आधुनिकता के दौर में गांधीवादी विचार (Gandhian thought) की प्रासंगिकता और भी ज्यादा बढ़ गई है। यही कारण है कि आज देश (Country) के हर नागरिक को महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) की विचारधारा को आत्मसात (Imbibed) करने की जरूरत है। यह कहना है जाने माने गांधीवादी (Gandhian) विचारक प्रो. सतीश राय का ।


Imbibe the ideology of Mahatma Gandhi
जयपुर : आधुनिकता के दौर में गांधीवादी विचार (Gandhian thought) की प्रासंगिकता और भी ज्यादा बढ़ गई है। यही कारण है कि आज देश (Country) के हर नागरिक को महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) की विचारधारा को आत्मसात (Imbibed) करने की जरूरत है। यह कहना है जाने माने गांधीवादी (Gandhian) विचारक प्रो. सतीश राय का ।
मंगलवार को जयपुर (Jaipur) जिला परिषद के सभागार में दो दिवसीय जिला स्तरीय गांधी दर्शन प्रशिक्षण शिविर (Training camp) का आगाज हुआ। शिविर को बतौर मुख्य वक्ता संबोधित करते हुए सतीश राय ने कहा कि गांधी (Gandhi) का व्यक्तित्व एवं चरित्र अनुकरणीय है, हमारे आचार, विचार एवं व्यवहार में गांधीवादी विचार प्रतिबिंबित होना ही हमारे जीवन की सार्थकता है। आज देश के नागरिकों को जात-पात के भेद को मिटाकर भारत जोड़ने का संकल्प लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी ने राष्ट्रीय
(National)
चेतना की आवाज पर देश को एक करने का काम किया।
शांति एवं अहिंसा विभाग द्वारा आयोजित शिविर में जयपुर जिले के सैकड़ों कार्यकर्ता हिस्सा ले रहे हैं। शिविर के पहले दिन गांधीवादी विचारक (Gandhian thinker) धर्मवीर कटेवा, सवाई सिंह, हिमांशु ने अपना उद्बोधन दिया। बुधवार को शिविर के दूसरे दिन भी गांधीवादी विचारकों के सम्बोधन होंगे।
वहीं, शिविर को संबोधित करते हुए जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) जसमीत संधू ने कहा कि शिविर का मकसद गांधीवादी विचार को जन-जन तक पहुंचाना है। शिविर में हिस्सा लेने वाले सभी कार्यकर्ता ना केवल गांव-गांव, ढाणी-ढाणी तक राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के विचारों का प्रचार करेंगे, बल्कि सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं (Public welfare schemes) का भी प्रचार कर समाज के अंतिम तबके तक हर जरूरतमंद तक योजनाओं का लाभ पहुंचाने में अपनी अहम भूमिका निभाएंगे। उद्घाटन सत्र में जिला परिषद की अतिरिक्त मुख्य कार्यकारी अधिकारी सुमन देवी सहित अन्य अधिकारी एवं कर्मचारी मौजूद रहे। वहीं, रुपेन्द्र सिंह चांपावत कार्यक्रम का संचालन किया।
Editorial

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