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माफिया पर मेहरबानी की शर्मनाक मिसाल
By EditorialPublished on
अतीक और अशरफ के मारे जाने के बाद इन दिनों किस्म-किस्म के माफिया सरगना चर्चा में हैं। इनमें से एक बिहार का आनंद मोहन सिंह है। वह आईएएस जी. कृष्णैया की हत्या के आरोप में आजीवन कारावास की सजा काट रहा था। नियमों के तहत उसकी इस आधार पर रिहाई नहीं हो सकती थी कि जेल में उसका चाल-चलन अच्छा रहा।
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कुख्यात अतीक और अशरफ के मारे जाने के बाद इन दिनों किस्म-किस्म के माफिया सरगना चर्चा में हैं। इनमें से एक बिहार का आनंद मोहन सिंह है। वह आईएएस जी. कृष्णैया की हत्या के आरोप में आजीवन कारावास की सजा काट रहा था। नियमों के तहत उसकी इस आधार पर रिहाई नहीं हो सकती थी कि जेल में उसका चाल-चलन अच्छा रहा। चूंकि बिहार सरकार किन्हीं राजनीतिक कारणों से उसकी रिहाई चाह रही थी इसलिए उसने संबंधित नियम में ही संशोधन कर दिया और इस तरह आनंद मोहन की रिहाई का रास्ता साफ हो गया।
आनंद मोहन और उसके साथियों ने जी. कृष्णैया की हत्या तब की थी, जब वह गोपालगंज के डीएम थे। एक डीएम के हत्यारे पर मेहरबानी का यह इकलौता उदाहरण नहीं। देश में ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं। ऐसा ही एक उदाहरण है मुख्तार अंसारी । मुख्तार पर समय-समय पर मुलायम सिंह और मायावती की सरकारों ने तो मेहरबानी दिखाई ही, एक समय पंजाब की कांग्रेस सरकार ने भी दिखाई और ऐसा करते हुए बेशर्मी की सारी हदें पार कर दीं। इन हदों के पार होने के वक्त मुख्यमंत्री थे अमरिंदर सिंह।
मुख्तार अंसारी करीब चार वर्ष पहले यूपी की बांदा जेल में बंद था। चूंकि योगी सरकार माफिया पर सख्ती बरत रही थी इसलिए मुख्तार को जेल में न तो मनमानी करने को मिल रही थी और न ही किसी तरह की अनुचित सुविधाएं। अचानक खबर आती है कि उसने बांदा जेल से मोहाली के एक बिल्डर से 10 करोड़ की रंगदारी मांगी है । मोहाली में एक रिपोर्ट दर्ज होती है और जनवरी 2019 में मुख्तार को बांदा से पंजाब लाकर रोपड़ की जेल में बंद कर दिया जाता है। उसके खिलाफ बिल्डर को धमकाने की एफआईआर पर पंजाब पुलिस कुछ नहीं करती। वह चालान तक पेश नहीं करती। मुख्तार 27 महीने रोपड़ की जेल में बंद रहता है। इस दौरान उत्तर प्रदेश पुलिस कम से कम 25 बार उसे बांदा लाने की कोशिश करती है, लेकिन हर बार पंजाब सरकार कोई न कोई अड़ंगा लगा देती है। कभी इस बहाने उसे यूपी पुलिस को नहीं सौंपा जाता कि उसकी पीठ में दर्द है और कभी इस बहाने कि वह अवसाद से ग्रस्त है ।
भगवंत मान सरकार के जेल मंत्री हरजोत सिंह बैंस की मानें तो इन 27 महीनों में मुख्तार को रोपड़ जेल की उस बैरक में अकेले रखा गया, जिसमें 25 कैदी रहने चाहिए थे । मुख्तार की पत्नी जेल के पास ही किराये के एक मकान में रहती थी, ताकि जब चाहे पति के पास वीआईपी सुविधा वाली बैरक में जा सके। हरजोत सिंह बैंस का यह भी दावा है कि मुख्तार के खिलाफ मोहाली में दर्ज कराई गई रिपोर्ट नितांत फर्जी थी और उसका एकमात्र उद्देश्य उसे पंजाब की जेल में रखना था, ताकि वह वहां तमाम सुख सुविधाओं के साथ रह सके ।
पता नहीं मुख्तार अंसारी को बांदा से रोपड़ लाने की योजना किसकी थी, लेकिन उस समय पंजाब के जेल मंत्री सुखजिंदर सिंह रंधावा थे । इस कारण संदेह की सुई उन पर ही जाती है। इसलिए और भी क्योंकि कहा जाता है कि एक बार जब रंधावा लखनऊ गए थे तो मुख्तार अंसारी के लोगों ने उनकी आवभगत की थी। पता नहीं सच क्या है, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि मुख्तार पंजाब सरकार की मेहरबानी से 27 महीने तक रोपड़ जेल में मौज करता रहा ।
जब यूपी सरकार पंजाब सरकार की बहानेबाजी से आजिज आ गई और तमाम प्रयासों के बाद भी मुख्तार को रोपड़ से बांदा नहीं ला सकी तो उसने सुप्रीम कोर्ट की शरण ली। तब की पंजाब सरकार सारी लाज शरम त्यागकर सुप्रीम कोर्ट में ऐसी दलीलें देने में जुट गई कि इन-इन कारणों से मुख्तार को यूपी पुलिस को नहीं सौंपा जा सकता। पंजाब सरकार की ओर से वकील दुष्यंत दवे ने सुप्रीम कोर्ट में मुख्तार को यूपी पुलिस को न सौंपने की खूब पैरवी की, लेकिन नाकाम रहे। सुप्रीम कोर्ट ने योगी सरकार के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा कि मुख्तार को यूपी पुलिस के हवाले किया ही जाना चाहिए। आखिरकार पिछले साल अप्रैल में उसे रोपड़ से बांदा लाया जा सका।
जब पंजाब में सत्ता बदली और कांग्रेस सरकार गई और आम आदमी पार्टी की सरकार आई तो उसने इसे लेकर एक जांच बैठा दी कि आखिर किसके इशारे पर मुख्तार की रोपड़ जेल में आवभगत की जा रही थी ? इस मामले की जांच करने वाले पंजाब पुलिस के अधिकारी ने हाल में इस आशय की एक रिपोर्ट मुख्यमंत्री भगवंत मान को सौंपी है कि मुख्तार को जेल में किस तरह की अति विशिष्ट सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही थीं। माना जा रहा कि इस रिपोर्ट के आधार पर रोपड़ जेल के कुछ अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है। पता नहीं ऐसा होगा या नहीं, लेकिन भगवंत मान ने यह साफ कर दिया है कि उनकी सरकार तत्कालीन कांग्रेस सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में मुख्तार की पैरवी करने वाले वकील की 55 लाख रूपये की फीस नहीं चुकाएगी।
अब यह तो वकील साहब ही जानें कि उनकी फीस उन्हें कैसे मिलेगी, लेकिन हम सबको यह जानना जरूरी है कि किसी माफिया को इतने निर्लज्ज तरीके से संरक्षण देने की दूसरी मिसाल मिलना मुश्किल है। क्या इससे शर्मनाक और कुछ हो सकता है कि जनता यानी हमारे-आपके पैसे से एक वकील को 55 लाख रूपये इसलिए दिया जाना तय किया गया ताकि मुख्तार सरीखा माफिया पंजाब की जेल में रहकर मौज करता रह सके ? यह इतना शर्मनाक है कि जिसके भी इशारे पर मुख्तार पर मेहरबानी की गई, उसे चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए।
- राजीव सचान

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