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निर्णायक मोड़ पर कांग्रेस
By EditorialPublished on
आगामी लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Elections) में भले ही अभी करीब साल भर का समय बाकी है, लेकिन देश का राजनीतिक तापमान (Political temperature) बहुत तेजी से बढ़ने लगा है। कांग्रेस (Congress) के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी (Rahul Gandhi) को सूरत की अदालत से मानहानि के एक आपराधिक मामले में दो वर्ष की सजा सुनाए जाने के बाद संसद की सदस्यता के अयोग्य ठहरा दिया गया है, जिससे कांग्रेस की राजनीति अभी एक निर्णायक मोड़ पर आ गई है। अभी तक गैर-भाजपा (BJP) दल कांग्रेस को विपक्ष का नेतृत्व सौंपने में आनाकानी कर रहे थे। लेकिन 23 म
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रशीद किदवई
आगामी लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Elections) में भले ही अभी करीब साल भर का समय बाकी है, लेकिन देश का राजनीतिक तापमान (Political temperature) बहुत तेजी से बढ़ने लगा है। कांग्रेस (Congress) के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी (Rahul Gandhi) को सूरत की अदालत से मानहानि के एक आपराधिक मामले में दो वर्ष की सजा सुनाए जाने के बाद संसद की सदस्यता के अयोग्य ठहरा दिया गया है, जिससे कांग्रेस की राजनीति अभी एक निर्णायक मोड़ पर आ गई है। अभी तक गैर-भाजपा (BJP) दल कांग्रेस को विपक्ष का नेतृत्व सौंपने में आनाकानी कर रहे थे। लेकिन 23 मार्च की घटना के बाद कांग्रेस को गैर-भाजपा विपक्षी दलों का व्यापक समर्थन मिला है।
कह सकते हैं कि यह कांग्रेस के लिए एक सुनहरा अवसर है, लेकिन क्या कांग्रेस इस स्थिति का राजनीतिक (Political) लाभ उठाने में सक्षम है? क्या वह सभी गैर-भाजपा दलों को साथ लेकर भाजपा को टक्कर दे पाएगी? इसमें एक बड़ी अड़चन खुद राहुल गांधी (Rahul Gandhi) का व्यक्तित्व है। इस घटना के बाद बाकी विपक्षी नेताओं की तुलना में उनका राजनीतिक कद बहुत बढ़ गया है, लेकिन इस कद के साथ उन्हें न्याय करना होगा और यहीं पर कई अड़चनें दिखाई देती हैं।
उन्हें ममता बनर्जी (Mamata Banerjee), अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) के चंद्रशेखर राव, नीतीश कुमार जैसे विपक्षी नेताओं के साथ तालमेल बनाकर चलना होगा, जो बड़ा कठिन काम है। जबसे राहुल राजनीति में सक्रिय हैं, उन्होंने सहयोगी दलों के नेताओं के साथ एक तरह से दूरी बनाकर रखी। एमके स्टालिन को छोड़ दें, तो बाकी सहयोगी दलों के नेताओं के साथ कभी राहुल ने गर्मजोशी नहीं दिखाई। बल्कि कई बार उन्होंने अपने बयानों से अन्य सहयोगी दलों के नेताओं के लिए मुश्किल ही खड़ी कर दी, जैसे सावरकर (Savarkar) को लेकर दिए गए बयान के जरिये उन्होंने उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) वाली शिवसेना (Shivsena) को कठिनाइयों में ही डाल दिया। मगर अच्छी बात यह है कि कांग्रेस (Congress) अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे अनुभवी और सुलझे हुए नेता हैं, जिनके तमाम गैर-भाजपा, गैर- राजग दलों से बहुत अच्छे संबंध हैं। लेकिन सवाल है कि जिस तरह महाभारत (Mahabharata) में अर्जुन के सारथी बने थे श्रीकृष्ण, क्या खरगे वह भूमिका निभा पाएंगे।
राहुल गांधी (Rahul Gandhi) के साथ जो हुआ है, उसके दो पहलू हैं। एक तो अदालती पहलू है और दूसरा राजनीतिक पहलू है। हमें ध्यान रखना होगा कि जब भी किसी व्यवस्था के खिलाफ विपक्ष लड़ता है, तो वह लड़ाई लंबी होती है। उस लड़ाई को सतत जारी रखने के लिए सिविल सोसाइटी का सहयोग बहुत जरूरी होता है। ऐसा जेपी आंदोलन में भी हुआ था, राजीव गांधी (Rajiv Gandhi) के खिलाफ वीपी सिंह के अभियान में भी हुआ था, और हा ही में अन्ना आंदोलन के दौरान भी हमने सिविल सोसाइटी की सक्रिय भूमिका देखी थी । यहीं पर कांग्रेस (Congress) की जमीन कमजोर मालूम पड़ती है। अतीत में भी ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता कि कांग्रेस ने सिविल सोसाइटी का राजनीतिक फायदा उठाया हो। राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के समय जरूर सौ-डेढ़ सौ के करीब सिविल सोसाइटी उनके साथ जुड़ी थी, पर उनमें से अधिकांश गैर-राजनीतिक सिविल सोसाइटी थीं। अब कांग्रेस या राहुल गांधी उन सबको अपने साथ जोड़ पाएंगे, इसे लेकर संशय है।
तीसरी बात, भाजपा (BJP) के खिलाफ विपक्षी दलों को एकजुट करने के लिए कांग्रेस को उदार हृदय से एक कॉर्डिनेशन कमेटी (Coordination committee) बनानी चाहिए, जिसमें शरद पवार, फारूक अब्दुल्ला, चंद्रबाबू नायडू जैसे लोगों को शामिल करना चाहिए, जिनकी राजनीतिक साख दलों से ऊपर है। ममता बनर्जी अरविंद केजरीवाल, के चंद्रशेखर राव जैसे नेताओं को इसमें सक्रिय भूमिका में लाना चाहिए। बेशक थोड़े-बहुत वैचारिक या मुद्दे आधार मतभेद हो सकते हैं, लेकिन इन सबको एकजुट करके पटरी पर लाना बहुत कठिन, मगर महत्वपूर्ण होगा। इसके अलावा, सोशल मीडिया (Social Media) के जमाने में एक और चीज महत्वपूर्ण है- समय, क्योंकि लोगों की याददाश्त बहुत छोटी होती है। जैसे अभी बहुत से लोगों (जो घोषित रूप से कांग्रेस या भाजपा के समर्थक नहीं हैं) को लगता है कि राहुल गांधी भले ही उतने परिपक्व नेता न हों, लेकिन आपराधिक मानहानि के मामले में जिस तरह उनकी संसद सदस्यता खत्म की गई, वह अनुचित थी। लोगों को लगता है कि यह राजनीति से प्रेरित है, क्योंकि सत्तारूढ़ भाजपा सहित विभिन्न दलों में बहुत से ऐसे नेता हैं, जिन्होंने अनाप-शनाप टिप्पणियां की हैं, लेकिन उन्हें कोई सजा नहीं मिली ।
ऐसा सोचने वाले करोड़ों लोग हैं, जो किसी पार्टी के समर्थक नहीं होते हैं, लेकिन चीजों को देखते-समझते और उनका संज्ञान लेते हुए वोट डालते हैं। तो ऐसे वर्ग का लाभ उठाने के लिए कांग्रेस (Congress) और बाकी विपक्ष को तेजी से और चरणबद्ध तरीके से अपना अभियान चलाना होगा, लेकिन इस घटना को चार दिन बीत गए हैं, लेकिन उस तरह का एहसास नहीं हो रहा है। राजीव गांधी के समय जिस तरह विपक्ष ने एकजुट होकर संसद से इस्तीफा दे दिया था, वैसी पहल हमें अभी नजर नहीं आ रही है। बाकी विपक्ष को तो छोड़िए, कांग्रेस के भीतर भी उतना आक्रोश नहीं दिखता। यदि किसी रणनीति (Strategy) के तहत कानूनी सरगर्मी नहीं हो रही है, तो राजनीतिक सरगर्मी तो दिखनी चाहिए, अन्यथा यह मामला दबकर रह जाएगा ।
राहुल गांधी व्यक्तिगत स्तर पर सरकार पर हमलावर हैं और उन्होंने प्रेस वार्ता में अदाणी के साथ भाजपा (BJP) के कथित संबंधों पर बोला। लेकिन उसमें भी जब तक हिंडनबर्ग रिपोर्ट की तरह कोई तथ्यात्मक और चौंकाने वाली बात सामने नहीं आएगी, तब तक लोगों की समझ में नहीं आएगा, क्योंकि आर्थिक मामले बहुत जटिल होते हैं, जो लोगों की समझ में जल्दी नहीं आते। इसके लिए कांग्रेस और बाकी विपक्ष को होमवर्क (Home work) करना पड़ेगा ।
जब तक एकजुट विपक्ष का जनाधार नहीं बढ़ेगा, तब तक भाजपा को बढ़त मिलती रहेगी, इसलिए सिविल सोसाइटी (Civil society) और आम लोगों को साथ लेकर चलने की आवश्यकता है और इसमें मीडिया सहायक हो सकता है। गैर-राजग दलों, सिविल सोसाइटी और मीडिया सबको साथ लेकर चलने में सोनिया गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे कितना सफल हो पाते हैं, यह देखने वाली बात होगी। देखने वाली बात यह भी है कि खरगे को कितनी छूट मिलती है। विपक्ष को राहुल गांधी के नाम पर एक बड़ा मुद्दा मिल गया, जिसकी उसे तलाश थी और यह मुद्दा लोगों की समझ में आ रहा है। उसका फायदा उठाने के लिए कांग्रेस और विपक्ष को सही दिशा में निर्णायक फैसले लेने होंगे।

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