Political violence
राजीव सचान
राजनीतिक हिंसा (Political violence) के लिए कुख्यात बंगाल में राजनीति का एक और घिनौना - डरावना चेहरा पिछले दिनों तब देखने को मिला, जब दक्षिण दिनाजपुर जिले के बालूरघाट इलाके में तीन आदिवासी महिलाएं सड़क पर दंडवत करती हुई दिखीं। उन्हें दंडवत करते हुए करीब एक किलोमीटर चलकर तृणमूल कांग्रेस की सदस्यता फिर से ग्रहण करनी पड़ी। उनका 'अपराध' यह था कि उन्होंने कुछ दिनों पहले करीब दो सौ लोगों के साथ भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली थी। उनका ऐसा करना तृणमूल कांग्रेस (Trinamool Congress) के स्थानीय नेताओं को रास नहीं आया । उन्होंने उन पर दबाव बनाया और इस क्रम में इतना आतंकित किया कि उन्हें एक किलोमीटर तक रेंगते हुए तृणमूल कांग्रेस के दफ्तर जाना पड़ा। कोई भी समझ सकता है कि उन्हें ऐसा करने के लिए विवश किया गया होगा और अंजाम भुगतने की चेतावनी दी गई होगी। उनसे यह भी कहा गया होगा कि भाजपा की सदस्यता ग्रहण करने का पश्चाताप उन्हें सड़क पर रेंगते हुए चलकर करना होगा । इसकी पुष्टि दक्षिण दिनाजपुर की तृणमूल कांग्रेस की जिला महिला अध्यक्ष प्रदीप्ता चक्रवर्ती के इस बयान से होती है कि इन महिलाओं ने भाजपा में जाने का पछतावा इस तरह करना पसंद किया। यह झूठ के अलावा और कुछ नहीं, क्योंकि कोई भी स्वेच्छा से ऐसा करना पसंद नहीं करेगा। वह किसी धमकी के चलते ही ऐसा करेगा और वह भी तब जब उसे यह अंदेशा होगा कि यदि उसने वैसा नहीं किया, जैसा कहा जा रहा है तो उसकी जानमाल के लिए खतरा हो सकता है। इस घटना से तृणमूल कांग्रेस के नेता इतने शर्मसार हुए कि उन्होंने प्रदीप्ता चक्रवर्ती को उनके पद से हटा दिया, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। यह कार्रवाई बदनामी और शर्मिंदगी से बचने के लिए हुई ।
बालुरघाट मामले का संज्ञान महिला आयोग ने लिया है और चूंकि दंडवत करने के लिए मजबूर महिलाएं आदिवासी समुदाय की हैं इसलिए अनुसूचित जनजाति आयोग भी इस घटना का संज्ञान ले सकता है । यह समझ आता है कि किसी दल के नेता और कार्यकर्ता दूसरे दल की सदस्यता ग्रहण कर लें तो उसके नेताओं को यह पसंद नहीं आता, लेकिन आम तौर पर जब ऐसा होता है कि संबंधित दल के लोग उनकी निंदा करने तक सीमित रहते हैं या फिर बहुत होता है तो ऐसे आरोप लगाते हैं कि वे मौकापरस्त, दलबदलू, सिद्धांतहीन हैं और किसी लालच में उन्होंने अपनी राजनीतिक निष्ठा बदली है। नेताओं और कार्यकर्ताओं की और से दल बदलने का काम देश भर में होता ही रहता है, लेकिन दलबदल के बाद जैसी हिंसक और घृणित राजनीति बंगाल में होती है, वैसी अन्यत्र कहीं नहीं होती । बंगाल में किसी दल के सदस्य का दूसरे दल में जाना दुश्मनी मोल लेना होता है। बंगाल के उन राज्यों में है, जहां तब भी राजनीतिक हिंसा चलती रहती है, जब चुनाव नहीं हो रहे होते हैं। चुनावों के दौरान यह हिंसा वीभत्स रूप ले लेती है। हिंसा चुनाव के पहले ही तेज हो जाती है और वह चुनाव के बाद भी जारी रहती है। इसका एक प्रमाण 2021 के विधानसभा चुनावों
(Assembly elections)
के समय मिला था । चुनाव बाद नतीजों की घोषणा के समय जैसे ही यह स्पष्ट हुआ कि तृणमूल कांग्रेस की जीत होने जा रही है, वैसे ही इस पार्टी के गुंडे विरोधी दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं पर टूट पड़े। चूंकि पुलिस ने मूकदर्शक बने रहना पसंद किया, इसलिए तृणमूल समर्थक गुंडों ने उन्हें भी निशाना बनाया, जिनके बारे में उन्हें संदेह था कि उन्होंने तृणमूल कांग्रेस को वोट नहीं दिया।
चुनाव बाद हिंसा इतनी भीषण और भयावह थी कि तमाम लोगों ने जान बचाने के लिए अपना घर छोड़ दिया और पड़ोसी राज्य असम में जाकर शरण ली। इनमें ज्यादातर भाजपा (BJP) समर्थक अथवा उसे वोट देने वाले थे। इनके घर-बार लूटे और जलाए गए और उनकी महिलाओं के साथ अभद्रता की गई। कुछ दुष्कर्म का भी शिकार हुईं। एक तरह से साक्षात जंगलराज वाली स्थिति बन गई थी, लेकिन ममता बनर्जी
(Mamata Banerjee)
का यही कहना था कि कहीं कोई हिंसा नहीं हुई और राज्य सरकार को बदनाम करने के लिए झूठा प्रचार किया जा रहा है। स्पष्ट है कि इससे हिंसा करने वाले तत्वों का दुस्साहस और बढ़ा। यह हिंसा कितनी व्यापक थी, इसे इससे समझा जा सकता है कि करीब 60 लोग मारे गए थे। सैंकड़ों लोगों को अपने घर छोड़कर अन्यत्र शरण लेनी पड़ी थी । इनमें से कुछ तृणमूल कांग्रेस समर्थक गुंडों के भय से अभी भी लौट नहीं पाए हैं। संयोग से कलकत्ता हाई कोर्ट ने इस हिंसा का संज्ञान लिया और उसने सीबीआई से चुनाव बाद हिंसा की जांच करने को कहा। इसके अलावा उसने राष्ट्रीय मानवाधिकार से हिंसा की घटनाओं की जांच करने के लिए कहा । इस आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि बंगाल में कानून का शासन नहीं, बल्कि शासक का कानून चल रहा है।
बंगाल के हालात को देखते हुए इस नतीजे पर पहुंचने के अलावा और कोई उपाय नहीं कि ममता बनर्जी के शासन में राज्य राजनीतिक हिंसा के मामले में उससे भी खराब स्थिति में पहुंच गया है, जहां वाम दलों के शासन के समय था । तृणमूल कांग्रेस के किसी नेता और कार्यकर्ता के दूसरे दल में शामिल होने का मतलब है आफत बुलाना। चूंकि राजनीतिक हिंसा सत्तारूढ़ दल के इशारे पर होती है अथवा हिंसा करने वालों को सत्ता का संरक्षण मिलता है इसलिए आमतौर पर पुलिस भी असहाय निरुपाय नजर आती है। वास्तव में यह कहना ज्यादा उपयुक्त होगा कि पुलिस जानबूझकर खुद को असहाय दिखाना पंसद करती है। राजनीतिक हिंसा की एक निकृष्ट संस्कृति को संरक्षण देनी वाली ममता बनर्जी की आलोचना इसलिए नहीं होती, क्योंकि वे कथित तौर पर सेक्यूलर खेमे की नेता हैं।
Editorial

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