संस्थाओं पर कब्जे का अनर्गल आरोप

अनंत विजय :
कांग्रेस पार्टी (Congress party) के पूर्व अध्यक्ष और सांसद (Member of parliament) राहुल गांधी (Rahul Gandhi) को जब भी अवसर मिलता है वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर हमलावर रहते हैं । कभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा को लेकर, कभी हिंदुत्व को लेकर, कभी वीर सावरकर (Veer Savarkar) को लेकर तो कभी सांप्रदायिकता को लेकर। भारतीय जनता पार्टी की सरकार को भी जब वह घेरने का प्रयास करते हैं तो सायास उसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर आ जाते हैं। अपनी हालिया विदेश दौरे में भी उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर निशाना साधा। राहुल गांधी का मानना है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भारत में सभी संस्थाओं पर कब्जा कर लिया है। इससे संवाद की प्रक्रिया बाधित हुई है, बल्कि 'आइडिया आफ इंडिया' को नुकसान पहुंचा है। लोकतांत्रिक व्यवस्था तहस-नहस हो गई है। उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि भारत में वसुधैव कुटुंबकम की अवधारणा भी संकट में है। उन्हें लगता है कि एक संगठन इस मजबूत भारतीय मूल्य को हानि पहुंचाने में सक्षम है। राहुल गांधी राजनेता हैं। राजनीति ही उनका कर्म है। उनके इस बयान पर हालांकि संघ ने बेहद संधी हुई प्रतिक्रिया दी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि राहुल गांधी अपना राजनीतिक एजेंडा चलाते हैं और हमारी उनसे कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है। परंतु साथ ही उन्होंने राहुल गांधी से और जिम्मेदार होने की अपेक्षा भी जताई। राहुल गांधी के साथ- साथ कांग्रेस नेता और पूर्व वामपंथी बुद्धिजीवी जो इन दिनों कांग्रेस में अपना भविष्य तलाश रहे हैं, वे भी निरंतर संघ की आलोचना करते हैं । उनकी आलोचना का आधार होता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने देश के सभी सांस्कृतिक संस्थानों पर कब्जा कर लिया। लगभग दो वर्ष पहले की बात है । दिल्ली
(Delhi)
में कुछ बुद्धिजीवियों के साथ संघ प्रमुख मोहन भागवत की बैठक थी। भोजनावकाश के समय औपचारिक बातें हो रही थीं। मोहन भागवत जहां भोजन कर रहे थे वहां एक वरिष्ठ पत्रकार पहुंचे। उन्होंने उनसे किसी नियुक्ति को लेकर बात आरंभ कर दी। संघ प्रमुख भोजन करते रहे। जब वरिष्ठ पत्रकार उसी विषय पर बोलते रहे तो मोहन भागवत ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कभी भी नियुक्तियों आदि में न तो हस्तक्षेप करता है और न ही सरकार को अपनी पसंद बताता है। संघ का काम है देश हित में जनमानस को तैयार करना । जब समाज का मानस तैयार हो जाता है तो सरकारें उसका स्वतः संज्ञान लेती हैं और उसके अनुकूल कार्य करती हैं। नियुक्ति आदि का काम सरकार का होता है, वही इसे देखे तो व्यवस्था बनी रहती है। फिर कुछ हास-परिहास हुआ और बात खत्म हो गई। यहां हंसते हुए मोहन भागवत ने जो बात कही वह बेहद महत्वपूर्ण थी । उसे समझने की आवश्यकता है। अब जरा वास्तविकता पर भी दृष्टि डाल लेते हैं कि देश में शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में काम करनेवाली संस्थाओं का हाल क्या है। यदि संघ ने सचमुच हर जगह कब्जा कर लिया है तो इन संस्थाओं के प्रमुखों के पद पर तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
(RSS)
से जुड़े लोग ही पदस्थापित होंगे। शिक्षा से आरंभ करते हैं। एक बेहद दिलचस्प उदाहरण है बिहार के मोतिहारी स्थित महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय का, जहां के कुलपति का कार्यकाल 2 फरवरी 2021 को समाप्त हो गया। दो साल में कुलपति की नियुक्ति के लिए दो बार चयन प्रक्रिया हो चुकी है। परंतु अब तक किसी की नियुक्ति नहीं हो सकी है। विवि कार्यवाहक कुलपति के भरोसे चल रहा है। यदि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शैक्षणिक संस्थाओं पर कब्जा जमाने में लगा होता तो अब तक यहां कुलपति की नियुक्ति करवा चुका होता । यह विवि नया है और अपने संगठन एवं विचार के लोगों को यहां भरने की संभावनाएं भी हैं, दो साल से इस केंद्रीय विवि में कुलपति की नियुक्ति न होना इस आरोप का निषेध करता है कि संघ योजनाबद्ध तरीके से संस्थाओं पर कब्जा कर रहा है। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने संसद में जानकारी दी कि शैक्षणिक संस्थानों में शिक्षकों के 11050 पद रिक्त हैं। जिनमें से 6028 पद केंद्रीय विश्वविद्यालयों में, 4526 पद भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों में और 496 पद भारतीय प्रबंध संस्थान में रिक्त हैं । यदि संस्थाओं पर कब्जा होता तो इतनी बड़ी संख्या में शिक्षकों के पद खाली क्यों होते संघ प्रयासपूर्वक नियुक्तियां करवा रहा होता । एक संस्था है केंद्रीय हिंदी निदेशालय जो पिछले कई वर्षों से निदेशक की बाट जोह रहा है। केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा को ढाई साल से प्रभारी निदेशक चला रही हैं। शिमला के भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान में नियमित निदेशक की प्रतीक्षा है।
अब जरा कला और साहित्य से जुड़ी संस्थाओं को देख लेते हैं। दिल्ली स्थित राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (National School of Drama) में पिछले कई वर्षों से निदेशक का पद रिक्त है। वहां कई शिक्षकों के पद भी रिक्त हैं। विद्यालय में दो कार्यवाहक निदेशक पद संभालकर सेवानिवृत्त हो चुके हैं। इन दिनों नई दिल्ली के इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के प्रोफेसर रमेश गौड़ नाट्य विद्यालय के निदेशक का अतिरिक्त प्रभार संभाल रहे हैं। यहां भी निदेशक के पद के लिए दूसरी बार साक्षात्कार हो चुका है, लेकिन अब तक नियुक्ति नहीं हो पाई है। यदि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) संस्थाओं पर कब्जा करने में लगा होता तो इस प्रतिष्ठित नाट्य संस्था पर अपनी पसंद का निदेशक तो चयनित करवा चुका होता। निदेशक की नियुक्ति की बात छोड़ भी दें तो विद्यालय परिसर में लगभग दो साल पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का उपहास करते हुए पोस्टर लगाया गया था। संस्थाओं पर यदि कब्जा होता तो क्या यह संभव था कि वहां प्रधानमंत्री उपहास उड़ाया जाता। संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत ही ललित कला अकादमी है, जहां नियमित सचिव का पद रिक्त है। कला संस्कृति से जुड़े संस्थानों में रिक्त दों की सूची लंबी है। ऐसा प्रतीत होता है कि कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष के सलाहकारों ठीक से होमवर्क करके उन्हें जानकारी नहीं दी । यदि वे होमवर्क करते तो उन्हें पता चलता कि शिक्षा - संस्कृति के संस्थानों की वास्तविक स्थिति क्या है ।
वर्ष 2014 में केंद्र में नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) के नेतृत्व में सरकार बनने और कांग्रेस के निरंतर कमजोर होते जाने से वामपंथियों को चुनौतियां मिलने लगीं। इन चुनौतियों से जब वे पार नहीं पा सकते हैं तो दुष्प्रचार आरंभ कर देते हैं। वस्तुतः जो पूर्व वामपंथी बुद्धिजीवी कांग्रेस में अपनी संभावनाएं तलाश रहे हैं वे ही इस तरह की बातें फैलाते रहते हैं । इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल से ही कांग्रेस ने शिक्षा-संस्कृति का क्षेत्र वामपंथियों को आउटसोर्स कर दिया था । विश्वविद्यालयों से लेकर अकादमियों में वामपंथियों का बोलबाला था । कुलपति से लेकर अकादमी के चेयरमैन और संस्थानों के निदेशक सभी पदों पर वामपंथी अपनी पसंद के लोगों को बिठा थे। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के इर्द- गिर्द भी इस विचारधारा के लोगों ने अपना घेरा मजबूत कर लिया है और राहुल गांधी को आगे करके वे अपनी स्वार्थसिद्धि के उपक्रम में जुटे रहते हैं । वे यह नहीं समझा पा रहे कि आरोप यदि तथ्यहीन होते हैं तो प्रभाव नहीं छोड़ते ।
Editorial

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