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क्या विपक्षी एकता में राहुल हैं अड़चन
By EditorialPublished on
पिछले दो आम चुनावों में एक बात समान रही है। दोनों बार भाजपा (BJP) ने अपने मनमाफिक पिच तैयार की। चुनावी जंग को मोदी (Modi) बनाम अन्य के रूप में बदला और इस युद्ध में विजेता बनकर उभरी। दोनों ही बार मोदी बनाम अन्य में प्र.म. नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) के खिलाफ विपक्ष का प्रमुख चेहरा राहुल गांधी (Rahul Gandhi) रहे और राहुल के बरक्स देश ने मोदी को कहीं ज्यादा परिपक्व और भरोसेमंद माना।

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उमेश चतुर्वेदी
पिछले दो आम चुनावों में एक बात समान रही है। दोनों बार भाजपा (BJP) ने अपने मनमाफिक पिच तैयार की। चुनावी जंग को मोदी (Modi) बनाम अन्य के रूप में बदला और इस युद्ध में विजेता बनकर उभरी। दोनों ही बार मोदी बनाम अन्य में प्र.म. नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) के खिलाफ विपक्ष का प्रमुख चेहरा राहुल गांधी (Rahul Gandhi) रहे और राहुल के बरक्स देश ने मोदी को कहीं ज्यादा परिपक्व और भरोसेमंद माना।
क्या चाहती है कांग्रेस
अब 2024 के आम चुनावों की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है। भाजपा एक बार फिर मोदी नाम राहुल की पिच पर ही बैटिंग करने की कोशिश में है, लेकिन विपक्षी दल भाजपा की इस कोशिश के गुब्बारे में पिन चुभाने की तैयारी में हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री (Chief Minister) अखिलेश यादव मिल चुके हैं। एक मुद्दे पर उनकी राय साफ है । ममता की पार्टी तो बयान दे चुकी है कि राहुल गांधी की अगुआई में मोदी को हराना मुश्किल है । चाहे तृणमूल (Trinamul) कांग्रेस (Congress) हो या समाजवादी (Socialist) पार्टी, दोनों ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं, लेकिन एक बात साफ है कि उन्हें राहुल गांधी (Rahul Gandhi) की लीडरशिप (Leadership) मंजूर नहीं है।
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि राहुल की यही छवि भाजपा को मुफीद लगती है। भाजपा के कुछ आलोचक यहां तक मानते हैं कि चूंकि राहुल की यह छवि भाजपा के लिए फायदेमंद है, इसीलिए भाजपा राहुल की अपरिपक्व नेता की छवि गढ़ने की कोशिश में जुटी रहती है। रही- सही कसर राहुल अपने अपने उलजलूल बयानों के जरिए पूरी कर देते हैं। मोदी पर कमान तानने की विपक्षी खींचतान के बीच कांग्रेस की एकमात्र कोशिश यह है कि राहुल की अगुआई में विपक्ष का मोर्चा बने। एक दौर तक कांग्रेस के खिलाफ विपक्षी दलों का संयुक्त मोर्चा बनता था । गैर-कांग्रेसवाद का मुहावरा राममनोहर लोहिया ने गढ़ा था। इस राजनीतिक मुहावरे की छतरी के नीचे वह समाजवादियों से लेकर राष्ट्रवादियों तक, सबको एकसाथ लाने में कामयाब रहे। इसका असर यह हुआ कि 1967 में पहली बार कांग्रेस के एकछत्र राज को चुनौती मिली। नौ राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारें बनीं। गैर- कांग्रेसवाद का ही असर रहा कि पहले 1977 और फिर 1989 में गैर कांग्रेसी सरकारें बनीं, लेकिन अब वही कांग्रेस हाशिये पर है। अब विपक्षी राजनीति के लिए गैर-कांग्रेसवाद के बजाय गैर- भाजपावाद का सिद्धांत सामने आ गया है। गैर-भाजपावाद के सिद्धांत की छतरी के नीचे कांग्रेस की कोशिश है कि राहुल गांधी की लीडरशिप (Leadership) में विपक्षी जुटान हो । गैर- कांग्रेसवाद के नाम पर अतीत में कांग्रेस विरोधी दल जितनी सहजता से जुटते रहे हैं, गैर-भाजपावाद के नाम पर कांग्रेसी अगुआई में विपक्षी दलों का वैसा जुटान होता नजर नहीं आ रहा । यह कांग्रेस के लिए दयनीय हालत ही कही जाएगी कि उसके सबसे प्रमुख चेहरे के नाम पर विपक्षी दल चुनाव लड़ने के लिए एक तक नहीं हो पा रहे। लगता है कि विपक्षी राजनीति मान चुकी है कि राहुल का चेहरा इतना चमकदार नहीं है कि वह मोदी (Modi) विरोधी वोटों को अपनी ओर खींच सके। जबकि कांग्रेस ने अपने युवराज को राजा बनाने के लिए अपने हरावल दस्ते के हर घोड़े को खोल दिया है। जिस तरह राष्ट्रवादी धारा के सोशल मीडिया (Media) सेनानी राहुल गांधी को नासमझ और अपरिपक्व बताने के लिए दिन-रात अपने बौद्धिक घोड़े जोते रहते हैं, कुछ वैसे ही राहुल समर्थक सोशल मीडिया (Social Media) सैनिक दिन रात राहुल को समझदार बनाने - बताने की कोशिश में जुटे हैं। कांग्रेस जी-जान लगाकर राहुल को विपक्ष का एकमात्र चेहरा साबित करने की कोशिश में है। वह हर मुमकिन मंच और मौके का इस्तेमाल कर रही है। लेकिन राहुल पर विपक्षी भरोसा जमता नजर नहीं आ रहा। जिस तरह राहुल की अगुआई में विपक्षी लामबंदी भाजपा को फायदेमंद नजर आती है, ठीक उसी तरह बिखरा विपक्षी कुनबा भी भाजपा की राह को आसान बनाता है। इसलिए कहा जा सकता है कि ममता बनर्जी और अखिलेश यादव का राहुल के बजाय अपने लिए अलग चेहरा ढूंढना भी भाजपा के लिए मुफीद होगा । संगठित विपक्ष भाजपा के लिए खतरनाक हो सकता है, लेकिन जैसे ही राहुल की अगुआई सामने आती है, भाजपा के लिए लड़ाई आसान होती नजर आती है इसलिए भाजपा भी चाहती है कि राहुल (Rahul) की अगुआई वाले विपक्षी खेमे से उसका मुकाबला हो । अब तक की राजनीतिक खींचतान से साफ है कि विपक्षी राजनीति के दो प्रमुख दल तृणमूल और समाजवादी पार्टी अपने ढंग से पारी खेलने की कोशिश करेंगे। अगर उन्होंने ज्यादा सीटें जीत ल और खुदा न खास्ता चुनावी नतीजे की गेंद विपक्षी पाले में चली जाए, तो ज्यादा सीटों की वजह से वे मोलतोल की हालत में होंगे।
कभी गरम तो कभी नरम
विपक्ष में एक और बड़ा चेहरा है शरद पवार का, लेकिन पवार की हालत अलग है। वह जानते हैं कि उस हालत में ही प्रधानमंत्री (Prime Minister) बन सकते हैं, जब विपक्षी खेमे में किसी नाम पर सहमति न हो और उनके पास इतनी सीटें हों कि विपक्षी खेमे की आपसी खींचतान को संतुलित कर सकें । इसलिए वह कभी नरम तो कभी गरम रूख अख्तियार करते नजर आते हैं। वहीं, विपक्षी खेमे का नेतृत्व करने को लेकर कांग्रेस अपनी पिच बनाने की कोशिश कर तो रही है, लेकिन हांफ भी रही है। दूसरी ओर भाजपा (BJP) भी अपने ढंग से अपनी पिच को चमकाकर विपक्षी गेंदबाजों को लाने की कोशिश में जुटी है ताकि चुनावी मैच में चौकों-छक्कों की बारिश कर सके । अगर ऐसा हुआ तो अगले आम चुनाव के नतीजे पिछले दो चुनावी नतीजों से शायद ही अलग हों।

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