Hinduphobia
दुनिया के कई देशों में इस समय हिंदुओं के विरूद्ध सुनियोजित अभियान चल रहा है। यह हिंदूफोबिया मुख्य रूप से अमेरिका और यूरोप में कट्टरपंथी इस्लामिस्ट और भारत विरोधी बुद्धिजीवियों द्वारा फैलाया जा रहा है। ऐसे में, भारत सरकार से यही अपेक्षा है कि वह हिंदूफोबिया को लेकर जारी इस बेलगाम अभियान को रोकने के लिए इन देशों को चेताए । हिंदुओं के विरूद्ध चलाई जा रही इस मुहिम के ताजा संकेत हेनरी जैक्सन सोसायटी यानी एचजेएस नाम की संस्था द्वारा ब्रिटेन में छात्रों और उनके अभिभावकों के बीच कराए गए सर्वे में सामने आए हैं। सर्वे करने वाली संस्था के अनुसार, 'ब्रिटिश स्कूलों में हिंदुओं के विरूद्ध भेदभाव की पड़ताल करने वाला यह अपनी तरह का पहला प्रयास है। यह दर्शाता है कि हिंदुओं को लेकर फैलाई जा रही घृणा को रोकने के मामले में स्कूल कितने असहाय हैं।'
सर्वे के अनुसार विदेशी मूल के लोगों के प्रति नापसंदगी एक बड़ा मुद्दा है। एक अन्य मुद्दा कई देवी-देवताओं की पूजा मामले में हिंदू छात्रों पर छींटाकशी और फब्तियां कसने का है। अक्सर, बहुदेववाद और पूर्ति पूजा का उपहास उड़ाया जाता है। इस्लामिक चरमपंथ और हिंदू बच्चों पर उसका प्रभाव भी उतना ही चिंतित करने वाला पहलू है। हिंदू बच्चों को मुस्लिम छात्र 'काफिर' कहते हैं और अक्सर उनसे इस्लाम में मतांतरित होने या फिर नरक में जाने को तैयार रहने के लिए कहते रहते हैं।
इस सर्वे में ब्रिटेन के 1000 स्कूलों से आंकड़े इकट्ठा किए गए तो स्वाभाविक रूप से यह एक बड़ी कवायद है । ब्रिटेन की कुल जनसंख्या में 1.7 प्रतिशत की हिस्सेदारी के साथ हिंदू वहां तीसरा सबसे बड़ा धर्म है। हालांकि, एक प्रवासी समुदाय के रूप में ब्रिटिश हिंदुओं के अनुभवों को लेकर बहुत कम शोध- पड़ताल हुई है, लेकिन इस रिपोर्ट में संज्ञान लिया गया है कि गत वर्ष सितंबर में किस प्रकार लेस्टर और बर्मिंघम में हिंदुओं की संपत्तियों के साथ ही उनके उपासना स्थलों को निशाना बनाया गया था ।
दुनिया भर में हिंदू भले ही इस बात को लेकर आह्लादित हों कि ऋषि सुनक के रूप में एक धर्मपरायण हिंदू ब्रिटिश प्रधानमंत्री हैं, लेकिन उन्हें जमीनी हकीकत से परिचित होना भी आवश्यक है। इसीलिए रिपोर्ट के निष्कर्ष में इस चिंतित करते हालात को देखते हुए भारत सरकार से तत्काल कदम उठाने की आवश्यकता जताई गई है। विभिन्न देशों विशेषकर तथाकथित 'उदारवादी' पश्चिमी देशों में यह रूझान कायम हो, उससे पहले भारत द्वारा कारगर कदम उठाने का आह्वान किया गया है।
एचजेएस के अनुसार जिन बच्चों का साक्षात्कार किया गया, उनके अभिभावकों में से 51 प्रतिशत ने कहा कि उनके बच्चों को हिंदू-विरोधी नफरत और उससे उपजे नुकसान का सामना करना पड़ा। जबकि केवल 19 प्रतिशत अभिभावकों ने ही स्कूलों को हिंदू-विरोधी नफरत मामलों को देखने में सक्षम पाया। हिंदू छात्रों के विरूद्ध भी कई घटनाएं सर्वे में सामने आईं। इसमें आठ घटनाक्रम चिह्नित किए गए हैं। एक मामले में हिंदू छात्रा पर गोमांस के टुकड़े फेंके गए। वहीं एक मामले में पीड़ित छात्र को अपनी हिंदू पहचान को लेकर छेड़छाड़ से तंग आकर तीन बार स्कूल बदलने के लिए विवश होना पड़ा। सर्वे में उल्लेख है कि हिंदू छात्रों के अभिभावकों को आशंका है कि हिंदू विरोधी नफरती अभियान का मकसद भारत में आगामी आम चुनाव से पहले भारतवंशियों के बीच हिंदू-मुस्लिम तनाव को बढ़ाना है। हिंदू छात्रों के अभिभावकों को हिंदुत्व की शिक्षा से जुड़ी गुणवत्ता को लेकर भी बड़ी चिंता है। उनकी चिंता इसी बिंदु पर केंद्रित है कि हिंदुत्व को भी अब्राहमिक मजहबी नजरिये से पढ़ाया जाता है, जहां 'देवताओं' और हिंदुत्व की मुख्य अवधारणाओं की गलत व्याख्या की जाती है और यही मिथ्या अवधारणा कक्षा में निशाना बनाए जाने का मुख्य कारण बनती हैं। सर्वे की प्रस्तावना लिखने वाले कंजरवेटिव पार्टी के सांसद बेन एवरिट का कहना है कि जहां ब्रिटेन को एक बहुसांस्कृतिक, बहु-पंथक समाज होने का गर्व होना चहिए, लेकिन 'हमें अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को, विशेषकर शिक्षा प्रणाली जैसे क्षेत्रों में किसी भी भेदभाव या पूर्वाग्रह से संरक्षण प्रदान करने के लिए और उपाय करने होंगे।' उन्होंने इस सर्वे की सराहना करते हुए कहा कि यह मार्गदर्शन करने वाला एक राष्ट्रीय अध्ययन है। उन्होंने यह भी माना कि हिंदुत्व की शिक्षा से जुड़ा विरूपित दृष्टिकोण भी हिंदुओं के प्रति पूर्वाग्रह का एक कारण हो सकता है।
प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत का विदेश नीति प्रतिष्ठान हिंदूफोबिया की समस्या के प्रति सतर्क हुआ है। इस दृष्टि से संयुक्त राष्ट्र जैसी सर्वोच्च अंतरराष्ट्रीय संस्था के मंच से हिंदूफोबिया का मुद्दा उठाने का मोदी सरकार का फैसला ऐतिहासिक रहा । संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि रहे टीएस तिरूमूर्ति ने अंतरराष्ट्रीय आतंक विरोधी सम्मेलन में कहा था कि अन्य सदस्य देश जब इस्लामोफोबिया और क्रिश्चियनोफोबिया के मुद्दे पर आवाज उठाते हैं तो हिंदूफोबिया के विरूद्ध क्यों नहीं। हिंदुत्व के साथ ही बौद्ध और सिख पंथ को लेकर भी उन्होंने यही तर्क प्रस्तुत किया कि इनसे जुड़े फोबिया का संज्ञान क्यों नहीं लिया जाता । इस प्रकार जवाहरलाल नेहरू के छद्म- पंथनिरपेक्ष विचारों में पगी भारतीय विदेश सेवा की ओर से शायद पहली बार देश के बहुसंख्यक धर्म के विरूद्ध उभर रहे खतरे के खिलाफ आवाज उठी।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी गत वर्ष लेस्टर और बर्मिंघम में हिंदू उपासना स्थलों पर हमलों के बाद ब्रिटिश समकक्ष के साथ इस मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाते हुए उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कहा था । सरकार के स्तर पर तमाम प्रयासों के बावजूद एचजेएस के सर्वे का निष्कर्ष किसी खतरे की घंटी से कम नहीं। यूरोप और अमेरिका में बड़ी संख्या में बसे हिंदुओं को देखते हुए यह सुनिश्चित करना होगा कि हिंदुत्व को लेकर खराब सोच या पूर्वाग्रहों के कारण उनके बच्चों को किसी भी भेदभाव का शिकार न होना पड़े। भारत सरकार को इन निष्कर्षों का संज्ञान लेकर पश्चिमी देशों में उभर रहे इन रूझानों से निपटने की रणनीति बनानी होगी।




Editorial

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