मुफ्त में बदनाम हो जाने की आशंका सताती रही
सिर्फ ट्रोली के 6 डोलर लगना तगड़ा झटका था। मन मसोसता हुआ आगे बढा तो दूर से ही अपना सामान नजर आ गया। मैंने अपनी अटेचियों के हेण्डल पर लच्छे की कई परतें बांध दी थी जिससे सामान की पहचान आसान हो जाती थी। अटेचियां मेरी नहीं थी, बहू मीतू की थी इसलिये पहचानता भी नहीं था, वैसे भी सब अटेचियां एक जैसी ही प्रतीत होती है इसलिये उनमें से अपनी छांटना मुश्किल कार्य होता है। आजकल हवाई अड्डों के बेल्ट पर अटेचियां उल्टी चलाई जाती हैं। इसलिये उनकी पहचान और भी मुश्किल हो जाती है। लच्छा कोई बांधता नहीं इसलिये मुझे आसानी रहती है। कई लोग तरह तरह के रिबन या कपड़े भी बांध देते हैं।
ज्यूंही मैं अपनी ट्रोली अटेचियों के पास ले गया तो एक स्त्री की आवाज सुनाई दी - मि. गोयल । मैं हैरान रह गया, यहां मुझे पहचानने वाला कौन आ गया, दिल फिर सहम गया कि कहीं आव्रजन अधिकारी
(Immigration officer)
का विचार तो नहीं पलट गया। मैंने घूम कर देखा तो एक अश्वेत स्त्री एमीरेट्स एयरलाइन्स की वेशभूषा में खड़ी थी। उसने बताया कि मुझे ले जाने के लिये टेक्सी तैयार है। उसकी बात सुन कर मैंने राहत की सांस ली। टेक्सी को लेकर मन में बड़ा उहापोह था।
मैंने सामान ट्रोली में भर लिया तो महिला ने मुझे एक फार्म थमा दिया। यह कस्टम क्लियरेन्स का फार्म था जिसमें यह घोषणा (Announcement) करनी होती थी कि मेरे पास कोई सीमा शुल्क योग्य सामान नहीं है, न ही खाने पीने का भी कोई सामान है। एसा ही एक फार्म विमान से उतरने से पहले भी भरकर आव्रजन अधिकारी को दे चुका था, उसमें मैं झूठ लिख चुका था कि मेरे पास खाने पीने का कोई सामान नहीं है, इसलिये वापस उस झूठ को दोहराने में आत्मा कहीं आड़े नहीं आ रही थी। मैं फार्म भरने लगा तो महिला ने पूछ लिया कि खाने पीने का कोई सामान तो नहीं है? मैंने झट से ना में सिर हिला दिया तो उसने कहा कि फार्म पर सिर्फ हस्ताक्षर कर दो। मेरे से फार्म लेकर वह आगे चलने लगी और मुझे पीछे आने को कह दिया। कस्टम के भी कई काउन्टर लगे हुए थे मगर यहां कोई खास चेकिंग होती नजर नहीं आ रही थी। हर काउन्टर पर अच्छी खासी भीड़ थी मगर मुझे उस महिला ने लाईन तोड़ कर आगे ले लिया व कस्टम अधिकारी को मेरा फार्म थमाकर मुझे बाहर निकाल दिया। यह वी.आई.पी. ट्रीटमेन्ट मेरे बिजनेस क्लास टिकिट
(Business class ticket)
का कमाल था वरना इकोनोमी क्लास का टिकिट होता तो लाईन में धक्के खाने पड़ते और सामान भी ढूंढना पड़ता तथा टेक्सी भी खुद को ही करके जाना पड़ता ।
मैंने तो टिकिट इकोनोमी क्लास का ही लिया था, उसके भी पैसे ज्यादा लग गये थे जिससे मुझे बहुत तकलीफ हुई। दरअसल अमेरिका यात्रा (America trip) का कार्यक्रम बहुत पहले से बन रहा था मगर तिथियां तय नहीं हो पा रही थी। तब आने जाने का टिकिट सिर्फ 55 हजार में ही मिल रहा था मगर प्रात:काल मुम्बई (Mumbai) के नये ओफिस का उद्घाटन होना था। फर्नीचर के काम में विलम्ब हो रहा था तो तिथियां निश्चित नहीं हो पा रही थी । अन्तत: जब तिथि निश्चित होकर अन्तिम कार्यक्रम बनाया तब तक टिकिट के दाम 73 हजार रू. पहुँच गये। देखती आंखों यूं 18 हजार का नुक्सान मैं पचा नहीं पा रहा था मगर यह सोच कर कि और देर की तो दाम इससे भी अधिक हो जायेंगे। टिकिट बुक कराते कराते ही दाम 75 हजार हो गये। कोई चारा नहीं था इसलिये मन मसोस कर इसी दर पर टिकिट बुक करा दिया।
इकोनोमी क्लास तथा बिजनेस क्लास की दरों में तीन गुना अन्तर होता है। इकोनोमी क्लास में सीट पर ही बैठे बैठे सारी यात्रा गुजारनी पड़ती है जबकि बिजनेस में सीट लम्बी हो कर आरामी से सोने को मिल जाता है। मैं तो वैसे भी सीट पर भी आलथी-पालथी मार कर ही बैठता हूं इसलिये मुझे इकोनोमी में यात्रा करने में कोई परेशानी नहीं थी। सीट पर बैठे बैठे ही मुझे आरामी से नींद भी आ जाती है इसलिये सोने में भी कोई दिक्कत नहीं थी।
न्यूयार्क (New york) में मेरा पारिवारिक मित्र डा. जितेन्द्र सोढी रहता है, उसने कह दिया था कि वह मुझे एयरपोर्ट (Airport) पर लेने आ जायगा इसलिये इस बात की भी कोई चिन्ता नहीं थी। यात्रा से एक दिन पहले मेरे भतीजों संदीप व महीप ने मुझे बताया कि मुझे एयरपोर्ट पर लेने टेक्सी आ जायगी तो मैंने कहा कि फालतू का खर्चा करने की क्या जरूरत है तब उन्होंने बताया कि टेक्सी एयरलाइन्स वाले प्रदान करते हैं। मैं अचरज में पड़ गया, इतनी यात्राएं करता हूं मगर कभी किसी एयर लाइन्स को टेक्सी सुविधा प्रदान करते नहीं देखा।
मेरे चेहरे का कौतूहल समझ वे हंसते हंसते बोलने लगे कि आपका टिकिट बिजनेस क्लास का करवा दिया है। मुम्बई में अपने घर से भी उनकी टेक्सी (Taxi) आपको लेने आ जायगी। मेरा दिल धक रह गया, इन्होंने यह क्या कर दिया, मेरी सुविधा के लिये फालतू में सवा- डेढ लाख रू. की चपत लगा दी। इतने पैसों से तो मैं अमेरिका में कुछ खर्चा करता, कोई सामान लाता।
मैंने उन्हें डांटा-फटकारा तो भी दोनों भाई हंसते रहे, कहने लगे अपने पर कितना भी खर्च करें आप मना नहीं करते। आप इस उमर में इतनी लम्बी यात्रा अकेले कर रहे हो तो आपकी सुविधा सुनिश्चित करना हमारा कर्तव्य है। क्या हुआ लाख सवा लाख ज्यादा लग गया तो, और कमा लेंगे, रात दिन मेहनत किसके लिये करते हैं। उनकी इस बात का मेरे पास कोई उत्तर नहीं था। मन में खुशी थी कि आज दिन तक मैं सबकी जिन्दगी चलाता आ रहा था, आज ये मेरी जिन्दगी चला रहे हैं।
मैंने जितेन्द्र (Jitendra) को सूचना दे दी कि अब एयरपोर्ट पर लेने आने की जरूरत नहीं तो उसने एक काम बता दिया। उसके किसी मित्र को कुछ दवाएं चाहिये थी जो मुझे लेकर जानी थी। मैं अचरज में पड़ गया कि दवाएं तो अमेरिका से आती हैं, यह उल्टी गंगा कैसे बह रही है। दवा का नाम आ गया तो फोन पर दवाएं भेजने का आर्डर दे दिया। दवा विक्रेता ने कहा कि यह एसी दवा है जो बिना प्रेस्क्रिप्शन के नहीं मिल सकती। मैंने कहा एसी कौन सी दवा है तो महीप हंसने लगा। मैंने पूछा तो उसने बताया कि यह वियाग्रा जैसी दवा है जो अमेरिका में बहुत मंहगी मिलती है और भारत में बहुत सस्ती ।
अभी तक तो मन में सवा लाख का टेन्शन चल ही रहा था, यह और टेन्शन हो गया कि इस तरह की दवा लेकर मैं जा कैसे सकता हूं। इस बात का संतोष था कि दवा मिल ही नहीं रही तो ले जाने का सवाल कहां उठता। मैं यह सब सोच रहा था इस बीच तो महीप ने उदयपुर
(Udaipur)
फोन भी घुमा दिया और अपने एक दोस्त से तुरन्त यह दवा कहीं से भी मंगा कर आज के आज वीडियो कोच से मुम्बई भेजने का आदेश दे दिया।
मैं अपने दोस्त को कोसने लगा कि एसी दवा मंगाने के लिये मैं ही मिला था, महीप को भी इसकी बड़ी जल्दी पड़ी है दवा मंगाने की। मैं मन ही मन यही प्रार्थना कर रहा था कि दवा अगले दिन पहुँचे ही नहीं ताकि इसे ले जाने का झंझट ही खड़ा न हो। मुम्बई में हमारे बहुत करीबी और पारिवारिक मित्र हैं रवि अग्रवाल । ये बहुत सतर्क और सोच समझ कर काम करने वाले इन्सान है, इन्हें पता चला तो इन्होंने कह दिया कि आप दवा भले ही ले जाओ मगर इसका एक प्रेस्क्रिप्शन (Prescription) जरूर बनवा कर साथ ले जाओ। मैंने कहा प्रेस्क्रिप्शन मैं कहां से लाऊं, तो इन्होंने कहा कि वे बनवा देंगे।
रवि की बात से एक और शंका जाग गई। दवाएं तो मैं अपने दैनन्दिन इस्तेमाल की भी ले जा रहा था, इनका भी कोई प्रेस्क्रिप्शन नहीं था, क्यूंकि वर्षों से इन्हें इस्तेमाल कर रहा था, यह बात रवि को बताई तो उसने दवाओं के नाम मुझसे ले लिये और कहा कि इनके भी प्रेस्क्रिप्शन वो बनवा देगा।
रवि तो चला गया मगर एक बात मुझे सताती रही । वियाग्रा जैसी दवाई का प्रेस्क्रिप्शन तो मेरे नाम से बनेगा। खुदा न खास्ता किसी के सामने आ गया तो मैं तो मुफ्त में बदनाम हो जाउंगा और जीवन भर की तपस्या पर बट्टा लग जायगा।
Editorial

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