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भ्रष्टाचार मुद्दा बना तो मुश्किल में होगा विपक्ष
By EditorialPublished on
देश में जब-जब चुनाव का मुख्य मुद्दा भ्रष्टाचार विरोधी (Anti-corruption) अभियान रहा, तब-तब भ्रष्टाचार (Corruption) का बचाव करने वालों की हार ही हुई है। विडंबना यह है कि इसके बाद भी 14 विपक्षी दल सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह शिकायत लेकर पहुंच गए कि सीबीआई (CBI) और ईडी (ED) का दुरूपयोग किया जा रहा है। उन्हें वहां से खाली हाथ लौटना पड़ा। ऐसा लगता है कि विपक्षी दल यह भूल गए कि जनता भ्रष्टाचार को पसंद नहीं करती। आजादी के तत्काल बाद से ही तत्कालीन कांग्रेस सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने शुरू हो गए थे, पर 1962 तक लो

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सुरेंद्र किशोर
देश में जब-जब चुनाव का मुख्य मुद्दा भ्रष्टाचार विरोधी (Anti-corruption) अभियान रहा, तब-तब भ्रष्टाचार (Corruption) का बचाव करने वालों की हार ही हुई है। विडंबना यह है कि इसके बाद भी 14 विपक्षी दल सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह शिकायत लेकर पहुंच गए कि सीबीआई (CBI) और ईडी (ED) का दुरूपयोग किया जा रहा है। उन्हें वहां से खाली हाथ लौटना पड़ा। ऐसा लगता है कि विपक्षी दल यह भूल गए कि जनता भ्रष्टाचार को पसंद नहीं करती। आजादी के तत्काल बाद से ही तत्कालीन कांग्रेस सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने शुरू हो गए थे, पर 1962 तक लोग कांग्रेस और उसके नेताओं के प्रति मोहित थे । इसलिए बहुत बातें नजरअंदाज होती रहीं। तब प्रतिपक्ष भी काफी बिखरा था। इसके बाद भी कांग्रेस (Congress) जब भी सत्ता में आई, उसे 50 प्रतिशत से कम ही मत मिले। 1967 में जब गैर कांग्रेसी दलों में सीमित चुनावी एकता हुई तो देश के 9 प्रदेशों में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई। यदि थोड़ी और अधिक दलीय एकता हुई होती तो केंद्र की सत्ता से भी कांग्रेस बाहर हो गई होती।
याद रहे तब चुनाव का मुख्य मुद्दा भ्रष्टाचार था। उससे पहले कांग्रेस आत्ममुग्धता की स्थिति में थी । कोई घोटाला साबित हो जाने पर भी सत्ताधारी नेता कहा करते थे कि विपक्ष में ताकत है तो चुनाव में दिखाए। जीप घोटाले में जांच कमेटी ने वीके कृष्ण मेनन को दोषी माना, फिर भी तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री ने संसद में कह दिया कि इस मामले को बंद कर दिया गया है। जब विपक्ष ने दोषी को सजा देने की मांग पर जोर दिया तो सरकार ने कहा कि इसका फैसला अगले चुनाव में हो जाएगा। इसी तरह बारी-बारी से मूंदड़ा कांड, धर्मतेजा ऋण घोटाला, प्रताप सिंह कैरों घोटाला आदि होते रहे। उस दौरान प्रतिपक्षी दल कांग्रेस सरकारों के भ्रष्टाचार के खिलाफ देश भर में अभियान चलाते रहे । मतदाताओं पर उस अभियान का असर हुआ। उन्होंने 1967 के आम चुनाव में कांग्रेस को काफी हद तक सबक सिखा दिया ।
1971 के बाद सरकारी धन के लूट की गति तेज हो गई। तब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भ्रष्टाचार का बचाव करते हुए कहा था कि भ्रष्टाचार सिर्फ भारत में ही नहीं है, यह तो विश्वव्यापी है। इससे पहले 1967 में जिन 9 राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें बनी थीं, वे भी अपनी कमजोरियों और भ्रष्टाचार के छिटपुट आरोपों के कारण स्थायित्व नहीं पा सकीं। कांग्रेसी फिर सत्ता में आ गए। विपक्षी एकता के शिल्पकार राममनोहर लोहिया ने 1967 की गैर कांग्रेसी सरकारों से कहा था कि 'बिजली की तरह कौंध जाओ और सूरज की तरह स्थायी हो जाओ।' पर वह यह काम नहीं करा सके। लोहिया का वह काम उनका नाम लिए बिना आज उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कर रहे हैं।
इंदिरा गांधी ने 1969 में जब कांग्रेस पार्टी (Congress party) तोड़ी और गरीबी हटाओ का नारा दिया तो उसके पीछे भी उनका पूंजीवाद एवं प्रकारांतर से भ्रष्टाचार पर ही हमला था। उन्होंने पूंजीवाद और भ्रष्टाचार को समानार्थक शब्द बनाकर पेश किया। इसका उन्हें चुनावी लाभ भी मिला । जनता ने 1971 के लोकसभा चुनाव में उन्हें पूर्ण बहुमत दिया। उसके बाद इंदिरा गांधी ने आम लोगों की गरीबी हटाने की जगह अपने पुत्र संजय गांधी के लिए मारूति कार का कारखाना स्थापित करवाया। फिर मारूति घोटाला सामने आया। इसके अलावा भी कई घोटाले हुए । तब कांग्रेस की राज्य सरकारों में भी भ्रष्टाचार संस्थागत रूप लेने और बढ़ने लगा। इसी पृष्ठभूमि में बिहार से जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में 1974 में जन आंदोलन शुरू हो गया । वह आंदोलन देशव्यापी हुआ । उस आंदोलन के मुख्य मुद्दे थे- भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी और अशिक्षा । जब 1975 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी अपने चुनावी भ्रष्टाचार के कारण अपनी संसद सदस्यता गंवा बैठीं तो उन्होंने देश पर आपातकाल थोप दिया।
आपातकाल के अत्याचार और भ्रष्टाचार के मिले-जुले कारणों से 1977 में इंदिरा गांधी सत्ता से बाहर गईं। मोरारजी देसाई के नेतृत्व में 1977 में केंद्र में गठित पहली गैर-कांग्रेसी सरकार पर भ्रष्टाचार का तो कोई बड़ा आरोप नहीं लगा, किंतु उस सरकार में कलह बढ़ गया । उससे ऊब गई जनता ने 1980 में कांग्रेस को फिर सत्तासीन कर दिया। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी के नेतृत्व में जो सरकार बनी, वह भ्रष्टाचार के कारण ही 1989 में सत्ताच्युत हो गई। उस चुनाव के बाद कांग्रेस को कभी लोकसभा में पूर्ण बहुमत नहीं मिला। वास्तव में देश में जब- जब भ्रष्टाचार मुद्दा बना और जिन नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे, जनता के एक हिस्से ने उन्हें वोट देना बंद कर दिया।
भ्रष्टाचार को लेकर आम लोगों की वितृष्णा अब भी कम नहीं हुई है। 2014 के लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Elections) में नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) के नेतृत्व में राजग की बड़ी जीत का काफी 'श्रेय' मनमोहन सिंह के दस साल के घोटाला राज को दिया जा सकता है। उन घोटालों ने कांग्रेस सरकार के प्रति लोगों में वितृष्णा पैदा कर दी । उसका लाभ आम आदमी पार्टी जैसे दल ने भी उठाया। तब गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी की साफ-सुथरी छवि को लोगों ने पसंद किया। दूसरी बार 2019 में जब भाजपा (BJP) ने अधिक बहुमत से विजय प्राप्त की तो उसका बड़ा कारण यही था कि 2014-19 के बीच मोदी सरकार के खिलाफ घोटाले का कोई ठोस आरोप सामने नहीं आया । कांग्रेस ही भ्रष्टाचार को लेकर बचाव की मुद्रा में रही। आज भी है।
आज ऐसी स्थिति बन रही है कि अगला लोकसभा चुनाव भ्रष्टाचार पर हमला करने वालों और भ्रष्टाचार का बचाव करने वालों के बीच होगा । इतिहास बताता है कि भ्रष्टाचार का बचाव करने वालों की जीत मुश्किल से ही होती है। हालांकि आज विपक्षी नेता मोदी के खिलाफ मजबूत दलीय गठबंधन बनाने के लिए प्रयत्शील हैं और वे सामाजिक गठबंधन की मजबूती का हौसला भी बांध रहे हैं, किंतु उत्तर प्रदेश में पिछले साल के दो लोकसभा उपचुनावों और बिहार के विधानसभा उपचुनावों के नतीजे बता रहे हैं कि त पंथनिरपेक्ष- सामाजिक न्याय के पैरोकार दलों का वोट बैंक दरक रहा है। लोगों क मूड यह बता रहा है कि 2024 के चुनाव से पहले तक भ्रष्टाचारियों के खिलाफ जितनी कार्रवाई होगी, जनता से प्रतिपक्ष का दुराव उतना ही बढ़ेगा।

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