजर

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लाईन बहुत लम्बी थी और बहुत धीरे धीरे आगे बढ रही थी। लाईन में मेरी तरह कई वरिष्ठ स्त्री-पुरूष थे मगर कहीं कोई बैठने की व्यवस्था नहीं थी। खड़े
खड़े ही पांव दुखने लगे थे मगर लाईन आगे बढ़ने का नाम ही नहीं ले रही थी। बार तो मुझे लगा कि लाईन छोड़ कर नीचे जाकर बैठ जाऊं मगर फिर इतने भारी टिकिट के व्यर्थ जाने का खयाल आते ही यह विचार त्याग दिया जिस डेढ घंटे की प्रतीक्षा की बात हो रही थी वो कब का समाप्त हो चुका था फिर भी हमारा क्रम आने का नाम नहीं ले रहा था। लघु शंका का दबाव भी बढ़ता जा रहा था मगर उसकी भी कोई व्यवस्था नजर नहीं आ रही थी। यह अचरज का विषय था कि सैकड़ों की संख्या में स्त्री, पुरुष, बालक, वृद्ध एक साथ जहां घंटों तक प्रतीक्षा करें सामान्य सुविधाओं तक की व्यवस्था नहीं। एसा प्रतीत होता था कि प्रबन्धन सारा ध्यान पर्यटकों से अधिकाधिक लूट खसोट तक ही केन्द्रीत था ।
अन्ततः हमारा क्रम आया। एक बड़ी सी लिफ्ट में हमने प्रवेश किया। यहां और अमेरिका में लिफ्ट बोलो तो कोई नहीं समझता, एलीवेटर बोलना पड़ता है। इस तरह के अन्य कई शब्द हैं जो अमरिकियों ने अपना रखे हैं, वे वही समझते हैं, आप भले उनके अंग्रेजी पर्याय बोलते रहो तो वे नहीं समझते। इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि इनका अंग्रेजी ज्ञान पूर्ण नहीं है जो अमेरिका द्वारा अपनाई गई अंग्रेजी तक ही सीमित है। यह स्लंग भी नहीं जो पिछली शताब्दी में अंग्रेजी की दुर्दशा कर बनाई गई थी।
एलीवेटर बहुत तेज गति से उपर चढ़ रहा था। हमारे पांवों के नीचे कांच का पारदर्शी तल था जिससे नीचे का दृश्य दिखाई दे रहा था। हम एक धुरी पर उपर पढ़ते जा रहे थे, नीचे इसकी खाई सी निरन्तर नजर आ रही थी। शीघ्र ही हम उपर पहुँच गये। नियात्रा के स्काई लोग टावर की तरह इसके भी चारों तरफ दर्शक दीर्घा बनी हुई थी। लिफ्ट से हम इसी दीर्घा में प्रविष्ठ हुए सामने शीशे की पारदर्शी दीवार से नीचे का नजारा हमारे सामने था। एसा लग रहा था जैसे पूरा टोरन्टो हमारी नजरों के सामने हो, एक तरफ समुद्र और बाकी तीनों तरफ अट्टालिकाओं का गहन जंगल इसके अलावा कुछ नहीं। हम चारों तरफ घूम लिये तो ये का ये नजारा। अचानक हमने अपने आपको ठगा गया महसूस किया। स्काईलोन टावर से तो नियाग्रा प्रपात का अत्यन्त सुन्दर दृश्य तो दिखाई देता था मगर यहां तो एसा भी कुछ नहीं था। हम पश्चाताप करने लगे कि इतना पैसा खर्च करके, इतना समय बरबाद करके और इतनी थकान झेलकर क्या यही देखने को मिलना था। बैठने की कोई जगह नहीं थी। एक रेस्टोरेन्ट था जिसमें कुर्सियां लगी हुई थी मगर वहां बैठने के लिये भी कुछ आर्डर करना जरूरी था।
मैंने बाथरूम ढूंढा, हल्का हुआ और एक जगह जमीन पर ही बैठ गया। मुझे इस तरह नीचे बैठे देख कुछ अन्य लोग भी जो थकान से निढाल हो रहे थे नीचे बैठ गये। यहां का काम तो दो मिनट में ही पूरा हो गया था अब नीचे लौटना ही शेष था।
नियाग्रा व टोरन्टो के टावरों की तरह भारत में भी कुछ टावर है मगर वे हजार फीट से ऊंचे नहीं है। भारत भी क्यूं नहीं सी. एन. टावर जैसे टावर खड़े कर पर्यटकों को आकर्षित करता और पैसा कमाता। भारत पर्यटन के नाम पर अपनी एतिहासिक धरोहरों, विरासत, परम्पराओं व संस्कृति पर ही निर्भर है जबकि कई एसे देश हैं जिनके पास इनमें से कुछ भी नहीं है वो भी पर्यटन के कृत्रिम स्थल पनपा कर हमसे ज्यादा पर्यटक आकर्षित करते हैं। हमारी सरकार व उद्योगपतियों के भेजे में न जाने यह बात कब आयगी। दो दिनों में कनाडा में एक जैसे दो टावरों को देख ऐसा लगा जैसे पर्यटन आकर्षण के नाम पर टावर खड़े करने का अच्छा धन्धा बन गया है। इनकी ऊंचाई के रिकार्ड इनको प्रसिद्ध करने में सहायक बन जाते हैं।
थोड़ी देर जमीन पर सुस्ता कर हम उठे तथा वापस नीचे उतरने की लाईन में लगे। इस बार उतना वक्त नहीं लगा। शाम हो रही थीं, भूख भी लगने लगी थी। नीचे उतरते ही हमने आसपास किसी इण्डियन रेस्टोरेन्ट की तलाश की। किसी ने बताया कि थोड़ी दूर जाकर एक रेस्टोरेन्ट है, मेरा थकान से बुरा हाल था, एक कदम भी और चल पाने की मेरी हिम्मत नहीं थी। सी.एन. टावर के सामने ही एक बड़ी सी बिल्डिंग के नीचे छोटा सा पार्क था जिसके चारों तरफ एक मुण्डेर बनी थी। यहां पर कुछ लोग बैठे थे, मैं भी वहीं जाकर बैठ गया। मेरी ऐसी हालत देख कर राजा ने कहा- दादा आप यहीं बैठो, मैं रेस्टोरेन्ट जाकर खाना पेक करवा कर ले आता हूं। मैंने अपने पांव ऊंचे किये और आलथी पालथी मार कर बैठ गया तो थोड़ी राहत महसूस की।
मेरे पास ही एक भारतीय परिवार बैठा था तो मुझे तसल्ली थी जैसे कोई अपने ही बैठे हैं। कुछ ही देर में थकान उतर गई तो मैं व्यग्रता से राजा की प्रतीक्षा करने लगा। उसे गये काफी देर हो गई थी, अब तक तो उसे लौट आना था। अचानक ही दो चार छीटें आये तो आस पास के लोग उठ कर चले गये। मैं बैठा रहा मगर अचानक तेज वर्षा शुरू हो गई, अब वहां बैठे रहना संभव नहीं था, आसपास कोई आश्रय भी नहीं था, सामने सड़क पार करके एक बिल्डिंग का बरामदा था, वर्षों से बचने कई लोग वहां खड़े हो गये, मैं भी वहीं जाकर खड़ा हो गया।
थोड़ी ही देर में वर्षा रूक गई मगर वापस मुंडेर पर जाकर बैठना संभव नहीं था, सब तरफ पानी ही पानी हो गया था। मैं बरामदे में ही खड़ा रहा लेकिन राजा के अब तक नहीं लौट पाने के कारण चिन्तित हो उठा। अचानक वर्षा फिर शुरू हो गई। इस बार उसकी तीव्रता बहुत अधिक थी। बरामदे में खड़े अन्य लोग टेक्सियां रोक रोक कर जा चुके थे। अंधेरा बढ़ गया तथा वर्षा के साथ तूफान भी शुरू हो गया।
देखते ही देखते वर्षा कर देग इतना अधिक हो गया कि सिर्फ पानी और तूफान के अलावा कुछ नजर नहीं आ रहा था, एसी वर्षा अपने जीवन में मैंने आज तक नहीं देखी थी, मेरा दिल धड़कने लगा और अनिष्टकारी विचार मन में आने लगे, तभी एक के बाद एक फायर ब्रिगेडों के चीखते साइरनों ने दिल और दहला दिया। कहीं कोई जबर्दस्त दुर्घटना हुई थी। फायर ब्रिगेडस तूफान की गति से भाग रही थी, साईरनों, वर्षा व तूफान की मिली जुली आवाज आतंक का वातावरण बना रही थी। बचपन में तो जरा सी भी तेज वर्षा होती थी तो मैं डर कर बिस्तरों में घुस जाता था। तब पलंग तो होते नहीं थे, सोने के लिये रोज रात को बिस्तर बिछा देते थे जिन्हें सुबह समेट कर घर के एक कोने में रख देते थे। मैं इन्हीं बिस्तरों में जाता था।
छुप राजा का कहीं दूर दूर तक अता पता नहीं था। बार बार यह विचार आ रहा था कि उसके साथ कहीं कोई हादसा तो नहीं हो गया ? किसी से झगड़ा तो नहीं हो गया ? कहीं कोई पुलिस कार्रवाई तो नहीं हो गई ? एसा कुछ हो गया तो मेरा क्या होगा ? मेरी जेब में एक थैला नहीं था, पासपोर्ट वगैरा सब गाड़ी में पड़े थे। गाड़ी की चाबी राजा के पास थी। टोरन्टो में कोई जान पहचान का भी नहीं था। मैंने अमेरिका में अपने मानजे मुनीश को फोन करने की सोची मगर रुक गया, खामखाह बात भारत तक पहुँच जायगी और सब चिन्तित हो जायेंगे। मैंने कुछ देर और इन्तजार करने की सोची। वर्षा और तेज होती गई, बरामदा भी वर्षा से बच नहीं सका और मैं पूरी तरह भीग गया।
उस स्थान से मैं हिल भी नहीं सकता था, इधर उधर होता और राजा आ जाता तो हम एक दूसरे को ढूंढते ही रहते। तभी खयाल आया कि राजा को तो फोन किया जा ही सकता है, जेब से फोन निकाला तो उसकी बेट्री खतम। मैं सिर्फ रोया ही नहीं कहां जाऊं, क्या करूं, कुछ समझ में नहीं आ रहा था, रात गहराती जा रही थी, कहां सोउंगा, बिना पासपोर्ट के तो कोई होटल वाला भी जगह नहीं देगा।
अब मेरे पास सिर्फ एक ही चारा था कि भगवान से प्रार्थना करू कि वही मुझे इस संकट से उबारे यही मैंने किया भी।

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