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बढ़ेंगी चुनौतियां तो कैसे घटे रक्षा खर्च
By EditorialPublished on
अफगानिस्तान (Afghanistan) में तालिबान (Taliban) की सरकार मजबूत हो रही है और पाकिस्तान (Pakistan) में भी चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं। ये चुनौतियां भी दो तरह की हैं, सामरिक भी और आर्थिक भी । पाकिस्तान के हालात बिगड़ते जा रहे हैं। यह एक सैन्य चुनौती (Military Challenge) है और दूसरी चुनौती यह है

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सुशांत सरीन : दुनिया के हालात किसी से छिपे नहीं हैं। पहले जो सामरिक समन्वय दुनिया भर में बना हुआ था, वह पिछले चार साल से बिगड़ना शुरू हो गया है। दुनिया में जो बड़ी शक्तियां हैं, उनके परस्पर रिश्तों में खटास बढ़ी है। उथल-पुथल शुरू हो गई है। दूसरी बात, कई छोटे देशों के अंदर भी बहुत आर्थिक और राजनीतिक अस्थिरता फैली हुई है, इससे हालात पहले की तुलना में बिगड़े हैं। हमारे पड़ोस में भी आर्थिक राजनीतिक गड़बड़ियां नजर आनी शुरू हो गई हैं। एक तरफ चीन (China) है, जिसका रवैया लगातार आक्रामक बना हुआ है। वह न सिर्फ भारत के खिलाफ, बल्कि अन्य अनेक मोर्चों पर भी तनाव बढ़ा रहा है।
भारत के पश्चिम में देखें, तो अफगानिस्तान (Afghanistan) में तालिबान (Taliban) की सरकार मजबूत हो रही है और पाकिस्तान (Pakistan) में भी चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं। ये चुनौतियां भी दो तरह की हैं, सामरिक भी और आर्थिक भी । पाकिस्तान के हालात बिगड़ते जा रहे हैं। यह एक सैन्य चुनौती (Military Challenge) है और दूसरी चुनौती यह है कि यदि पाकिस्तान के आर्थिक हालात बहुत बिगड़ते हैं, बेकाबू हो जाते हैं, और भारत पर उनका सीधा असर पड़ने लगता है, तो उसे कैसे संभाला जाए? एक ही उपाय है, चुनौतियों का सामना करने के लिए आपको अपनी क्षमता विकसित करनी पड़ेगी। खुद को मजबूत बनाने के लिए आधुनिकीकरण करना पड़ता है, आंतरिक सुरक्षा का भी ध्यान रखना पड़ता है। सरहदों की सुरक्षा चाक- चौबंद रखनी पड़ती है। आज के समय में आर्थिक सुरक्षा कब सामरिक सुरक्षा में बदल जाती है, पता नहीं चलता। आर्थिक, सामरिक और सामाजिक सुरक्षा परस्पर जुड़ी हुई है।
आज के समय में हमें अर्थव्यवस्था (Economy) पर नजर रखते हुए आगे बढ़ना है। इस संदर्भ में अगर देखा जाए, तो अग्निपथ योजना जब आई, तब बहुत सारे लोगों ने आलोचना की, लेकिन इस योजना के पीछे एक आर्थिक सोच थी। अगर इस बार का बजट आप देखें, तो रक्षा का 25 प्रतिशत हिस्सा उसके पेंशन बजट में जा रहा है और यह रकम बढ़ सकती है। जब तक अग्निपथ योजना पूरी तरह लागू नहीं होगी, तब तक पेंशन खर्च कम नहीं होगा। पेंशन खर्च दस-पंद्रह साल तक बढ़ता रहेगा, शायद उसके बाद भी बढ़े। यह उचित नहीं है। अगर इस बारे में हमारी समझ नहीं है, तो जो दूसरों के हालात हैं, उनसे हमें सीखना चाहिए। उदाहरण के लिए, पाकिस्तान में भी पेंशन का बिल, विशेष रूप से वहां केंद्र सरकार की ओर से पेंशन का बिल बाकी सरकार चलाने के खर्च से कहीं ज्यादा है। यह बढ़ता जाएगा। क्या हम पाकिस्तान जैसे आर्थिक हालात चाहते हैं? पेंशन अगर ज्यादा हो जाए, तो आपकी सुरक्षा पर असर डालने लगता है, जैसे पाकिस्तान की सुरक्षा पर यह असर डालने लगा है। जरूरी है कि अर्थव्यवस्था पर नजर रखी जाए। बिना आर्थिक सुरक्षा के सामरिक सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो सकती।
हमने रक्षा आधुनिकीकरण के लिए 20 से 25 प्रतिशत तक का बजट रखा है। यदि आत्मनिर्भर भारत बनाने पर ध्यान दें, तो कम पैसे में ही आपको ज्यादा चीजें उपलब्ध हो सकती हैं।
ध्यान रहे, रक्षा बजट तो हमारी जीडीपी के दो प्रतिशत से भी कम हो गया था, बहुत से लोगों का मानना है कि रक्षा बजट जीडीपी का तीन प्रतिशत होना चाहिए। कई बार आपकी आर्थिक स्थिति ऐसी होती है, जो आपको ऐसा करने से रोकती है। अभी अर्थव्यवस्था पर बगैर बोझ डाले जो रक्षा आवंटन हुआ है, वह सराहनीय है। हां, बहुत से लोग कह सकते हैं कि यह काफी नहीं है, लेकिन जब सुरक्षा को आप अर्थव्यवस्था से जोड़कर देखेंगे, तो यह गलत नहीं है। आर्थिक सुरक्षा की पृष्ठभूमि में ही आपको रक्षा बजट को देखना होगा। रक्षा बजट इतना भी नहीं होना चाहिए कि आपके यहां का समग्र आर्थिक विकास प्रभावित होने लगे। यहां पाकिस्तान एक उदाहरण है, वहां रक्षा- सुरक्षा को ध्यान में रखकर ही सब कुछ किया गया है, तो अब वहां के हालात जगजाहिर हैं। सेना को ज्यादा से ज्यादा महत्व देने की वजह से भी वहां की पूरी व्यवस्था बिगड़ गई है।
हमें दूसरों की गलतियों से सबक सीखना चाहिए। रक्षा के लिहाज से हमारा बजट पर्याप्त है। अब सरकार को यह सुनिश्चित करना पड़ेगा कि कोई फिजूलखर्ची न हो। रक्षा के मामलों में भी कई चीजें ऐसी हैं, जहां कटौती की जा सकती है। बजट देना ही काफी नहीं है, बजट के सदुपयोग को भी सुनिश्चित करना चाहिए। सैन्य व प्रशासनिक अधिकारियों को मिलकर संसाधन की बर्बादी को कम करना चाहिए। बचे हुए पैसों का बेहतर इस्तेमाल होना चाहिए।
आम लोग भी यही चाहते हैं कि उनका धन सही ढंग से इस्तेमाल हो । दुनिया में कहीं भी लोगों को सरकार को टैक्स देना अच्छा नहीं लगता, लेकिन टैक्स देना ही पड़ता है, क्योंकि अगर सरकार नहीं चलेगी, तो कुछ भी नहीं चलेगा। संतुलन बनाना पड़ेगा और इस केंद्रीय बजट (Union Budget) में संतुलन बनाया गया है।
हमारा रक्षा बजट (Defense Budget) तुलनात्मक रूप से हर बार ज्यादा ही रहता है, इसमें कुछ नया नहीं है। हर साल आप कुछ-कुछ बजट बढ़ाते चलते हैं। इस बार रक्षा बजट 5.94 लाख करोड़ रूपये का है, जो पिछले साल से 15 प्रतिशत ज्यादा है। अगली बार यह छह लाख करोड़ पार कर जाएगा। स्वाभाविक है, तब यही कहा जाएगा कि रक्षा बजट रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गया।
भारत की स्थिति अलग है। हां, दुनिया में ऐसे भी देश हैं, जिनका रक्षा बजट नहीं बराबर है। रक्षा बजट इससे तय होता है कि आपके पड़ोस के क्या हालात हैं, कैसी चुनौतियां हैं, खतरे कितने हैं? एक दूसरा पहलू भी है, दूसरे विश्व युद्ध के बाद जापान ने तय किया कि जीडीपी के एक प्रतिशत से ज्यादा रक्षा बजट नहीं होगा, पर जापान की जीडीपी का एक प्रतिशत ही बहुत हो जाता है। जापान दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश था, तो उसका एक प्रतिशत भी बहुत ज्यादा हो जाता था। एक देश स्वीट्जरलैंड भी है, जो दशकों से निष्पक्ष रहा है, उसे ज्यादा रक्षा बजट की जरूरत ही नहीं है। यह समझना होगा कि आप किस परिवेश में रहते हैं और तब आपको देखना होगा कि आप कितना खर्च कर सकते हैं?
जब भी कोई बजट बनता है, तो यह देखना पड़ता है कि रोटी की कितनी जरूरत है और बंदूक की कितनी, दोनों के बीच संतुलन बनाकर चलना ही बेहतर है और भारतीय बजट में भी यह संतुलन बनाया गया है।

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