Nitish Kumar, Mamata Banerjee, Tejashwi Yadav
देश में जब-जब चुनाव हुए हैं, तब-तब विपक्ष यह कोशिश करता रहा है कि सत्तापक्ष को कैसे पराजित कर सके। देश की आजादी के तुरंत बाद के वर्षों में विपक्षी दल विभिन्न कारणों से अलग अलग चुनाव लड़ते थे, पर यह पहली बार हुआ कि आपातकाल के बाद 1977 में विपक्ष को एकजुट करने की बड़ी कोशिश हुई और कामयाब भी रही। ज्यादातर विपक्षी दलों का विलय हो गया और जनता पार्टी बनी। उसके बाद भी विपक्ष को एकजुट करने की कोशिशें कई बार हो चुकी हैं।
नरेंद्र मोदी 2012 में जब गुजरात में चुनाव जीते थे, उसके बाद यह बात चलने लगी थी कि वह प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हो सकते हैं। जब भाजपा में इसके लिए प्रस्ताव पारित हुआ, तब सबसे पहले दो नेता थे, नीतीश कुमार और मायावती, दोनों ने कहा, खबरदार, हमें मंजूर नहीं। भाजपा मंजूर है, पर नरेंद्र मोदी नहीं। प्रयास तब भी हुआ था, लगभग 19 पार्टियां मंच पर साथ आई थीं और सबने फैसला किया था कि हम एकजुट होकर लड़ेंगे, पर ऐसा हो न सका। साल 2014 में लोकसभा चुनाव हुआ, 2019 में भी हुआ, हर बार विपक्ष के पास एकजुट होने का मौका था और अब 2024 में भी मौका है। बीते नौ साल में पांच से ज्यादा बहुत महत्वपूर्ण चुनाव देश में हो चुके हैं, विपक्ष एकजुट क्यों नहीं हो सका ? अगर पूरी तरह एकजुट होकर विपक्षी दल उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में ही लड़ जाते, तो आज शायद उनके पास एक मजबूत आधार होता। अब नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव दिल्ली, लखनऊ, कोलकाता में विपक्षी एकजुटता की कोशिश कर रहे हैं, आगे क्या होगा, अभी कहना मुश्किल है। हां, फिलहाल हम इतिहास के बुनियाद पर विमर्श कर सकते हैं।
यहां आप याद कीजिए चंद्रबाबू नायडु को, जो कभी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के संयोजक हुआ करते थे। वह 2018 में जब भाजपा से अलग हुए, तब उन्होंने साल 2019 के चुनाव से पहले यह कोशिश की थी कि तमाम विपक्षी दलों को एकजुट किया जा सके, ताकि भाजपा को हराया जाए। भाजपा के खिलाफ विपक्ष को एकजुट करने का यह पहला गंभीर प्रयास था, पर चंद्रबाबू नायडु आज अपने राज्य की राजनीति में भी कहां हैं?
विपक्षी एकता के लिए केसीआर भी सक्रिय हुए थे। कोलकाता गए थे और उन्होंने ममता बनर्जी के साथ मिलकर कोशिश की थी कि गैर-भाजपा, गैर- कांग्रेस पार्टियों का तीसरा मोर्चा बनाया जाए। उसके बाद ममता बनर्जी भी कर्नाटक गई थीं और उन्होंने भी वहां कोशिश की थी कि विपक्ष एकजुट हो जाए, पर वह कोशिश भी आगे नहीं बढ़ी। आज सबसे बड़ा सवाल है कि जो विपक्षी गठबंधन बनेगा, उसमें कांग्रेस किस स्थिति में रहेगी? सच्चाई यह है कि साल 1965 से लेकर आज तक कांग्रेस की ही मूल ताकत कम हुई है । सवाल है, कांग्रेस की मूल ताकत को किसने छीना ? मुसलमान आज भाजपा के साथ नहीं हैं, जो कभी कांग्रेस की मूल ताकत में शामिल थे, तो वे कहां गए? दलित व सवर्ण कहां गए? आज आप कश्मीर से कन्याकुमारी तक देखिए, कश्मीर में शेख अब्दुल्ला व मुफ्ती की पार्टी ने कांग्रेस को समेटा, पश्चिम बंगाल में खत्म किया सीपीएम व टीएमसी ने, बिहार में खत्म किया कर्पूरी ठाकुर, लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार ने उत्तर प्रदेश में खत्म किया चौधरी चरण सिंह, मुलायम सिंह यादव, कांशीराम, मायावती ने। वैसे ही ओडिशा में कांग्रेस को बीजू पटनायक व नवीन पटनायक ने घटा दिया। कर्नाटक में रामकृष्ण हेगड़े ने कांग्रेस को ही कमजोर किया। तमिलनाडु में किसने कांग्रेस को बाहर किया? आंध्र प्रदेश, तेलंगाना में भी ऐसा ही हुआ।
आज कांग्रेस वहीं जिंदा है, जहां कोई क्षेत्रीय दल नहीं है; जहां भाजपा है, जैसे राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश इत्यादि । ठीक इसी तरह से कांग्रेस पूर्वोत्तर भारत के राज्यों में सिमट गई। सब जानते हैं, कांग्रेस का वोट बैंक तो क्षेत्रीय दलों ने ही छीना है। अभी ऐसे ही दलों के नेता आपस में भेंट मुलाकात कर रहे हैं, पर नेताओं के ऐसे मिलने से पार्टियों के मतदाता भी परस्पर नहीं मिल जाते हैं। यह 1977 नहीं है, जब विपक्ष ने मिलकर जनता पार्टी को साकार किया था । तब लड़ाई इंदिरा गांधी बनाम जयप्रकाश नारायण थी। वह आपातकाल के बाद का समय था, कांग्रेस का सफाया हुआ, लेकिन कांग्रेस दक्षिण भारत में फिर भी जीती थी, आज कांग्रेस दक्षिण में कितनी सीटें जीत सकती है? एक और पहलू है, इतिहास देखिए, देश में अब तक छह गैर-कांग्रेसी, गैर-भाजपाई प्रधानमंत्री हुए हैं और ये भी कुल साढ़े छह साल चले हैं। मोरारजी देसाई ढाई साल, चौधरी चरण सिंह सात महीने, वीपी सिंह ग्यारह महीने, चंद्रशेखर सात महीने, देवेगौड़ा और गुजराल ग्यारह ग्यारह महीने। आज क्या ऐसा माहौल बन गया है कि लोग एक ऐसा गैर-भाजपाई और गैर-कांग्रेसी नेता चुन लेंगे, जो आसानी से सरकार चला लेगा? अभी नीतीश कुमार अपने ही राज्य में तीसरे नंबर की पार्टी हैं।
पिछली बार भाजपा की कृपा से मुख्यमंत्री बने थे। खैर, यह इच्छा तो इन सबकी है कि नरेंद्र मोदी हटें, पर जब सीटों की बात आएगी, तब कांग्रेस को लड़ने के लिए पूरे देश में कितनी सीटें मिलेंगी? क्षेत्रीय नेता अपने-अपने राज्य में कांग्रेस के लिए कितनी सीटें छोड़ देंगे? राष्ट्रीय स्तर पर किसी भी पार्टी को अपने को एक विकल्प के रूप में दिखाने के लिए साढ़े चार सौ से पांच सौ उम्मीदवार खड़े करने पड़ते हैं। अगर हम माकपा की बात करें, तो इस पार्टी ने कभी 250 उम्मीदवार भी लोकसभा चुनाव में खड़े नहीं किए, मतलब आपने कभी यह संदेश देने की कोशिश ही नहीं की कि आप राष्ट्रीय स्तर पर एक विकल्प हो सकते हैं। जो विपक्ष का नेता बनने के बारे में सोच रहे हैं, उन्हें यह भी देख लेना चाहिए कि कितने दिन सरकार चला पाएंगे? विपक्ष ने अभी तक ऐसा कौन सा फॉर्मूला सामने रख दिया है, जिस पर जनता भरोसा कर रही है? विपक्ष के सामने अभी बहुत किंतु-परंतु हैं। अभी विपक्ष सिर्फ इच्छा जता रहा है। पुराने मकान को ढहा कर नए मकान के निर्माण का इरादा है, पर इस निर्माण के लिए कहां से जरूरी सामग्रियां आएंगी, यह जानने के लिए इंतजार करना होगा। जो लोग विपक्ष को एकजुट देखना चाहते हैं, उनके मन में भी यह सवाल आ रहा होगा कि आखिर विपक्ष एकजुट होने के लिए 2024 का इंतजार क्यों कर रहा है?
Editorial

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