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सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार को हुए कई फैसले, हुआ मामलों का निस्तारण
By EditorialPublished on
सुप्रीम कोर्ट ने पीरियड्स के दौरान महिलाओं को वर्कप्लेस पर छुट्टी मिलने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। शुक्रवार को मामला सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच में लिस्टेड था ।

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मेन्स्ट्रुअल लीव पर सुनवाई से इनकार
सीजेआई बोले (CJI) - एम्प्लॉयर्स को छुट्टी देने मजबूर किया तो वे महिलाओं को काम देने से कतराएंगे
नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने पीरियड्स के दौरान महिलाओं को वर्कप्लेस पर छुट्टी मिलने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। शुक्रवार को मामला सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच में लिस्टेड था । चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़, जस्टिस पीएस (Justice PS) नरसिम्हा और जस्टिस जेबी पारदीवाला की बेंच ने यह भी कहा कि अगर इम्पलॉयर्स को मेन्स्ट्रुअल लीव की छुट्टी देने के लिए मजबूर किया गया, तो इससे वे महिलाओं को काम पर रखने से कतरा सकते हैं। यह देखते हुए कि यह मुद्दा सरकार की पॉलिसी के दायरे में आता है, सीजेआई ने कहा कि फैसला लेने के लिए केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय (Union Ministry of Women and Child Development) को भेजा जा सकता है।
मातृत्व लाभ अधिनियम के तहत राज्यों को निर्देश देने की मांग थी
रिपोर्ट्स के मुताबिक, याचिका शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने दाखिल की थी। जिसमें मातृत्व लाभ अधिनियम के तहत राज्यों को निर्देश देने की मांग की गई थी। साथ ही कहा गया था कि कुछ देशों में किसी न किसी फॉर्म में पीरियड्स के दौरान महिलाओं को छुट्टियां दी जाती हैं। यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन की एक स्टडी के मुताबिक पीरियड्स के दौरान महिलाओं को हार्ट अटैक के बराबर दर्द का सामना करना पड़ता है। शैलेंद्र त्रिपाठी ने बताया था कि मैंने बचपन में अपनी मां को इस दर्द से गुजरते देखा है। एक बार ट्रेन में सफर के दौरान एक को पैसेंजर महिला पीरियड्स के दर्द से काफी बैचेन थी। वो बेचैन थीं, लेकिन कुछ कह नहीं पा रही थीं । मैंने उन्हें पेनकिलर दी। बाद में मैंने इस विषय पर पढ़ा और जाना कि पीरियड्स के दर्द की तुलना हार्ट अटैक जैसी होती है। तब मैंने इस मुद्दे पर याचिका दाखिल की।
'बुलेट ट्रेन' (Bullet Train) को बताया राष्ट्रीय प्रोजेक्ट
भूमि अधिग्रहण को बरकरार रखने वाले बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील खारिज

नई दिल्ली : बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट के लिए भूमि अधिग्रहण मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह एक राष्ट्रीय प्रोजेक्ट (Project) है। सुप्रीम कोर्ट ने भूमि अधिग्रहण को बरकरार रखने वाले बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ गोदरेज एंड बॉयस की अपील खारिज कर दी। सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी को ये लिबर्टी जरूर दी कि मुआवजा बढ़ाने के लिए संबंधित अथॉरिटी को अर्जी जरूर दे सकते हैं। दरअसल हाईकोर्ट में गोदरेज एंड बॉयस ने मुंबई- अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना के लिए विक्रोली में महाराष्ट्र सरकार (Government of Maharashtra) और एनएचएसआरसीएल (NHSRCL) द्वारा शुरू की गई अधिग्रहण प्रक्रिया को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने भी भूमिअधिग्रहण को सही ठहराया था। कंपनी ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। सीजेआई चंद्रचूड़ ने गोदरेज एंड बॉयस का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील मुकुल रोहतगी से कहा, पानी बहुत बह चुका है। कब्जा ले लिया गया है और निर्माण शुरू गया है। आप मुआवजे में वृद्धि के लिए आवेदन कर सकते हैं। दरअसल, बांबे हाईकोर्ट ने सुनवाई करते हुए इस बात को सही पाया कि इस प्रोजेक्ट के लिए भूमि अधिग्रहण करते समय कोई अनियमितता या गैरकानूनी काम नहीं किया गया। हाईकोर्ट ने कहा था निजी हित से बड़ा सार्वजनिक हित है । ये राष्ट्रहित से जुड़ा मामला है।
भूमि अधिग्रहण के दौरान कोई गैरकानूनी काम नहीं किया गया।
मामला मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट (Mumbai-Ahmedabad Bullet Train Project) के तहत जमीन अधिग्रहण का है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने सुनवाई करते हुए कहा था कि भूमि अधिग्रहण के दौरान कोई गैरकानूनी काम नहीं किया गया है। कंपनी द्वारा बांबे हाईकोर्ट के समक्ष याचिका दाखिल करते हुए कहा गया था कि भूमि अधिग्रहण के लिए कार्रवाई 2019 में शुरू की गई। 2020 में समाप्त हो गई थी। एक लंबा वक्त लगा लिहाजा दिए गए मुआवजे की राशि उपयुक्त नहीं है।
मनु प्रतिमा हटाने पर सुनवाई से इंकार
राजस्थान हाई कोर्ट में लगी है प्रतिमा : सुको ने कहा मामला पहले ही राजस्थान हाईकोर्ट में लंबित

नई दिल्ली : राजस्थान (Rajasthan) हाई कोर्ट से मनु की प्रतिमा हटाए जाने की मांग वाली अर्जी पर सुनवाई से सुप्रीम कोर्ट ने इनकार कर दिया है। अदालत ने कहा कि राजस्थान हाई कोर्ट में यह मामला पहले ही लंबित है, ऐसे में हमारी ओर से सुनवाई करने का कोई मतलब नहीं बनता है। कहा जाता है कि मनु स्मृति की रचना मनु ने ही की थी। सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस एमएम (Justice MM) सुंदरेश ने कहा कि हम इस मामले में सुनवाई नहीं कर सकते। यह केस तो पहले ही राजस्थान उच्च न्यायालय में लंबित है। बेंच ने याचियों से कहा कि आपको इस मामले में हाई कोर्ट का रूख करना चाहिए। याचिका में कहा गया है कि मनु की प्रतिमा हाई कोर्ट में 1989 में चुपचाप ही लगा दी गई थी, जबकि उनका कोई कानून के मामले में योगदान नहीं है। उन्होंने देश में जाति व्यवस्था का प्रचार किया था। ऐसे में उनकी प्रतिमा अदालत में लगाने का कोई तुक नहीं बनता। याचिका में कहा गया है कि प्रतिमा लगाए जाने के बाद फुल कोर्ट मीटिंग हुई थी, लेकिन कोई फैसला नहीं हो सका था । उसके बाद से लंबा वक्त याचिका को हो गया है, लेकिन कोई फैसला उस पर नहीं हुआ है। याचिका दाखिल करने वाले शख्स ने कहा कि मनु ने मुनस्मृति नाम के ग्रंथ की रचना की थी। यह ग्रंथ न्याय, उदारता, समानता के खिलाफ है। इसमें भारतीय संविधान की प्रस्तावना में जो कहा गया है, उसका सीधा और खुला उल्लंघन होता है। अर्जी में कहा गया कि मनु स्मृति तो देश की महिलाओं समेत 75 फीसदी आबादी के खिलाफ है। यही नहीं तर्क दिया गया कि अदालत में मनु की प्रतिमा होने से देश की छवि खराब होती है। दूसरे देश ऐसे राज्य में निवेश क्यों करना चाहेंगे, जहां भेदभाव को बढ़ावा देने वाले लोगों का महिमामंडन किया जाता है। यही नहीं कहा गया कि प्रतिमा हटाने से हिंदू समाज को भी फायदा होगा।

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