✕
विपक्ष को जोड़ना-तोड़ना ही सियासत
By EditorialPublished on 1 March 2023 5:30 AM IST
अगर इस देश (Indian) में विपक्षी एकता का कोई स्थायी सूचकांक होता, तो सेंसेक्स (Sensex) और निफ्टी (Nifty) जैसे शेयर (Share) सूचकांक उसके सामने पानी भरते।

x

हरजिंदर : अगर इस देश (Indian) में विपक्षी एकता का कोई स्थायी सूचकांक होता, तो सेंसेक्स (Sensex) और निफ्टी (Nifty) जैसे शेयर (Share) सूचकांक उसके सामने पानी भरते। भारत के विपक्ष की एकता को लेकर जिस तरह का उतार- चढ़ाव दैनिक खबरों में दिखाई देता है, वैसी उछाल और गिरावट के बारे में तो शेयर बाजार सपने में भी नहीं सोच सकता। इसे लेकर राजनीति में एक अन्योक्ति भी अक्सर सुनाई जाती है हर उस सप्ताह, जिसमें मंगलवार नहीं होता, विपक्षी एकता के प्रयासों की खबर नहीं आती। कई बार ऐसा भी लगता है कि इस देश में विपक्षी एकता की कोशिशें और उसे पंक्चर करने के प्रयास ही असली राजनीति है, बाकी सब तो नीरस प्रेस विज्ञप्तियां हैं।
कम या ज्यादा यह दुनिया के तकरीबन उन सभी लोकतंत्रों में होता है, जहां पर बहुदलीय व्यवस्था है। चुनावों में और कई मुद्दों पर विपक्षी दल एक साथ आ जाते हैं और बहुदलीय लोकतंत्र (Democracy) द्विदलीय व्यवस्था की तरह दिखने लगता है। इसको जरूरी भी माना जाता है। सत्ताधारी दल के नेता राज- राजेश्वर की तरह बर्ताव न करने लगें, इसके लिए एक मजबूत विपक्ष की जरूरत राजनीति शास्त्र के ककहरे में ही पढ़ा दी जाती है। फिर, विपक्ष ऐसा भी होना चाहिए, जो सत्ताधारी दल के सिर पर उसे अपदस्थ कर देने के खतरे की तरह हरदम खड़ा रहे। ऐसी जगहों में इसे एक सामान्य सी चीज माना जाता है।
इसके विपरीत, भारतीय राजनीति के आदिकाल से विश्लेषकों और टिप्पणीकारों में विपक्षी एकता को लेकर उपहास का एक भाव रहा है। टूटा बिखरा जैसे विशेषण उसके साथ जोड़े जाते रहे हैं और उसे 'भानुमती के कुनबे' जैसे ढेर सारे रूपकों से
नवाजा जाता रहा है। आज भी मोटे तौर पर ऐसी ही सोच है। अक्सर हम सत्ताधारी दल को आदर्श मान लेते हैं और यह उम्मीद बांधते हैं कि उसे चुनौती देने के लिए विपक्ष को भी ठीक वैसा ही होना चाहिए। साल 2014 के बाद से तो ऐसा सोचने वालों की संख्या बढ़ी ही है।
जब हम नई दिल्ली और कई राज्यों की सत्ता में बैठी भारतीय जनता पार्टी को देखते हैं, तो एक सिरे से दूसरे सिरे तक उसमें गजब की समानता दिखाई देती है। कई बार लगता है कि जैसे सबके सब एक ही सांचे में ढले हों या एक ही फैक्टरी से बनकर निकले हों। देश के किसी भी कोने से दिया गया हो, उसके सारे नेताओं के बयानों में अद्भुत साम्य होता है। उनका बचाव भी एक जैसा होता है और उनकी आक्रामकता भी मानो सारी अभिव्यक्तियों और भंगिमाओं की एक ही कंप्यूटर में प्रोसेसिंग की गई हो।
विपक्ष इस तरह का नहीं है। वह हो भी नहीं सकता। जिनको हम विपक्षी दल कहते हैं, उन सबका इतिहास अलग है और भूगोल भी उनकी जमीन जुदा है और उनका आसमान भी एक-दूसरे से अलग है। कोई राष्ट्रीय (National) है, कोई प्रादेशिक, कोई क्षेत्रीय, तो किसी का आधार किसी उप जाति विशेष तक सीमित है वे सब अलग-अलग अभिलाषाओं, अपेक्षाओं व लालसाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसलिए सबके मन अलग हैं, वचन अलग और कर्म भी हर एक की मथुरा तीन लोक से न्यारी है। कुछ के बालहठ चंद खिलौना लैहों से बहुत आगे नहीं देख पाते। जब हमारा विपक्ष एकताबद्ध होने की बात करता है, तो उसके सामने एक चुनौती ऐसे बालहठ को अपनी उस सेना में शामिल करने की होती है, जिसे आगे बढ़कर नई दिल्ली के तपते सूरज को चुनौती देनी है।
उनके आपसी अंतर्विरोध भी कम नहीं। कुछ दल हैं, जो एक-दूसरे के साथ बैठ नहीं सकते, तो कुछ ऐसे हैं, जो एक-दूसरे को देख भी नहीं सकते। एक राज्य में वे एक- दूसरे से गठजोड़ कर लेते हैं, तो दूसरे राज्य में एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ते हैं। इन दिनों एक और नई चीज हुई है। हर दूसरे दल को तीसरा दल भारतीय जनता पार्टी (BJP) की बी-टीम लगता है वह उसे वोटकटवा मानता है, इसलिए उसके साथ खड़े होने का तो सवाल ही नहीं।
बेशक, ये सारी बातें निराश करने वाली लग सकती हैं, लेकिन यही भारतीय राजनीति का यथार्थ है और इसे स्वीकार करके ही हम किसी नतीजे पर पहुंच सकते हैं। अपनी इन्हीं खामियों और इन्हीं अंतर्विरोधों के साथ विपक्ष ने भारतीय लोकतंत्र में अपनी एक अहम भूमिका निभाई है। 1977 के आम चुनाव को अगर हम अपवाद परिस्थितियों के कारण छोड़ भी दें तो विपक्ष पहले और बाद में यह भूमिका निभा चुका है। इन्हीं यथार्थ के बीच से राजीव गांधी की प्रबल और ऐतिहासिक बहुमत वाली सरकार को मात मिली थी। इसी तरह के विपक्ष ने अटल बिहारी वाजपेयी को दो बार सरकार चलाने का मौका दिया। मनमोहन सिंह ने अगर लगातार दस साल तक केंद्र में सरकार चलाई, तो इसके पीछे भी विपक्ष की यही ताकतें थीं। इसलिए इस विपक्ष को लेकर बड़ी उम्मीद बांधने का कोई नया कारण भले ही न हो, लेकिन उसे लेकर निराश होने की भी कोई नई वजह नहीं दिखती है।
अगला लोकसभा चुनाव अब महज 15 महीने दूर है और चुनाव की यह नजदीकी बहुत से लोगों को बेचैन कर रही है उन्हें लगता है कि संपूर्ण विपक्षी एकता के लक्षण अभी ही ठीक से नहीं दिख रहे हैं, तो भविष्य को लेकर क्या खाक उम्मीद बांधी जाए? वह भी तब जब भारतीय जनता पार्टी कमर कसकर मैदान में सक्रिय हो चुकी है।
यह उम्मीद भी विपक्ष के यथार्थ से मेल नहीं खाती। अक्सर कहा जाता है कि विपक्षी दल छह महीने तक साथ नहीं रह सकते और तीन महीने तक एक-दूसरे से अलग नहीं रह पाते। यानी, विपक्षी दल अगर आज साथ आ भी जाएं, तो इसकी कोई गारंटी नहीं है कि अगले 15 महीने तक वे साथ रहेंगे। इसलिए विपक्षी एकता भारतीय राजनीति का स्थायी भाव है। यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जो सतत चलती रहती है । जब चुनाव न हों तब भी, जब चुनाव हो तब भी और चुनाव के बाद भी भाजपा इस सच्चाई को समझती है, इसलिए उसने अभी से तैयारियां शुरू कर दी हैं वरना, वह आश्वस्त होकर बैठी रह सकती थी कि विपक्ष एक नहीं है, इसलिए मैदान तो उसके हाथ आएगा ही।
अगले कुछ महीनों में कई राज्यों के विधानसभा चुनाव हैं कम से कम उनके संपन्न होने तक किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सकता, न विपक्ष के बारे में और न सत्ताधारी दल के बारे में।

Editorial
Next Story
Related News
X
