✕
...तो अतीक का यह न होता अंजाम
By EditorialPublished on
मेरी इस स्वीकारोक्ति से आपको ताज्जुब जरूर होगा, पर यही सच है कि मैं दोहरी जिंदगी जीता रहा हूं। 35 साल मैंने आजीविका के लिए खाकी कपड़े पहने, पर साथ में लेखक भी बना रहा । लिखना पढ़ना तो आईपीएस (IPS) में आने के पहले से था । व्यस्त नौकरी में भी बना रहा और रिटायरमेंट (Retirement) के बाद तो अब यही है। पुलिस (Police) ऐसा पेशा है, जिसमें भांति-भांति के लोगों से आपका साबका पड़ता रहता है और मानव मन या मनोविज्ञान के छात्र के लिए खास तरह के लोगों के चेहरों पर आने-जाने वाले भाव पढ़ना रचनात्मक अनुभव हो सकता है।
_202304181747222475.jpg)
x
_202304181747222475.jpg)
विभूति नारायण राय
मेरी इस स्वीकारोक्ति से आपको ताज्जुब जरूर होगा, पर यही सच है कि मैं दोहरी जिंदगी जीता रहा हूं। 35 साल मैंने आजीविका के लिए खाकी कपड़े पहने, पर साथ में लेखक भी बना रहा । लिखना पढ़ना तो आईपीएस (IPS) में आने के पहले से था । व्यस्त नौकरी में भी बना रहा और रिटायरमेंट (Retirement) के बाद तो अब यही है। पुलिस (Police) ऐसा पेशा है, जिसमें भांति-भांति के लोगों से आपका साबका पड़ता रहता है और मानव मन या मनोविज्ञान के छात्र के लिए खास तरह के लोगों के चेहरों पर आने-जाने वाले भाव पढ़ना रचनात्मक अनुभव हो सकता है।
मेरे सामने जब कोई अपराधी आता था, तब उसे पता ही नहीं चलता था कि कब वह मेरी दिलचस्पी का विषय बन गया। मुझे उसके शरीर में आंखें सबसे अधिक आकर्षित करती थीं। उसकी आंखों क्षण भर के लिए कौंधने वाली चमक में छिपी घृणा, क्रोध, भय या प्रेम जैसी भावनाओं को मैं फौरन पकड़ सकता था । उनकी कथाएं, उनमें निहित लालच व प्रतिशोध की गाथाएं मुझे आकर्षित करती थीं। मेरे अंदर का लेखक उनका लाभ उठाता था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश (Western Uttar Pradesh) के एक माफिया को तीन वर्ष तक करीब से देखने का मौका मिला और मैंने एक उपन्यास उस पर लिख डाला।
अभी जब मैंने अतीक अहमद (Ateek Ahmed) की हत्या के बारे में सुना, तो मुझे बहुत-सी चीजें अनायास याद आ गईं। वह भी किसी भी लेखक के लिए चुनौती हो सकता था। उसकी आंखों में पसरी निर्लिप्तता से आप नहीं भांप सकते थे कि उसके मन में क्या चल रहा है। मैं 1990 में आज के प्रयागराज और उन दिनों के इलाहाबाद का वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक या एसएसपी (SSP) नियुक्त हुआ था और जाते ही मुझे उसके बारे में पता चला था। मेरे वहां पहुंचने के चंद महीने पहले वह निर्दलीय विधायक बना था और उसने इस राजनीतिक यात्रा की शुरूआत ही अपने प्रतिद्वंद्वी चांद बाबा की हत्या से की थी । चांद बाबा कॉरपोरेटर था और एक खूंखार बमबाज के रूप में उसकी कुख्याति थी । उसके मरते ही अतीक इलाहाबाद के अपराध जगत का बेताज बादशाह बन गया और इलाहाबादी भाषा में उसकी हनक कायम हो गई। फिर शुरू हुआ वह सफर, जिसमें उसने अकूत संपदा जुटाई, पांच बार विधायक बना और एक बार फूलपुर की उस सीट से लोक सभा का सदस्य बन गया, जिसका पहले कभी तीन आम चुनावों में देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने प्रतिनिधित्व किया था। यह भारतीय राजनीति (Indian politics) का वह विद्रूप है, जिससे हम रोज दो-चार होते रहते हैं।
पहली बार अतीक निर्दलीय चुना गया था, पर उन दिनों के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव (CM Mulayam Singh Yadav) अल्पमत में थे और उन्हें उसके समर्थन की जरूरत थी। उसने उनका समर्थन किया और उसकी भरपूर कीमत वसूल की। बाद में तो वह उनकी पार्टी में शरीक हो गया और कई चुनावों में उनके टिकट पर जीता। जब कभी समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) ने मना किया, किसी दूसरे दल ने उसे टिकट दे दिया। उसका भाई अशरफ भी एक बार विधायक चुना गया। दोनों भाइयों के राजनीतिक पराभव की शुरुआत तब हुई, जब अशरफ को एक चुनाव में राजू पाल ने से उसे दिन-दहाड़े मार गिराया। इस घटना हरा दिया और अशरफ ने बड़े नृशंस तरीके ने इलाहाबाद की अंतरात्मा को झकझोर दिया था और उसके बाद दोनों भाइयों की चुनावी राजनीति को ग्रहण लगना शुरू हो गया। वे चुनाव हारने लगे, पर इसके बाद उनका आपराधिक कैरियर अपने नए उरूज पर पहुंचा। अपने आतंक के बल पर उन्होंने धड़ाधड़ जमीनें और मकान कब्जियाना शुरू कर दिया। उनके दुस्साहस की हद समझने के लिए एक ही उदाहरण काफी है। श्रीमती गांधी परिवार से जुड़े एक व्यक्ति की सिविल लाइंस की संपत्ति लगभग प ही ली गई होती, अगर नई दिल्ली से हस्तक्षेप न हुआ होता।
खैर, अपनी नियुक्ति की शुरूआत में ही मेरा उससे सामना हो गया था। उसने हमारे एक सब-इंस्पेक्टर के साथ अभद्रता की और मैंने फैसला किया कि उसके खिलाफ कानूनी कार्यवाही की जाए। मैं और कलेक्टर कोतवाली में बैठ गए और हमने एसपी सिटी ओपी सिंह के नेतृत्व में पुलिस बल उसे गिरफ्तार करने के लिए भेज दिया। उस रात जो नाटक घंटों चला, उसमें राज्य की कई संस्थाएं बेनकाब हुईं। स्वाभाविक है, लोकतंत्र में राजनीतिक नेतृत्व का निर्णय सर्वोपरि होता है, लिहाजा कई घंटों की जद्दोजहद के बाद अतीक का घर घेरकर बैठे पुलिस बल को वापस बुलाना पड़ा था। कई लोगों का मानना है कि अगर उस रात कार्यवाही हुई होती, तो अतीक का कद इतना बड़ा नहीं हो पाता कि राज्य उसके सामने बौना नजर आने लगता ।
माफिया (Mafia) को राजनीतिक संरक्षण मिलते ही उसकी महत्वाकांक्षाओं और उपलब्धियों को पर लग जाते हैं। वह किसी को भी खरीद सकता है या किसी भी प्रतिरोध को बलपूर्वक रौंदता हुआ आगे बढ़ सकता है। अतीक ने भी यही किया था। मेरा उससे संपर्क तो जल्द ही टूट गया, क्योंकि मैं इलाहाबाद से निकलकर भारत सरकार की सेवा में चला गया और दस साल तक राजस्थान से कश्मीर तक सेवा देते रहा, पर अपनी दिलचस्पी के चलते उसके उत्थान और पतन पर लगातार निगाहें रखे रहा और मुझे जानकर कोई आश्चर्य नहीं होता था कि वह कानून-कायदों को ठेंगे पर रखते हुए अकूत संपदा जुटाता जा रहा था । जेलों में रहकर भी उसका और उसके भाई अशरफ का दबदबा बरकरार रहा, बल्कि जेल के अंदर से उसने ज्यादा प्रभावी ढंग से अपने साम्राज्य का विस्तार किया ।
आज जब राज्य पूरी तरह से उस पर टूट पड़ा, अप्रत्याशित रूप से उसका अंत बड़ा कारूणिक नजर आ रहा है। वह, उसका भाई अशरफ और पांच में से एक बेटा असद अलग-अलग हालत में मारे जा चुके हैं, बीवी शाइस्ता परवीन भागी भागी फिर रही है, दो बड़े बेटे जेल में हैं और शेष दो नाबालिग सुधारगृह में। दरअसल अपराध की दुनिया ऐसी भूल-भुलैया की तरह है, जिसमें एक बार प्रवेश करने के बाद बाहर निकलने के रास्ते बहुत मुश्किल से मिलते हैं। अतीक भी एक बार उसमें घुसा और फिर उसके तिलिस्मी सम्मोहन मे फंसकर रह गया । जो उसका इस्तेमाल कर रहे थे, वे भी शायद नहीं चाहते थे कि वह इससे बाहर निकल आए। यह भी सच है कि खुद उसने या उसके किसी दुश्मन या चाहने वाले ने सपने में भी इतने भयानक अंत के बारे में कल्पना नहीं की होगी।

Editorial
Next Story
Related News
X
