Karnataka Elections
साल 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र की सत्ता पाने के बाद से भाजपा हरेक चुनाव पूरे जोश- ओ-खरोश से लड़ती रही है, फिर चाहे वह लोकसभा चुनाव हो या स्थानीय निकाय के चुनाव | वह न सिर्फ प्रत्येक चुनावी जंग को समान गंभीरता से लेती है, बल्कि अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ती। कर्नाटक भी इसका अपवाद नहीं है, और इसीलिए 10 मई का विधानसभा चुनाव काफी अहम होने जा रहा है, क्योंकि इसे भी भाजपा पूरे आक्रामक तरीके से लड़ रही है। मगर जो बात इस चुनावी समर को दिलचस्प बनाती है, वह है इस सूबे की अनूठी सामाजिक संरचना, जिसने भगवा पार्टी को दक्षिण के राज्यों में पैर तो जमाने दिया, पर अभी तक उसे पूर्ण बहुमत से दूर रखा है।
ज्यादातर राज्यों की तरह यहां की राजनीति भी दो जातियों के आसपास चलती हैं- लिंगायत और वोक्कालिगा । अनुमान है कि कुल आबादी में इनकी हिस्सेदारी क्रमशः 17 प्रतिशत और 15 प्रतिशत है। हालांकि, यहां का सबसे बड़ा सामाजिक समूह दलित है, जिसकी अनुमानित संख्या 19 फीसदी है। रही बात ब्राह्मणों की, तो उनकी हिस्सेदारी महज 3 प्रतिशत होने का अनुमान है, लेकिन दक्षिणपंथ के उभार के बाद वे प्रभावशाली भूमिका निभाने लगे हैं।
भाजपा और कांग्रेस, दोनों के लिए ही यह मुकाबला महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसके बाद साल के अंत में राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, जिसके बाद मध्य प्रदेश की चुनावी बिसात बिछ जाएगी, जहां अगले वर्ष की शुरूआत में मतदान हो सकता है। इन बड़े सूबों में दोनों पार्टियां आमने-सामने हैं। भाजपा जहां अगले साल होने वाले आम चुनावों के लिए अपनी लय बरकरार रखते हुए इन राज्यों को जीतना चाहेगी, तो वहीं कांग्रेस के लिए यह अस्तित्व का सवाल होगा । उसे इन सूबों में अपना झंडा बुलंद करना होगा और विपक्ष को यह संदेश देना होगा कि बड़े राज्यों में अब भी उसका दमखम बचा हुआ है। इससे विपक्षी दलों में भी भाजपा के खिलाफ संयुक्त मोर्चा बनाने का विश्वास मजबूत होगा ।
दोनों दलों ने दो अलग-अलग तरीकों से चुनाव की तैयारी की है। कांग्रेस जहां यह दावा कर रही है कि यह चुनाव 'देश को बचाने' के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह निरंकुशता की ओर बढ़ रहा है, वहीं भाजपा हिंदुत्व के साथ-साथ विकास की अपनी राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए लोगों का साथ मांग रही है। दिलचस्प है कि किसी अन्य राज्य की तुलना में कांग्रेस यहां कहीं अधिक आत्मविश्वास के साथ मैदान में उतरी है। हालांकि, मुख्यमंत्री पद के आकांक्षी सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच तनाव अब भी कायम है, फिर भी, दोनों ने विवाद को फिलहाल किनारे करके एकजुट होकर मैदान में उतरने का फैसला किया है। वहीं, भाजपा अप्रत्याशित रूप से आंतरिक उथल-पुथल का सामना कर रही है। टिकट न मिलने के कारण उसके कई बड़े नेताओं तक ने पाला बदल लिया है। दो प्रमुख लिंगायत नेताओं- पूर्व मुख्यमंत्री जगदीश शेट्टार व पूर्व उप-मुख्यमंत्री लक्ष्मण सावदी के पार्टी छोड़ कांग्रेस में शामिल हो जाने से भाजपा को अपने वोट बैंक में सेंध लगने की चिंता सताने लगी है।
दरअसल, साफ-सुथरे रिकॉर्ड वाले शेट्टार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक संतोष पर आरोप लगाया है कि वह पार्टी को अपने अधीन करने की कोशिश कर रहे हैं। इस आरोप के बाद यह धारणा बनने लगी है कि वोक्कालिगा और लिंगायत के प्रभुत्व वाली सूबाई राजनीति अब ब्राह्मणों के कब्जे में जा रही है, जिससे नाराजगी फैल रही है। इतना ही नहीं, मुस्लिमों के लिए आरक्षण खत्म करके उसे लिंगायत और वोक्कालिगा में बराबर-बराबर बांटने संबंधी राज्य सरकार के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी ने भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग की कोशिश की हवा निकाल दी है। भाजपा के पारंपरिक समर्थक माने जाने वाले 'लेफ्ट हेंड' दलितों का एक हिस्सा (जिनको अमूमन अस्पृश्य माना जाता है) समुदाय के भीतर आंतरिक कोटा के आवंटन से नाराज है, जिसे दो प्रतिशत बढ़ा दिया गया था। रही बात 'राइट हैंड' दलितों (जिनकी स्थिति बेहतर हुई है और वे अस्पृश्य नहीं समझे जाते) की, तो वे पारंपरिक रूप से कांग्रेस पार्टी का समर्थन करते रहे हैं। भाजपा के भीतर इस बात को लेकर भी नाराजगी है कि पार्टी ने अपनी परंपरा का पालन करते हुए कई मौजूदा विधायकों का टिकट काट दिया है और नए चेहरों को मौका देकर सत्ता विरोधी लहर को कम करने का प्रयास किया है। कर्नाटक चुनाव में तीसरा और महत्वपूर्ण कारक जनता दल (सेक्युलर) है, जो मैसूर क्षेत्र में सीमित आधार होने के बावजूद किंगमेकर बना हुआ है। दोनों राष्ट्रीय दल इसको लेकर एहतियात बरत रहे हैं, क्योंकि त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में यह पार्टी काफी अहम बन सकती है। इसके 90 वर्षीय मुखिया और पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौड़ा राज्य
की राजनीति को प्रभावित करने का माद्दा रखते हैं, ताकि सूबाई सियासत पर उनके परिवार की पकड़ बनी रहे । पार्टी चाहती है। कि चुनाव में ढुलमुल जनादेश सामने आए, ताकि सत्ता में एक बार फिर लौटने के लिए वह मोल-भाव कर सके।
भाजपा साफ तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करिश्मे पर भरोसा कर रही है। उसका स्थानीय नेतृत्व बहुत ज्यादा प्रभाव छोड़ने में सफल नहीं हो पा रहा। यहां तक कि ' 40 प्रतिशत कमीशन सरकार' नारे का तोड़ भी वह नहीं निकाल पाया है, जिसके द्वारा विपक्ष यह आरोप लगा रहा है कि राज्य सरकार प्रत्येक सौदे में 40 फीसदी रिश्वत लेती है। भाजपा को लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी के मैदान में उतरते ही मतदाताओं का मूड बदल जाएगा। हालांकि, कांग्रेस यह कहते हुए इसे खारिज कर रही है कि राज्य के चुनाव में अंततः मुख्यमंत्री ही मायने रखता है। उसे उम्मीद है कि मतदाता विधानसभा और लोकसभा चुनावों का फर्क समझेंगे।
कर्नाटक चुनाव इस बात का भी संकेत हो सकता है कि हिंदी पट्टी, विशेषकर उत्तर प्रदेश में अपनी शानदार सफलता के बाद भाजपा की आक्रामक राजनीति दक्षिण के राज्यों में कितना कारगर साबित होती है? हिजाब, हलाला और इसी तरह के अन्य विवादों के माध्यम से मतदाताओं को ध्रुवीकृत करने के प्रयासों से यहां भाजपा को मिश्रित सफलता मिली है। पहचान की आक्रामक राजनीति से भी वह बहुत दूर जाती नहीं दिख रही। ऐसे में, हम एक बार फिर कांटे का मुकाबला देखने जा रहे हैं।
- एस. श्रीनिवासन
Editorial

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