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न्यूयार्क - 2 | आव्रजन की घाटी पार हुई तो कस्टम की तलवार लटक गई
By EditorialPublished on
यह अहसास होते ही कि अगर मुझे अनुमति नहीं मिली तो मैं क्या करूंगा ? एयरपोर्ट से तो बाहर निकलने नहीं देंगे। वापस भारत (India) लौटने का टिकिट (Ticket) कैसे और कब का मिले यह भी निश्चित नहीं था। मेरे पास भगवान से प्रार्थना करने के अलावा कोई चारा नहीं था कि वो मुझे इस संकट से उबारे ।

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यह अहसास होते ही कि अगर मुझे अनुमति नहीं मिली तो मैं क्या करूंगा ? एयरपोर्ट से तो बाहर निकलने नहीं देंगे। वापस भारत (India) लौटने का टिकिट (Ticket) कैसे और कब का मिले यह भी निश्चित नहीं था। मेरे पास भगवान से प्रार्थना करने के अलावा कोई चारा नहीं था कि वो मुझे इस संकट से उबारे । यदि मेरे लेखन के लिये ही मुझे प्रताड़ित किया जा रहा है तो अमेरिका जैसे उन्मुक्त देश के लिये यह शर्मनाक था। पाकिस्तान जैसा कोई देश हो तो समझ में भी आये। 2001 में जब मैं पाकिस्तान गया था तब यह विचार मेरे मन में सर्वोपरि था कि कहीं मुझे अपने लेखन के लिये दंडित न कर दिया जाय। पाकिस्तान (Pakistan) के लिये सदैव मैं क्या सभी लोग बहुत खारा लिखते थे। आजकल जरूर एक वर्ग एसा बन गया है जो पाकिस्तान का पक्ष रखने में देशद्रोह जैसे आरोपों तक की परवाह नहीं करता। हद तो तब हो जाती है जब हाफीज सईद जैसे दुर्दान्त आतंकवादी इन्हें सर्टिफिकेट देते हैं।
अधिकारी को गये ज्यादा समय नहीं हुआ था मगर मुझे एसा लग रहा था जैसे एक युग बीत गया हो। मैं टकटकी लगा कर उधर ही देख रहा था जिधर वह गया था और कल्पना कर रहा था कि वह लौट रहा है और उसके पीछे पीछे दो चार पुलिस कर्मी भी चल रहे हैं। एसा कुछ हुआ नहीं। उसे अकेले ही लौटते देख जान में जान आई। आते ही उसने मुझे कहा कि आप का आर वीजा है जो मीडिया (Media) वालों को दिया जाता है। यह बिजनेस वीजा (Business visa) की श्रेणी में आता है इसलिये इस वीजा पर आपको अमेरिका (America) में घूमने की इजाजत नहीं दी जा सकती।
उसकी यह बात सुन मैं आश्चर्य चकित रह गया। जो वीजा मुझे एक पत्रकार (Journalist) होने के कारण विशिष्ठ श्रेणी का मिला था वही मेरी यात्रा में बाधक बन रहा था। इस बात से मेरी यह आशंका तो दूर हो गई कि मुझे अपने लेखन के कारण रोका जा रहा है, एसी कोई बात नहीं थी। महज एक मामूली तकनीकी आधार पर मुझे रोका जा रहा था। मैंने उसे समझाया कि मैं अखबार का मालिक हूं, और यहां जो देखूं, महसूस करूं उसका विवरण अखबार में लिखूं तो यह बिजनेस कैसे हो गया। न तो मुझे पैसे मिलेंगे न ही भारत-अमेरिका के बीच किसी प्रकार के लेन देन का आदान प्रदान होगा।
वह मेरी बात को समझने को ही तैयार नहीं था। बात बात में वह सुपरवाइजर का नाम लेकर कह रहा था कि आपको प्रवेश की अनुमति नहीं मिल सकती। वो जब अपनी बात पर अड़ा रहा तो मैंने कहा कि अगर मैं यहां से रिपोर्टिंग करूं तो नीले परबत बरफानी झीलें
क्या मुझे अनुमति मिलेगी क्यूंकि आप कह रहे हैं कि मेरा वीजा रिपोर्टिंग का है। इस बात का सीधा जवाब नहीं देते हुए वह अपनी पहले वाली बात पर आ गया कि मैंने आपको बार बार पूछा कि आप बिजनेस (Business) के लिये आये हैं क्या तब तो आप हर बार कह रहे थे कि घूमने के लिये आये हैं, अब आप कहने लगे कि बिजनेस के लिये आये हो, एसा थोड़े ही होता है। उसे समझाना निरर्थक था कि दोनों बातों में कोई अन्तर नहीं। उसने मेरी बात पकड़ ली थी और अड़ा अड़ी पर उतर आया था।
अब तक मेरा सारा डर काफूर हो चुका था और विश्वास हो गया था कि ये मुझे एसे मामूली कारणों से नहीं रोक सकते। मुझे इस बात का एहसास ही नहीं था कि मेरा वीजा एसी प्राथमिक श्रेणी का है। पता होता तो सीधा उसी की लाईन में लगता और कब का बाहर निकल चुका होता। अब मुझे याद आ रहा था कि वीजा के लिये जब मैंने इन्टरव्यू दिया था अधिकारी ने पूछा था कि आप क्या करते हो, मैंने जब बताया तो वह बहुत प्रसन्न हो गया और मेरी प्रशंसा करते हुए कुछ कहा भी था। उसने क्या कहा था मेरी कुछ समझ में नहीं आया था, ये लोग इतनी जल्दी जल्दी बोलते हैं कि आधी बात तो पल्ले ही नहीं पड़ती। शायद तब उसने मुझे आर वीजा प्रदान किये जाने की बात बताई हो।
इस जानकारी के बाद अब मैंने थोड़ा आक्रामक रूख अपनाने की सोची, डर यह भी था कि मामला उल्टा नहीं पड़ जाये मगर मेरे पास खोने को कुछ था नहीं इसलिये अंतिम हथियार अपनाते हुए मैंने थोड़े आवेश में कहा कि विशिष्ट वीजा होने के बावजूद आप मुझे मामूली तकनीकी कारणों से रोक रहे हो, मैं आपके सुपरवाइजर से मिलना चाहता हूं और यह बात समझाना चाहता हूं जो आप समझने को तैयार ही नहीं। मेरे इस रूख से वह एकदम नरम पड़ गया और बोला सुपरवाइजर (Supervisor) से मिलने की जरूरत नहीं, मैं आपको अनुमति दे रहा हूं मगर आगे से ध्यान रखना कि इस वीजा पर आप घूमने फिरने अमेरिका नहीं आ सकते। उसकी बात पर मुझे गुस्सा तो बहुत आया मगर खुद पर नियंत्रण किया। अब जब यह प्रवेश की अनुमति दे ही रहा है तो थोड़ा बर्दाश्त कर लो। आखिरकार उसने छाप उठाई और फचाक फचाक की आवाज करते मेरे पासपोर्ट (Passport) पर लगा दी। इस फचाक फचाक की आवाज सुनने के लिये मेरे कान कितने तरस गये थे और इसके अभाव में क्या क्या कल्पनाएं मैंने कर ली थी। मैंने भगवान को लाख लाख धन्यवाद दिया कि उन्होंने मुझे इस संकट से उबारा। अपना पासपोर्ट ले मैं आव्रजन से बाहर निकला।
एक घाटी तो पार हो गई, अभी एक घाटी और बाकी थी कस्टम की । अमेरिका में बाहर से खाने पीने का सामान लाने की अनुमति नहीं है मगर मैं अपने साथ ढेर सारा एसा सामान लाया था। मैं एकदम देशी-ठेठ मेवाड़ी खाना ही खा सकता हूं अन्य तरह का कोई नहीं। उदयपुर (Udaipur) में रहते हुए भी इडली, डोसा, उपमा, वडा - सांभर जैसे खाद्य मुझे नहीं भाते। अमेरिका का खाना तो बिल्कुल ही अलग था इसलिये मैं मठरी - नमकीन आदि कई तरह के खाद्य भारी मात्रा में अपने साथ लेकर आया था। खाद्य पदार्थों के साथ अक्सर जीवाणु देश में प्रवेश कर जाते हैं जो अपने साथ तरह तरह की बीमारीयां ले आते हैं। इस समय अमेरिका में जीका जीवाणु के प्रति बहुत सतर्कता बरती जा रही थी। यह खासकर मध्य अमेरिका और दक्षिण अमेरिका के देशों से आने वाले नागरिकों के लिये भारी परेशानी का सबब बना हुआ था। इससे पूर्व इबोला जीवाणु भी इसी तरह अमेरिका में प्रवेश कर गया था। भारत में भी जलकुम्भी और गाजर घास जैसी खतरनाक वनस्पतियों की उत्पत्ति विदेशों से आने वाले लोगों के प्रति बरती गई लापरवाही का ही परिणाम थी। मेरे साथ पूरा नाश्ता सूखा था जिससे किसी भी तरह के जैविक संक्रमण (Biological infection) की संभावना नहीं थी मगर कस्टम अधिकारी मानते कहां है। एक बार अटैची खुली नहीं कि उसके अन्दर मिला सारा खाने पीने का सामान फिंकवाकर ही छोड़ते हैं। कस्टम से पहले मुझे अपना सामान एकत्र करना था। बहुत देर हो चुकी थी इसलिये मुझे लग रहा था कि मेरा ही सामान बेल्ट पर घूम रहा होगा। यह ख्याल आते ही तेज कदमों से मेरी उड़ान के निर्धारित बेल्ट की तरफ बढा। बेल्ट रूका हुआ था और उस पर एक भी सामान नहीं था। मुझे ठसका लगा, पास जाकर देखा तो ढेर सारा सामान किसी ने बेल्ट से उतार कर करीने से बाहर रख दिया था।
मेरे दो बड़े बड़े सूटकेस थे जिनका वजन थोड़ा ज्यादा था। इन्हें ढोने के लिये ट्रोली लेने आगे बढा तो देखा कि सारी ट्रोलियां एक दूसरे से बंधी है, मैंने एक ट्रोली निकालने की कोशिश भी की तो नहीं निकली। मुझे एयरपोर्ट से लेने एक टेक्सी भी आने वाली थी। इसका कोई अता-पता, नाम नम्बर मेरे पास नहीं था, शायद बाहर कोई मेरे नाम की तख्ती लेकर खड़ा हो यही सोच कर मैं सामान की तरफ जाने लगा तो दूर से एक अश्वेत आदमी वेट! वेट! की आवाज देते हुए आया। मैं रूक गया। वह आदमी ट्रोलियों के पास आकर खड़ा हो गया और पूछने लगा - क्या आपको ट्रोली चाहिये। अन्धे को क्या चाहिये ? दो आंखें । मैंने खुश होकर कहा हां और ट्रोली लेने आगे बढने लगा तभी उसने जो कुछ कहा उसे सुन मैं भौंचक्का रह गया। एक ट्रोली के उसने 6 डालर मांग लिये। यह बहुत ज्यादा था,
एक डोलर तक तो कई हवाई अड्डों पर दिये थे वह भी ट्रोली वापस लाकर देने पर लौटा दिये जाते थे मगर 6 डालर कभी भी कहीं भी नहीं सुना था। हमारे यहां तो एक पैसा भी नहीं लगता। ट्रोली तो लेनी ही थी। मैंने 6 डालर निकाल कर दिये और पूछा कि ट्रोली वापस लाकर देने पर लौटा दोगे तो उसने साफ मना कर दिया। उसने एक बटन दबाया जिससे एक ट्रोली चेन से निकल कर आगे बढ गई। मैंने ट्रोली ली और सामान की तरफ अग्रसर हुआ।

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