✕
संपादकीय
By EditorialPublished on
अमेरिका (America) के वॉशिंगटन (Washington) में शनिवार को खालिस्तान (Khalistan) समर्थकों के एक विरोध प्रदर्शन को कवर कर रहे भारतीय पत्रकार पर हुआ हमला बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। मिली जानकारी के मुताबिक, उनके साथ खालिस्तान समर्थकों ने गाली-गलौज भी की। वैसे अच्छी बात यह रही कि उनकी शिकायत पर सुरक्षाकर्मियों ने तत्काल कार्रवाई करते हुए उन्हें आवश्यक सुरक्षा मुहैया कराई।
_202303281919429785.jpg)
x
_202303281919429785.jpg)
अमेरिका (America) के वॉशिंगटन (Washington) में शनिवार को खालिस्तान (Khalistan) समर्थकों के एक विरोध प्रदर्शन को कवर कर रहे भारतीय पत्रकार पर हुआ हमला बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। मिली जानकारी के मुताबिक, उनके साथ खालिस्तान समर्थकों ने गाली-गलौज भी की। वैसे अच्छी बात यह रही कि उनकी शिकायत पर सुरक्षाकर्मियों ने तत्काल कार्रवाई करते हुए उन्हें आवश्यक सुरक्षा मुहैया कराई। लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि कुछ समय से विदेश में खालिस्तान समर्थकों की सक्रियता बढ़ी है। खासकर, पंजाब में अमृतपाल सिंह (Amritpal Singh) के खिलाफ शुरू हुई पुलिस कार्रवाई के बाद उसका भागे-भागे फिरना उसकी उस छवि के एकदम विपरीत है, जो खालिस्तान के पक्ष में माहौल बनाने की साजिश में शामिल शक्तियां रचने में लगी हुई थीं। खुद अमृतपाल भी ऐसे दावे करता था कि अगर पुलिस ने उसे हाथ भी लगाया तो पंजाब में हिंसा की लहर फैल जाएगी । यह सब उस व्यापक और झूठे दुष्प्रचार का हिस्सा था, जो खालिस्तान समर्थक शक्तियां देश-विदेश में लगातार चलाती रही हैं। अमृतपाल की हकीकत इस बात का जीता-जागता सबूत है कि यह दुष्प्रचार कितनी बेबुनियाद बातों पर आधारित रहा है। मगर इसी दुष्प्रचार का परिणाम है कि प्रवासी भारतीयों का एक छोटा सा हिस्सा इसके प्रभाव में आ गया है। इसी के सहयोग से विदेश में विरोध- प्रदर्शनों और सांकेतिक जनमत संग्रहों आदि के जरिए ऐसा माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है मानो खालिस्तान समर्थक ताकतें बहुत मजबूत हो गई हों । इन कोशिशों को गंभीरता से लेते हुए भी हमें इनकी असलियत को लेकर किसी तरह का भ्रम नहीं पालना चाहिए । हकीकत यह है कि खालिस्तान समर्थक तत्व आज की तारीख में इंटरनेट के सहारे माहौल बनाने की थोड़ी- बहुत कोशिश भले करें, जमीन पर ठोस कुछ हासिल करने की स्थिति में नहीं हैं। इनकी ताकत का जो सबसे बड़ा स्रोत माना जाता है, उस पाकिस्तान (Pakistan) की हालत खुद खस्ता हो चुकी है। इसके बावजूद पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी की ओर से अमृतपाल को मदद देने की बातें सामने आई हैं। जहां तक भारत में, खासकर पंजाब के अंदर की बात है तो वहां भी बड़ा वर्ग इन लोगों के खिलाफ है। पंजाब के लोग अलगाववाद को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। अलगाववादी नेता सिमरनजीत सिंह मान ने एक सीट भले निकाल ली हो, याद रखना चाहिए कि हालिया विधानसभा चुनावों (Assembly elections) मे उनकी पार्टी को बमुश्किल 2.5 फीसदी वोट मिले। पिछले विधानसभा चुनावों में तो अलगाववादियों से ज्यादा वोट नोटा बटन के हिस्से में आए थे। मगर इन सबका मतलब कहीं से भी यह नहीं है कि विदेश में खालिस्तान के नाम पर हो रहे इन तमाशों को अनदेखा करना चाहिए । जरूरी है कि भारत सरकार इसे गंभीरता से लेते हुए सुनिश्चित करे कि संबंधित सरकारें भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंड़ता से जुड़े इस मसले को हलके में न लें।

Editorial
Next Story
Related News
X
