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न्यूयार्क : 7 । अमेरिका का मौसम विभाग भी हमारी ही तरह अनिश्चित
By EditorialPublished on
मेरी घबराहट धीरे धीरे कम हो रही थी। जो होना था सो हो गया, गनीमत थी कि इतने में ही निपट गये, कहीं अधिक लग जाती तो सारी यात्रा ही चौपट हो जाती। मैं किसी प्रकार के मुकदमे के पक्ष में नहीं था मगर राजा का गुस्सा भी स्वाभाविक था। प्रेम बिचारा पशोपेश में था। वह होटल की लापरवाही से तो नाराज था ही मगर होटल वाला भी उसके मिलने वाला था। उसने राजा को शांत किया कि

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मेरी घबराहट धीरे धीरे कम हो रही थी। जो होना था सो हो गया, गनीमत थी कि इतने में ही निपट गये, कहीं अधिक लग जाती तो सारी यात्रा ही चौपट हो जाती। मैं किसी प्रकार के मुकदमे के पक्ष में नहीं था मगर राजा का गुस्सा भी स्वाभाविक था। प्रेम बिचारा पशोपेश में था। वह होटल की लापरवाही से तो नाराज था ही मगर होटल वाला भी उसके मिलने वाला था। उसने राजा को शांत किया कि हम यहां भारतीयों, राजस्थानियों (Rajasthan) की मदद करते हैं, उनके लिये मुसीबतें नहीं खड़ी करते।
राजा का गुस्सा भी धीरे धीरे शांत हुआ और वह पुराने मूड में आ गया। मुझे वेटर की ड्रेस में देखकर वापस खिलखिला पड़ा और जोर जोर से कहने लगा- अमेरिका की धरती पर आपका स्वागत है, एसा अभूतपूर्व स्वागत और गर्म गर्म दाल से अभिषेक, शायद ही पहले कभी किसी का हुआ हो। वातावरण हल्का हो गया तो सबको भूख लग आई। मैं अब भी सहज नहीं था, गर्दन पर भारी जलन हो रही थी, मैंने सोचा - अगर मैं नहीं खाउंगा तो ये लोग भी नहीं खाएंगे।
मैंने थोड़ा खाया, थोड़ा खाने का उपक्रम किया मगर इसी बहाने खाना खा लिया। खाने का बिल 400 डालर आया। प्रेम बिल अदा करने लगा तो होटल वाले ने साफ इन्कार कर दिया, हमारी लापरवाही से आपको इतनी तकलीफ है, हम पैसे कैसे ले सकते हैं, प्रेम ने जिद की फिर भी वह नहीं माना।
हम सब लोग बाहर आ गये तो राजा फिर मजाक करने लगा, दावा ठोक देते तो आपकी सारी यात्रा के पैसे वसूल हो जाते, बिजनेस क्लास (Business class) का जो आपका टेन्शन है वह भी खतम हो जाता। मैं उसकी बातें सुनता रहा और खिसियानी हंसी हंसता रहा।
घर लौटे तब तक काफी रात हो चुकी थी। मुझे सुबह जल्दी उठना भी था। भारत (India) के और यहां के वक्त में साढे नौ घंटे का अंतर था। सुबह साढ़े पांच बजे उठा तब भारत में दिन के 3 बज रहे थे, वहां भी इसी वक्त ट्विटर (Twitter) लिखता हूं। लिख कर वाटस एप कर दिया और वापस सो गया।
अगले दिन सुबह उठते ही हाथ-पांव संभाले, जलन तो कहीं नहीं थी मगर दो तीन जगह निशान पड़ गए थे। फफोले कहीं नहीं देख राहत की सांस ली। राजा ने उठते ही गोलियों की बात छेड़ी तो मैंने उसे बता दिया कि अन्तिम समय पर गोलियां पहुंच गई इसलिये मेरे साथ आ गई। मैंने उसे उलाहना भी दिया कि इस तरह के काम वो मुझसे नहीं करवाया करे। उसने बताया कि भारत में कई तरह की दवाईयां बहुत सस्ती है, उसकी खुद की आंखों में डालने वाली ड्रोप वो भारत से मंगाता है जो यहां 143 डालर में मिलती है और वहां कुछ सौ रूपयों में। इसी तरह वियाग्रा जैसी यह गोली यहां 56 डालर में मिलती है जबकि वहां 10-15 रू. लगते होंगे। इसी के साथ उसने पूछ लिया कि इसके कितने पैसे लगे ताकि अगले से वसूल सकें। मुझे इसके बारे में कोई जानकारी नहीं थी। मैंने दवाईयों का पेकेट उसे लाकर दे दिया। देखते ही उसने कह दिया कि ये तो 100 नहीं लगती। मैंने तो गिनी तो क्या इनकी तरफ देखा तक नहीं था, मानों देखने से ही मेरा धर्म भ्रष्ट हो जाता हो । राजा ने गिनी तो गोलियां 70 के करीब ही निकली। उसने महीप को फोन लगाया और दाम पूछे तथा गोलियां कम होने के बारे में भी बताया। दोनों हंस हंस कर फोन पर बातें कर रहे थे मगर मुझे कुछ पता नहीं चल रहा था।
बाद में मुझे बताया कि गोलियां तो उदयपुर से 100 ही चली थी, मगर मुम्बई (Mumbai) पहुँचते पहुँचते जिन जिन हाथों से गुजरी पांच-सात, पांच-सात गायब होती रही। यह चीज ऐसी है कि हर कोई आजमाना चाहता है। मुम्बई में आई तो यार दोस्तों ने पांच सात और उठा ली। इस तरह 100 की 70 रह गई। रही दाम की बात तो महीप के जिस डाक्टर दोस्त ने गोलियां भेजी उसने एक भी पैसा लेने से इन्कार कर दिया।
अब राजा मुझसे पूछने लगा कि कितने पैसे लेने हैं। मैंने कह दिया- मैं क्या जानूं। उसने कहा कि यहां तो इनकी इतनी ज्यादा कीमत है, जितने चाहे पैसे ले सकते हैं। मैंने मना कर दिया कि अपन कोई धन्धा थोड़े ही कर रहे। तेने मंगाई और मैं ले आया।
इस बीच किसी का फोन आ गया। शायद जिसने दवाई मंगाई थी उसी का था क्यूंकि वह कह रहा था कि गोलियां आ गई है मगर 70 ही आई हैं। फोन रख कर उसने मुझे बताया कि जोएल का फोन था। मैंने पूछा कौन जोएल। तो उसने बताया कि बहुत साल पहले वह उदयपुर (Udaipur) आई थी और अपने घर आई थी। लीला बाईजी ने इसे अत्यन्त प्रेम से मेवाड़ी खाना खिलाया था। लीला बाईजी का निधन हुए ही 15 साल हो गए थे, उसके पहले की घटना थी, मुझे हल्का सा याद आ तो रहा था मगर जोएल की शक्ल याद नहीं कर पा रहा था।
मैं मन ही मन सोच रहा था क्या इस स्त्री ने दवा मंगाई है, यह तो अब बूढ़ी हो चुकी होगी। राजा ने कहा कि जोएल मुझे याद कर रही थी, बाईजी का सुना तो उसे बहुत दुःख हुआ। वह हमें अपने घर बुला रही थी, उसकी मम्मी का जन्म दिवस भी एक दिन पूर्व ही मनाया गया था। तब राजा नहीं गया था, यह सोच कर कि मैं रहा हूं तो साथ ही चलेंगे।
नहा-धो कर दवा ले कर हम लोग निकल पड़े जोएल के घर की तरफ। रास्ते में अचानक तेज बारिश आ गई तो राजा मौसम को कोसने लगा। जब बारिश की भविष्यवाणी करते हैं तब तो बारिश आती नहीं और जब आकाश साफ बताते है। और दूर दूर तक बारिश की कोई संभावना नहीं बताते तब बारिश आ जाती है। मैं सोचने लगा कि हर जगह का मौसम विभाग क्या एसा ही है। हमारे यहां तो अमेरिका से सीखने को कहते मगर यहां भी यही हाल रास्ते में एक बहुत बड़ा भारतीय रेस्टोरेन्ट (Indian restaurant) उषा था। यहां हर तरह के भारतीय खाद्य, दक्षिण भारतीय, पंजाबी, गुजराती व्यंजन सब मिलते हैं। बहुत बड़े दुकान थी, भारतीयों का तांता सा लगा हुआ था। पानी पतासों से लेकर जलेबी डोसे, समोसे, लस्सी हर तरह की चीजें यहां थी। हमने भी गरम गरम समोसों का आनन्द लिया। कोई माथुर परिवार यह स्थान चलाता था। न्यूयार्क में रहने वाले भारतीयों का यह एक तरह से मिलने का स्थान बन गया था। थोड़ी देर यहां बैठ जाओ ढेर सारे लोग मिल जाएंगे। भारतीयों की तरह पाकिस्तानी (Pakistan) भी यहां उतनी ही संख्या में आते हैं, जो दाढी टोपी नहीं रखते उन्हें पहचानना मुश्किल हो जाता है।
यहां से निकल कर रास्ते में एक जगह फूलों का गुलदस्ता खरीदा। जोएल की मां का जन्म दिवस कल था फिर भी जा रहे थे तो यह सामान्य औपचारिकता थी। जोएल की मां 90 साल की रही होंगी। वो एक डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर बैठी बैठी कुछ कार्ड स्क्रेच कर रही थी। राजा ने उन्हें फूलों का गुलदस्ता दिया और जन्म दिन की बधाई दे उनके गालों को चूमा। मेरा परिचय कराया तो मैं उधेड़बुन में पड़ गया कि मुझे क्या करना होगा ? क्या मुझे भी राजा की तरह चूमना होगा। मुझे कुछ करने की जरूरत ही नहीं पड़ी, ज्यूं ही मैंने हाथ मिलाकर उन्हें बधाई दी, उन्होंने मुझे खींच कर अपना गाल मेरे गाल से अड़ा दिया।
जोएल कहीं नजर नहीं आ रही थी। उसकी मम्मी ने मुझे पूछ लिया कि दवा की गोलियां लाए हो क्या। मैं हतप्रभ रह गया कि इन बूढी माताजी को भी पता है कि इस तरह की दवाईयां मुझसे मंगाई गई है। मैंने हां कह दिया तो राजा ने हंस हंस कर बताया कि किस तरह 100 गोलियां आते आते 70 रह गई। माताजी भी हंसने लगी। और कहने लगी कि डगलस को बताया कि नहीं कि उसकी दवाएं आ गई है।
डगलस उनका पुत्र और जोएल का भाई था। दवाएं उसके लिये थी। इन लोगों के इतनी सहजता से गोलियों की बातें करने से लगा कि इनके लिये यह बहुत सामान्य सी बात है। इससे मेरा भी अपराध बोध जाता रहा।

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