Rahul Gandhi
दोराहे जैसे राहुल गांधी की नियति से बंधे हुए हैं। वह कुछ कदम सीधे और सपाट चलते हैं कि अचानक कोई नई दुविधा सामने खड़ी होती है। सूरत की सत्र अदालत से मानहानि मामले में सजा बरकरार रहने के बाद उनके सामने एक बार पुन यही स्थिति आ खड़ी हुई उनके पास अभी उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के विकल्प खुले हुए हैं, पर इन ऊंची अदालतों से अगर समय रहते राहत न मिली, तो वह अगला चुनाव नहीं लड़ पाएंगे।
क्या यही वजह है कि वह अपनी बहन प्रियंका गांधी वाड्रा को वायनाड ले गए थे?
वायनाड वह क्षेत्र है, जहां से वह 2019 का चुनाव जीतकर देश की सर्वोच्च पंचायत में पहुंचे थे। नेहरू-गांधी परिवार की परंपरागत सीट अमेठी ने उन्हें ठुकरा दिया था । हमेशा की तरह दक्षिण भारत आड़े वक्त में फिर गांधी परिवार के काम आया, लेकिन मानहानि के मुकदमे में पिछले महीने सूरत की निचली अदालत से सजा पाने के बाद हालात बदल गए। लोकसभा सचिवालय ने तत्परतापूर्वक उन्हें सदन की सदस्यता से बर्खास्त कर दिया। सवाल उठता है कि अगर निर्वाचन आयोग वायनाड में उप-चुनाव का फैसला करता है, तो क्या प्रियंका गांधी वहां से चुनावी मैदान में दो-दो हाथ करती नजर आएंगी। हालांकि, कांग्रेस के अंदर चर्चा थी कि वह रायबरेली से सोनिया गांधी की जगह चुनाव लड़ेंगी, लेकिन केरल देश की सबसे पुरानी पार्टी के लिए बेहद जरूरी है। वहां की 20 लोकसभा सीटों में से 15 कांग्रेस के पास हैं। सन 2024 के चुनावों में वह इनमें से एक भी नहीं गंवाना चाहेगी। इसके लिए नेहरू-गांधी परिवार से किसी एक सदस्य का वहां से प्रतिनिधि होना जरूरी है।

ऐसे में, देश के सबसे बड़े और नेहरू-गांधी परिवार के गृह प्रदेश, यानी उत्तर प्रदेश के लिए क्या रणनीति होगी?
सूरत की निचली अदालत के फैसले के बाद कांग्रेस ने कोशिश की थी कि अपने नेता को पीड़ित और वंचित साबित कर सके । यही वजह है कि जिला न्यायालय में अपील तत्काल दाखिल नहीं की गई। उधर, भाजपा ने भी सवाल पूछने शुरू कर दिए कि भला ऐसी कौन सी वजह थी कि कांग्रेस के नामी-गिरामी वकील, जिनमें से कई सांसद या पार्टी पदाधिकारी हैं, इस मुकदमे की पैरवी के लिए सूरत नहीं पहुंचे? मामला अदालती फैसले से जुड़ा था, इसलिए कांग्रेस के पास अपने दावे को प्रमाणित करने के लिए बहुत कुछ नहीं था गुरूवार को सूरत की सत्र अदालत के फैसले ने इस मशक्कत पर पानी फेर दिया है। तय है, राहुल गांधी को अब अलग रणनीति बनानी होगी। एक तरफ, उन्हें कानूनी लड़ाई लड़नी है, तो दूसरी तरफ सियासी लड़ाई के लिए नए दांव खोजने हैं।
कोई आश्चर्य नहीं कि पिछले आम चुनाव से पहले जिन नीतीश कुमार को कांग्रेस ने निराश किया था, उन्हीं के लिए अब लाल कालीन बिछाई जा रही है। नीतीश तो पिछली सितंबर में भी इसी उम्मीद से दिल्ली आए थे, पर तब उन्हें 'परिवार' की ओर से हरी झंडी नहीं मिली थी । यही वजह है कि वह और तेजस्वी सरेआम कहने लगे थे कि हम तो विपक्षी एकता के प्रयासों के लिए तैयार हैं, कांग्रेस हां तो करे। इस फैसले के बाद तयशुदा तौर पर नीतीश कुमार पर कांग्रेस की निर्भरता बढ़ेगी। नीतीश का अनुभव और विपक्षी नेताओं के बीच गहरी पैठ कुछ नए सियासी समीकरण बन सकती है।
यही नहीं, जब तक राहुल बेदाग साबित नहीं हो जाते, तब तक उन्हें मल्लिकार्जुन खड़गे को भी ज्यादा स्वायत्तता देनी होगी। राहुल गांधी के लिए अच्छा होगा कि वह एक बार फिर से विपक्षी एकता की पैरोकारी के साथ सड़कों पर उतरें। आज की राजनीति में ऐसे व्यक्तियों की बेहद कमी है, जो सत्ता से बाहर रहते हुए भी लोकहित में जन- प्रतिनिधियों पर परोक्ष दबाव बना सकें। सत्तानायकों की निरंकुशता रोकने का सबसे अच्छा तरीका यही है।
हालांकि, ऐसी कोशिशें वह पहले भी कर चुके हैं। आपको याद होगा, वर्ष 2011 में वह उत्तर प्रदेश के भट्टा पारसौल जा पहुंचे थे। वहां के किसान आंदोलनरत थे, क्योंकि प्रदेश सरकार एक निजी कंपनी की विद्युत परियोजना के लिए जमीन अधिगृहित कर रही थी और किसान उसके पक्ष में नहीं थे। इस आंदोलन से कांग्रेस का तो कोई भला नहीं हुआ, पर मायावती जरूर अगला चुनाव हार गईं।
इसी तरह, राहुल गांधी ने जन- प्रतिनिधित्व कानून में संशोधन संबंधी अध्यादेश की प्रतियां मीडिया के सामने फाड़ दी थीं। मनमोहन सिंह यह अध्यादेश लेकर आए थे। यह अपनी ही सरकार पर हमला था । मनमोहन सिंह का इससे बड़ा अपमान नहीं हो सकता था कि जिस नेहरू-गांधी परिवार ने उन्हें यहां तक पहुंचाया था, उसी का वारिस सरेआम उनके फैसले की चिंदियां बिखेर रहा था । वह चाहते, तो प्रधानमंत्री से अकेले में भी बात कर सकते थे। उनका कहा बेकार भी नहीं जाने वाला था, पर ऐसा कर उन्होंने खुद को एक इंसाफपसंद और स्वतंत्र सोच का नेता साबित करने की कोशिश की थी।
आज वही कानून उनके गले की हड्डी बन गया है। तय है, राहुल भी इन दुश्वारियों को जानते हैं और इसीलिए उन्होंने जातीय गणना के पक्ष में बोलना शुरू कर दिया है। 'जिसकी जितनी हिस्सेदारी, उसकी उतनी भागीदारी' नारा कभी कांग्रेस को सत्ता से उखाड़ने के लिए लगाया गया था। राहुल आज खुद उसी रास्ते पर चल पड़े हैं। मतलब साफ है कि हम आने वाले दिनों में मंडल और कमंडल की राजनीति का पुनर्जन्म देखने जा रहे हैं। गृह मंत्री अमित शाह ने पिछले दिनों कहा था कि पहली
जनवरी 2024 तक राम मंदिर बनकर तैयार हो जाएगा। तय है कि वहां पर मूर्ति प्रतिष्ठापना से लेकर सारे समारोह भव्यतापूर्वक किए जाएंगे, ताकि हिंदुओं की धार्मिक आस्थाओं को हवा दी जा सके। भाजपा इस भाव का लाभ पहले से उठाती आई है।
यहां दो सवाल खड़े होते हैं, अयोध्या में 'भव्य राम मंदिर' की शुरूआत क्या कोई ऐसी लहर जन सकेगी, जो भाजपा का तीसरी बार केंद्र में बहुमत तय कर सके ? या, जातीय गणना के नाम पर एक बार फिर से वैसा ही तूफान बरपा होगा, जिसने राम लहर को लील लिया था?
यह सवाल इसलिए और भी ज्यादा दिलचस्प हो जाता है, क्योंकि इस समय केंद्र की हुकूमत नरेंद्र मोदी के हाथ में है। और वह खुद पिछड़ी जाति से आते हैं। यही नहीं, पिछले तमाम प्रादेशिक और राष्ट्रीय चुनावों में वह सफलतापूर्वक साबित कर चुके हैं कि उनमें जातीय समीकरणों को तोड़ने की अद्भुत क्षमता है।
राहुल गांधी अगर अपने मकसद में कामयाब होना चाहते हैं, तो उन्हें अपने मन, वचन और कर्म को एकाकार करना होगा । उन पर मौजूदा आफत भी वाणी की फिसलन से आई है। संवाददाता सम्मेलनों में उनके तेवर अक्सर उनकी अर्जित की हुई प्रतिष्ठा से मेल नहीं खाते। उन्हें मालूम ही होगा कि वह और उनकी पार्टी लगातार तीसरी पराजय बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं हैं।
- शशि शेखर
Editorial

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