Amritpal Singh
पंजाब पुलिस ने हाईकोर्ट की फटकार और राज्य में हो रही किरकिरी के बाद खालिस्तान समर्थक कट्टरपंथी अमृतपाल सिंह को 36 दिन बाद गिरफ्तार कर लिया । वारिस पंजाब दे के स्वयंभू प्रमुख को एक गुरूद्वारे से गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारी के पहले उसने गुरूद्वारे में प्रवचन दिया। पुलिस के मुताबिक, उसे फरारी के दौरान कई राज्यों के गुरूद्वारों में शरण मिली। अंतत रविवार को नाटकीय ढंग से उसे गिरफ्तार कर लिया गया। उसने गिरफ्तारी के पहले ही अपने बयान में कह दिया था कि वह आत्मसमर्पण कर रहा है।
यह कहानी तब शुरू हुई थी, जब वारिस पंजाब दे के संस्थापक प्रमुख अभिनेता दीप सिद्धू की संदिग्ध हालात में एक सड़क दुर्घटना में मौत के बाद अचानक दुबई का ट्रांसपोर्टर 29 वर्षीय अमृतपाल सिंह पिछले साल वापस पंजाब लौटा था । उसने भिंडरवाला जैसी वेशभूषा अपनाई खुद ही अपने नाम के आगे जत्थेदार लगाने लगा। उसने आम आदमी पार्टी की सरकार में भगवंत मान के मुख्यमंत्री बनने के बाद खाली हुई सीट पर कट्टरपंथी शिरोमणि अकाली दल (अमृतसर) के प्रमुख सिमरनजीत सिंह मान का समर्थन किया। जब मान जीत गए, तो अमृतपाल का कद बढ़ता चला गया और वह धर्म के प्रचार के नाम पर कट्टरपंथ का खुलेआम समर्थन करने लगा। उसने 10 महीने में खुद को खालिस्तान के सबसे बड़े समर्थक उग्र विचार वाले नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश की।
वह विदेशी चंदे और कट्टरपंथी सोच के युवाओं के बूते आनंदपुर खालसा फोर्स बनाने लगा। उसका ट्रेनिंग कैंप भी चलता रहा । उसकी मदद को किसान आंदोलन से जुड़े युवा और प्रौढ़ भी आए, जो सरकार सेज थे। हमें याद होगा, किसानों का विरोध सिर्फ कृषि कानूनों को रद्द कराने तक ही नहीं था, बल्कि केंद्र सरकार के खिलाफ माहौल बनाकर खालिस्तान समर्थक भावनाओं को बढ़ाना भी प्रमुख मकसद था। रॉ सहित तमाम खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट बताती हैं कि उसको आईएसआई ने ट्रेनिंग देकर भारत भेजा था और वह खालिस्तान के लिए बड़ी साजिश रच रहा था। पंजाबी गायक सिद्धू मूसेवाला के कत्ल को खालिस्तान से जोड़कर देखा गया, क्योंकि वह पंजाब के हक और युवा संस्कृति के मुद्दों को अपने गीतों में समेटता था। विधानसभा चुनाव में शिरोमणि अकाली दल और उससे नियंत्रित शिरोमणि गुरूद्वारा प्रबंधक कमेटी की जमीन कमजोर होने से पंथक सियासत डगमगाने लगी थी। अमृतपाल सिंह ने इसका फायदा उठाया और पंथक राजनीति की शून्यता को भरने के लिए खुद को विकल्प के रूप में प्रस्तुत करना शुरू कर दिया।
पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के बाद माहौल बदला और पंथक राजनीति में कुछ नया दिखाने, केंद्र के विपरीत भावनाओं को अमृतपाल ने भुनाना शुरू कर दिया। युवाओं का साथ मिलते ही वह एकदम से आगे बढ़ गया। सियासी कारणों से न पुलिस, न कोई राजनीतिक दल और न केंद्रीय जांच एजेंसियां उससे टकराने की स्थिति में नजर आईं। हालांकि, एनआईए प्रमुख दिनकर गुप्ता पंजाब के पूर्व डीजीपी हैं, जो हर स्थिति को समझते थे, मगर वह भी खामोश रहे। पंजाब की ताजा बनी सरकार उस पर हाथ डालने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी। पंजाब में एक दर्जन आतंकी घटनाओं ने पुलिस और सरकार को एक तरह से बैकफुट पर ला दिया था। ऐसे में, अमृतपाल ने खुद को मजबूत करके पेश किया।
हालांकि, आमतौर पर पंजाबी सिख हों या हिंदू, अलग राष्ट्र के हिमायती नहीं रहे हैं। यही वजह है, अलगाववादी कट्टरपंथी शिरोमणि अकाली दल (अमृतसर) को पंजाब में कभी सफलता नहीं मिली है। सिख हों या पंजाबी हिंदू अपनी धरती से बहुत प्यार करते हैं, खेत-खलिहान नहीं छोड़ना चाहते हैं। विदेश जाने पर भी अपने खेत किराए पर देकर मस्त रहते हैं।
बहरहाल, अमृतपाल इस साल 10 फरवरी को तब चर्चा में आया, जब उसने सात आपराधिक मुकदमों के बाद भी एनआरआई किरणदीप कौर से शादी रचाई। 23 फरवरी को अपने साथियों को छुड़ाने के लिए अमृतसर के अजनाला थाने पर हमला बोल दिया। सरकार और पुलिस पर दबाव पड़ा, तो मुलजिमों को छोड़ना पड़ा। उसके बाद ही पुलिस ने शिकंजा कसना शुरू किया । 18 मार्च को पुलिस ने वारिस पंजाब दे के खिलाफ कार्रवाई शुरू की। अमृतपाल मौके से भाग निकला, उसके 78 साथी 48 घंटे में गिरफ्तार किए गए। 400 से अधिक लोग हिरासत में लिए गए। खुफिया एजेंसियों, पुलिस के तमाम दबाव और हाईकोर्ट की फटकार के बाद ही वह 36 दिन बाद गिरफ्तार किया जा सका। आखिर पुलिस को इतना वक्त क्यों लगा, वजह साफ है कि पुलिस और सरकारों में यह हिम्मत नहीं थी कि गुरूद्वारों के अंदर खोज अभियान चला सकें। वजह, ऑपरेशन ब्लू स्टार को देख चुकी सरकारें खतरा उठाने को तैयार नहीं थीं ।
पंजाब सदैव उग्र और आजाद ख्याल का रहा है, मगर 1970 के दशक में इंदिरा गांधी की मजबूत सरकार के खिलाफ पाकिस्तान और अमेरिका मिलकर साजिश रच रहे थे। उन्होंने पंजाब में अलगाववादी कट्टरपंथियों को हवा दी, राजनीति ने करवट ली। शिरोमणि गुरूद्वारा प्रबंधक कमेटी में प्रभावी अकाली दल ने केंद्र सरकार से सिखों के लिए विशेष रियायतें मांगीं। साल 1973 और 1978 में आनंदपुर साहिब प्रस्ताव पारित किया गया। तत्कालीन इंदिरा गांधी ने इस पर अंकुश लगाने की कोशिश की, तो दमदमी टकसाल के प्रमुख जरनैल सिंह भिंडरावाला ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। पंजाब की पहली गैर- कांग्रेसी सरकार कमजोर थी, जिसने कट्टरपंथियों को मदद दी और 1980 के दशक की शुरूआत में यह आंदोलन अराजक आतंकी हो गया । इसे खालिस्तान आंदोलन नाम दिया गया और तब पंजाब आतंकवाद की भेंट चढ़ गया था। इस बार उस इतिहास से सबक लेते हुए सरकार और पुलिस किसी भी कड़े कदम से बचना चाहती थी। एजेंसियां किसी भी तरह से धार्मिक आस्था को ठेस पहुंचाकर शांति भंग की आशंका से वाकिफ थीं, इसलिए ऑपरेशन अमृतपाल को धार्मिक संस्थाओं की मदद से ही अंजाम दिया गया। तमाम सावधानियों का नतीजा सामने है, एक अलगाववादी को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत गिरफ्तार कर असम की डिब्रूगढ़ जेल भेज दिया गया है।
- अजय शुक्ला
Editorial

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