Suresh goyal
दिनों घूमने-फिरने, लोगों से मिलने जुलने में एक बात मेरे ध्यान में आई कि अमरीकी परिवारों में 4-5 बच्चे तो होते ही हैं। हमारे यहां जनसंख्या (Population) के अमुमन हौवे और अन्तर्राष्ट्रीय दबाव, खास करके विदेशी (Foreigner) चन्दों पर पलने वाले एन.जी.ओ.. के कारण एसा माहौल बना कि अब हर परिवार एक बच्चे से ही सन्तुष्ट हो जाता है। ज्यादा से ज्यादा हो गए तो दो। पहले दो या तीन बस था तब भी ठीक था मगर अब वह भी नहीं रहा।
हमारे देशवासियों की विशेष परिस्थिति है, चाहे वे किसी भी धर्म के उपासक हो, समान वंश व विरासत के कारण सभी का खान-पान, रहन-सहन एक जैसा है, आवश्यकताएं भी एक सी और चीजों को देखने का नजरिया भी एक जैसा। इस कारण हम समूचे विश्व से अलग हैं।
यदि विश्व में हमारे जैसे 5-7 देश और होते तो कोई बात नहीं थी, अपनी तरह का अकेला देश (Country) होने के कारण इस तरह का जनसंख्या नियंत्रण होता रहा हम विलुता के कगार पर पहुंच जायेंगे। यहां जहां जहां में जाता हू हर परिवार के साथ लटकते झूमते 4-5 बच्चे देख बार बार यह अनुभूति होती है।
मगर कुछ वर्ष पूर्व हमारे यहां एक व्यक्ति द्वारा 5 स्टार होटलों के शौचालयों में लोटा रखवाने की याचिका के बाद सर्वत्र टेलीफोन शावर और कमोड में जेट फाउन्टेन होने लगे हैं जो उच्च से उच्च श्रेणी के स्थानों में भी मिल जायेंगे। विदेशों में इनका चलन अभी तक नहीं हो पाया है इस कारण टिश्यू पर ही निर्भर रहना पड़ता है। इनके बार बार उपयोग से मेरी तो गुदा छिल जाती है। कहीं कोई गिलास या पात्र भी नजर नहीं आता। आदत ही एसी पड़ी हुई है क्या करें। अद में टिश्यू को हलका सा गीला कर इस्तेमाल करने लगा हूं तो इससे राहत महसूस होती है।
कनाडा (Canada) जा रहे थे तो एक दिन पहले ढेर सारी पूड़ियां और आलू की सब्जी बनवा ली, थोड़ा अचार भी साथ ले लिया। यूं तो आजकल हर जगह भारतीय रेस्टोरेन्ट (Indian restaurant) मिल जाते हैं, मगर एक तो इन्हें ढूंढ कर वहां जाना पड़ता है दूसरे इनका खाना बहुत मंहगा पड़ जाता है। पूड़ी-साग साथ में हो तो जहां मर्जी हो खा लो।
दूसरे दिन सुबह जल्दी की उड़ान थी, एयरपोर्ट दूर था, जल्दी निकलना था मगर नींद ही देर से उड़ी तो निकलते निकलते देर हो गई। उड़ान नहीं मिली तो आगे से आगे के सारे तय कार्यक्रम रद्द होने का खतरा था। समय पर पहुँचने के लिये राजा तेज गाड़ी चला रहा था, मैं घबरा रहा था कि कहीं कोई पुलिस (Police)
वाला टिकिट नहीं थमा दे। अपने यहां जिसे चालान बनाना कहते हैं, यहां इसे टिकिट थमाना। पुलिस वाला टिकिट (Ticket) दे देता है, आप चाहो में उसे चुनौती दो, अन्यथा निश्चित अवधि में जुर्माना भर दो। न पुलिस आपको कुछ कहती है न आपके कुछ कहने का उस पर असर होता है सारी कार्रवाई अत्यन्त शांति से होती है जिसमें । आपके 100-200 डालर की चपत लग जाती है।
एक तो गाड़ी की रफ्तार तेज, दूसरे सड़क पर जगह जगह गने पड़े हुए जिससे गाड़ी बार बार उछल जाती थी। गठ्ठे देखकर मैं यही सोच रहा था कि गों की समस्या हमारे देश तक ही सीमित नहीं है। यह सर्वव्यापी है। न्यूयार्क जैसा शहर भी इससे अछूता नहीं है क्रिस पीछे बैठी थी, वह बार बार चेतावनी दे रही थी मगर कोई असर नहीं। इस सबका फायदा यह हुआ कि हम एन वक्त पर हवाई अड्डे पहुँच गये।
न्यूयार्क (New York) में तीन-चार हवाई अड्डे हैं। एक मेक आर्थर हवाई अड्डा तो हमारे घर के पास ही था, उसी से टिकट बुक कराना चाहा मगर उसका एक व्यक्ति का बेफेलो आने जाने का टिकट 260 डालर में पड रहा था जबकि जे.एफ. के. हवाई अड्डे से उड़ने वाली जेट ब्लू उड़ान का यही टिकट सिर्फ 130 डालर का आ रहा था। हमने आधी कीमत वाला यह टिकिट ले लिया।
जे.एफ. के. हवाई अड्डा अपने आप में इतना बड़ा है कि आपको यह पता होना चाहिये कि कहाँ जाना है। यहां से 90 एयरलाईन्स के विमान उड़ान भरते हैं। अलग अलग एयरलाइन्स (Airlines) के अलग अलग टर्मिनल थे। हमें जेट ब्लू लेना था इसलिये बहुत पहले से बोर्ड पढ़ना शुरू कर दिया, रास्ता चूके नहीं कि कई मीलों का फेरा पड़ जाता है, पहले से ही हम लेट चल रहे थे इसलिये यह खतरा भारी पड़ सकता था।
जेट ब्लू अकेले का टर्मिनल (Terminal) बहुत बड़ा था। हमारे यहां के बड़े बड़े हवाई अड्डों से भी बड़ा । क्रिस हमें छोड़ कर गाड़ी वापस ले गई। हम सामान ले कर टर्मिनल में प्रविष्ठ हुए। कहीं किसी प्रकार की सुरक्षा जांच या फोटो पहचान की आवश्यकता नहीं थी। हमारे यहां तो हवाई अड्डे में प्रवेश के पूर्व सुरक्षा गार्ड डिक्की खुला सामान की जांच करते हैं, टर्मिनल में सुरक्षा अधिकारी टिकिट व पहचान पत्र जांचते, इसी से 20 कदम दूरी पर एक और सुरक्षा अधिकारी वही जांच दोहराता, चेक इन पर फिर पहचान पत्र, बोर्डिंग पास मिलने के बाद फिर जांच और अन्त में विमान में चढ़ने के पहले वापस सुरक्षा जांच। यह छ: परती जांच महज लाल फीताशाही है, इससे होता जाता कुछ नहीं, करने वाले अपनी करतूतों को अंजाम दे ही रहे हैं, पिसता साधारण आदमी ही है।
टर्मिनल में प्रवेश किया तो यात्रियों की भारी भीड़ और लम्बी लम्बी लाइनें देख कलेजा धक रह गया। समय हो चुका था, लाईन में लगे तो देर होने की आशंका थी। यहीं जगह जगह पर स्वयं चेक इन के कियोस्क लगे थे मगर हमारे पास तो सामान भी था जो चेक इन करना था, वैसे भी न मुझे न राजा को इन कम्प्यूटरों से
चेक इन करना आता था। वहीं एक अधिकारी खड़ा था, उससे पूछा तो उसने टिकिट लेकर कम्प्यूटर के अड़ा दिये तो अन्दर से बोर्डिंग पास निकल आये। इतनी आसान प्रक्रिया से मैं हैरान रह गया। लेकिन हमारे पास सामान भी था, इसका क्या होगा ? उसी अधिकारी से पूछा तो उसने एक तरफ इशारा किया जहां बेगेज चेक इन लिखा था। हम अपना सामान लेकर एक कतार में खड़े हो गये। बहुत जल्द हमारा नम्बर आ गया। हमने अपना बोर्डिंग पास बताकर सामान वहां रखी मशीन पर रख दिया, यहां एक लड़की खड़ी थी उसने हमारा बोर्डिंग पास वहीं लगे कम्प्यूटर में स्केन किया तो दो स्लीपें निकल आई मशीन पर सामान का वजन आ गया जो सीमा के अन्दर था, वजन ज्यादा होता तो अतिरिक्त पैसा देना पड़ता। लगेज टिकट निकलते ही सामान अपने आप कन्वेयर बेल्ट से आगे बढ़ गया। अब हमें निर्धारित गेट से अपनी उड़ान पकड़नी थी। इससे पूर्व पहली बार सुरक्षा जांच हुई। हमारे
सुरक्षा जांच महज औपचारिकता थी स्त्रियों व पुरूषों की अलग अलग लाइनें नहीं थी, दोनों एक ही कतार में खड़े थे। पहचान पत्र व बोर्डिंग पास बताकर आगे बढ़े और सेल फोन वगैरह अलग रख बाकी सामान स्केनर बेल्ट पर रख दिया हम मेटल डिटेक्टर गेट से गुजर गये। यहां किसी प्रकार की शरीर जांच नहीं थी। यह सब होने के बाद हम उड़ान के निर्धारित द्वार पर पहुँच गये। गनीमत यह हुई कि उड़ान में आधा घन्टा विलम्ब हो गया जिससे हमारा सारा कार्य सकुशल सम्पन्न हो गया।
कुछ देर थी तो हम टर्मिनल में ही घूमने लगे। एक बात यहां की बहुत अच्छी लगी कि चाहे स्त्री हो या पुरुष, जवान हो या वृद्ध सभी एक दूसरे को देखकर मुस्कराते हैं और विश करते हैं, मुझे भी यह आदत डालना अच्छा लगा मगर एक अन्य बात से दुःख भी हुआ। भारतीय जहां भी मिलते हैं वे देखते ही पहचान लिये जाते हैं, मगर ये एक दूसरे को देख कर इस तरह मुस्कराहटों का आदान प्रदान नहीं करते वरन एसा मुँह बनाते है जैसे ये देसी कूकड़े यहां क्या कर रहे।
शीघ्र ही उड़ान की घोषणा हो गई तो हम विमान की तरफ अग्रसर भी कोई चेकिंग नहीं, यहां तक की बेगेज तक पर टेग लगाना जरूरी नहीं था।
नीले परबत बरफानी झीले
Editorial

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