Close contest again in Karnataka
एस. श्रीनिवासन
सबसे कड़े मुकाबलों में से एक होने जा रहे कर्नाटक (Karnataka) विधानसभा चुनावों (Assembly elections) को लेकर पिछले हफ्ते गतिविधियां काफी तेज रहीं। एक तरफ भाजपा अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए कई तरह के कदम उठा रही है, तो वहीं उसकी मुख्य प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस (Congress) भी अपने पत्ते अच्छी तरह खेल रही है । इस बार कांग्रेस के जीतने की संभावनाएं काफी ज्यादा हैं, जब तक कि पंजाब की तरह वह अपना खेल खराब न कर ले। शनिवार को पार्टी ने 124 विधानसभा सीटों के लिए अपने उम्मीदवारों की पहली सूची जारी की, जिसमें सिद्धारमैया, डीके शिवकुमार और जी परमेश्वर जैसे कद्दावर नेताओं के भी नाम थे
अभी तक कांग्रेस के स्थानीय नेता आपसी एकता दिखाने की हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं, पर जैसे-जैसे चुनाव आगे बढ़ेगा, दरारें सामने आ सकती हैं और पार्टी को आत्मघाती गोल से बचने के लिए जूझना पड़ सकता है। लोकसभा सदस्यता (Lok Sabha membership) गंवाने वाले राहुल गांधी (Rahul Gandhi) के खिलाफ भाजपा के आक्रामक रूख से कांग्रेस (Congress) के चुनावी अभियान को धार मिल सकती है। वहीं, कर्नाटक की जीत 2024 के आम चुनावों में पार्टी के रूख को भी तय करेगी।
भाजपा (BJP) भी बहादुरी से मोर्चा संभाले हुए है, पर उसे कर्नाटक में गंभीर सत्ता-विरोधी लहर का सामना करना पड़ सकता है। मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई (CM Basavaraj Bommai)
बहुत ज्यादा असर छोड़ने में सफल नहीं हो सके हैं। वह पार्टी नेताओं के खिलाफ लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोपों से पीछा नहीं छुड़ा सके । इस दुविधा से पार पाने के लिए पार्टी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करिश्मे पर भरोसा कर रही है। वोटों के धार्मिक ध्रुवीकरण और लिंगायत समुदाय के समर्थन की भी उसे उम्मीद है। इसके साथ, वोक्कालिगा जाति में सेंध लगाने की कोशिश भी हो रही है। पिछड़े वर्गों की छोटी-छोटी उप-जातियों को अपने पाले में करने के लिए भाजपा राज्य के सामाजिक ताने- बाने को नए सिरे से गढ़ने के प्रयास में है। इसके लिए वह इन उप-जातियों की स्थानीय पहचान को उभारने के लिए मूर्तियां स्थापित कर रही है और भूली- बिसरी लोककथाओं
(Folktales)
व कहानियों के जरिये उनकी यादों को फिर से ताजा कर रही है।
ऐसा ही एक प्रयास पार्टी द्वारा उरी गौड़ा और नन्जे गौड़ा को सच्चे स्वतंत्रता सेनानियों के रूप में पेश करके किया गया, जिन्होंने न केवल अंग्रेजों से मुकाबला किया था, बल्कि टीपू सुल्तान को भी खदेड़ दिया था। स्थानीय राजाओं व सरदारों की स्मृतियों में भाजपा ने करीब दो दर्जन मूर्तियों को भी स्थापित किया है, जो राज्य में विभिन्न बड़े व छोटे समुदायों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
जैसे, आधुनिक बेंगलुरू (Bangalore) का निर्माण करने वाले केम्पे गौड़ा की, बेंगलुरू के कन्नड़ साहित्य परिषद् (Kannada literature council) में देवी भुवनेश्वरी की, करकला में भगवान परशुराम की, बेंगलुरू में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी
(PM Atal Bihari Vajpayee)
की, मंगलुरू में स्वतंत्रता सेनानी केदंबदी रमैया गौड़ा की, बेलगावी में शिवाजी की, बेंगलुरू में सिने स्टार राजकुमार की, शिवमोग्गा में प्रगतिशील कन्नड़ कवयित्री अक्का महादेवी की और चामराजनगर में माले महादेश्वर की प्रतिमा स्थापित की गई है।
मुख्यमंत्री बोम्मई मध्यम व निचली जातियों के लिए अतिरिक्त आरक्षण में भी जुटे हैं। मंत्रिमंडल (Cabinet) ने शुक्रवार को ओबीसी या अन्य पिछड़ा वर्ग श्रेणी के 2बी के तहत मुसलमानों को मिलने वाले 4 फीसदी आरक्षण को खत्म कर दिया। इसे अब यहां की दो प्रमुख जातियों- वीरशैव-लिंगायत और वोक्कालिगा में दो-दो प्रतिशत आरक्षण के रूप में बांट दिया गया है। उनको इसका लाभ नौकरियों और शिक्षण संस्थानों
(Jobs and educational institutions)
में मिलेगा । विपन्न मुसलमानों को अब आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के 10 प्रतिशत आरक्षण में अपना हक लेना होगा। यह हाशिये पर पड़े मुसलमान समुदाय को और अलग-थलग कर देगा। मुसलमानों के लिए आरक्षण की व्यवस्था एच डी देवेगौड़ा ने की थी, जब वह राज्य के मुख्यमंत्री थे ।
वह मानते थे कि यह समुदाय समय के साथ कदम नहीं मिला पा रहा । इस बीच, लिंगायत के भीतर पंचमसालिस नामक उप-संप्रदाय, जो वीरशैव लिंगायत में सबसे बड़ा वोट बैंक है और जिसका समर्थन भाजपा के लिए अहम माना जाता है, अपने लिए 2ए दर्जा की मांग करने लगा है। कैबिनेट ने फिलहाल कैटगरी 1 या 2ए को छेड़ने से परहेज किया है।
नए फैसले में ओबीसी (OBC) समुदायों को 32 प्रतिशत, अनुसूचित जाति को 17 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति को 7 प्रतिशत, यानी कुल 56 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था की गई है।
इसके अलावा, 10 प्रतिशत आरक्षण (Reservation) आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए रखा गया है। जो लोग अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के तहत आरक्षण के हकदार नहीं होंगे, वे ईडब्ल्यूएस (EWS) कोटे के तहत आवेदन कर सकेंगे। बोम्मई ने कहा है कि आर्थिक रूप से पिछड़े मुसलमान भी ईडब्ल्यूएस आरक्षण का लाभ उठा सकते हैं।
राज्य मंत्रिमंडल (State cabinet) ने अनुसूचित जातियों के भीतर भी आरक्षण देने का फैसला किया है। दिलचस्प है कि कर्नाटक में अनुसूचित जातियों में भी वर्गीकरण है। जिनकी स्थिति थोड़ी बेहतर है, उनको 'एससी राइट', और जिनकी कुछ कमजोर है, उनको 'एससी लेफ्ट' कहा जाता है।
नए आरक्षण फॉर्मूले के मुताबिक, 'एससी लेफ्ट' को 6 प्रतिशत, 'एससी राइट' को 5.5 प्रतिशत, 'एससी टचेबल' को 4.5 प्रतिशत और अन्य अनुसूचित जातियों को 1 प्रतिशत आरक्षण का लाभ दिया जाएगा। सरकार पहले ही अनुसूचित जाति के कोटे को 15 फीसदी से बढ़ाकर 17 फीसदी और अनुसूचित जनजाति के कोटे को 3 फीसदी से बढ़ाकर 7 फीसदी कर चुकी है। संविधान की 9वीं अनुसूची में इसे शामिल करने के लिए केंद्र के पास भेज भी दिया गया है।
इस बीच, बेंगलुरू के ऑटो रिक्शा इस वायदे से पटे पड़े हैं कि कांग्रेस के जीतने पर कुछ खास आबादी को 200 यूनिट बिजली और 10 किलो चावल मुफ्त मिलेंगे।
पड़ोसी राज्य तमिलनाडु (Tamil Nadu) से प्रेरित होकर भाजपा और कांग्रेस महिला मतदाताओं को लुभाने के लिए साड़ी और चांदी के बर्तन जैसे उपहार भी बांटने लगी हैं।
मगर सवाल है कि आखिरी वक्त का जातिगत आरक्षण और मूर्तियों की राजनीति (Politics) क्या भाजपा का फायदा पहुंचाएगी? निःसंदेह, चुनाव जीतने के लिए भाजपा तमाम उपाय आजमाएगी। ऐसे में, कांग्रेस के लिए चुनौती का सामना करने के अलावा कोई विकल्प नहीं। उसके लिए यह 'करो या मरो' की लड़ाई है।
Editorial

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