Pakistan pays the price of suicidal policies
विवेक काटजू : जब कोई देश (Country) वैसे आर्थिक, राजनीतिक एवं सामरिक संकट से जूझ रहा होता है, जैसे इस समय पाकिस्तान (Pakistan) जूझ रहा है तो वे आत्ममंथन (Introspection) करते, लेकिन वहां ऐसा होता नहीं दिख रहा। वहां यथास्थिति कायम है। आरोप- प्रत्यारोप चरम पर हैं। नेता एक दूसरे पर निशाना साध रहे हैं। तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान यानी टीटीपी के आतंकी हमलों को लेकर भी ठीकरा फोड़ा जा रहा है। वहीं पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान जैसे कुछ नेता मौजूदा संकट के लिए पूर्व सेनाप्रमुख जनरल कमर बाजवा को दोषी ठहरा रहे हैं। दूसरी ओर पाकिस्तान के राजनीतिक एवं सामरिक वर्ग के साथ ही कारोबारी दिग्गजों को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ
(IMF)
के राहत पैकेज की अगली किस्त की प्रतीक्षा है ताकि अर्थव्यवस्था (Economy) को संतुलन देने की कवायद शुरू की जा सके। इतने मुश्किल माहौल में सबसे ज्यादा ध्यान टीटीपी (TTP) ने खींचा है कि वह कितनी आसानी से पूरे पाकिस्तान में आतंकी हमलों को अंजाम दे रहा है। यह संगठन विशेष रूप से पुलिस प्रतिष्ठानों को निशाना बना रहा है। पाकिस्तानी सरकार के साथ टीटीपी का संघर्ष विराम 28 नवंबर, 2022 को समाप्त हुआ और उसके बाद से अब तक कई बड़े आतंकी हमले हो चुके हैं। 18 दिसंबर को टीटीपी ने खैबर पख्तूनख्वा बन्नू जिले में स्थित आतंक -निरोधी दस्ते के मुख्यालय पर हमला किया। दो दिनों तक उसने इस केंद्र पर तैनात कर्मियों को बंधक बनाकर रखा। इस केंद्र को आतंकियों से मुक्त कराने के अभियान में पाकिस्तानी सुरक्षा बल के चार लोग मारे गए, जबकि उनका दावा था कि उन्होंने 25 आतंकियों को मार गिराया । टीटीपी ने 14 जनवरी को पेशावर के सरबंद पुलिस स्टेशन पर हमला कर डिप्टी एसपी रैंक के एक अधिकारी और दो हवलदारों को मार दिया। इसके बाद 30 जनवरी को टीटीपी का आतंकी पुलिस की वर्दी में पेशावर पुलिस लाइंस में घुसने में सफल रहा और शुक्रवार को नमाज के दौरान उसने धमाका कर दिया। उस आतंकी हमले में जान गंवाने वाले 80 लोगों में से अधिकांश पुलिसकर्मी थे। टीटीपी का एक तीन सदस्यीय दस्ता 17 फरवरी को कराची पुलिस प्रमुख के कार्यालय में घुस गया । उन तीनों आतंकियों को मार गिराने में चार सुरक्षा कर्मियों की जान चली गई।
टीटीपी (TTP) की ओर से उत्तर से दक्षिण तक हुए ये हमले पाकिस्तान (Pakistan) की नाजुक स्थिति को दर्शाते हैं । कराची हमले के बाद प्रधानमंत्री (Prime Minister) शहबाज शरीफ ने कहा था, आतंकी शायद यह भूल गए हैं कि पाकिस्तान वही देश है जिसने अपनी बहादुरी और साहस के साथ आतंक को परास्त किया है। हालांकि ये बातें सिर्फ खोखली हैं। टीटीपी के कमजोर पड़ने के कोई संकेत नहीं मिल रहे । वहीं सुरक्षा बल भी यह नहीं दर्शा पाए कि वे अब तक टीटीपी को काबू कर चुके हैं। किसी भी सूरत में यह काम आसान भी नहीं है, क्योंकि खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में टीटीपी को व्यापक समर्थन हासिल है । संघीय सरकार प्रशासित जनजातीय इलाकों (फाटा) में रहने वाले तमाम लोग टीटीपी
(TTP)
के साथ सहानुभूति रखते हैं, जिसकी मांग है कि फाटा के खैबर पख्तूनख्वा में विलय के फैसले को पलटा जाए। टीटीपी को अफगानिस्तान में तालिबान के अहम धड़ों का समर्थन भी हासिल है। पाकिस्तान के लिए फैसले की घड़ी आ गई है। क्या वह आतंकियों द्वारा पाकिस्तानियों की हत्या की कीमत चुकाने के साथ भारत के विरूद्ध इस्तेमाल किए जाने वाले लश्कर और जैश जैसे आतंकी समूहों को पालना- पोसना जारी रखेगा? उसै विकल्प तो चुनना ही होगा । अफसोस की बात है कि पाकिस्तानी सेना अपनी जनता की भलाई के लिए भी भारत के विरूद्ध आतंक की नीति का परित्याग करने को तैयार नहीं दिखती ।
पाकिस्तान (Pakistan) के भारी आर्थिक संकट के लिए भी उसकी सेना ही मुख्य रूप से उत्तरदायी है। देश के राजस्व का बड़ा हिस्सा उसके खाते में जाता है। उद्योग एवं व्यापार में भी सेना का ऊंचा दांव लगा हुआ है। कई प्रमुख कंपनियां और बैंकों का स्वामित्व सेना के पास है । दुनिया की कोई भी सेना इस पैमाने पर पाकिस्तानी फौज के पासंग भी नहीं । यह स्पष्ट नहीं कि ये उपक्रम अपनी देनदारी के अनुरूप कर अदा करते हैं या नहीं? पाकिस्तान का धनाढ्य वर्ग भी सेना के पदचिह्नों पर चलते हुए बहुत कम कर अदा करता है। इससे पाकिस्तानी सरकार के खजाने की हालत खराब होती गई और देश इतने गहरे संकट में आ गया कि अब विदेशी मदद का मोहताज बनकर रह गया है । हाल में आईएमएफ प्रमुख ने भी कहा कि पाकिस्तान गरीब जनता को सब्सिडी प्रदान कर सकता है, लेकिन उसे अमीरों पर कर अवश्य लगाना होगा। समस्या यही है कि अमीर तबका कर नहीं देना चाहता ।
हर कोई अपना पैसा देश से बाहर भेजने में जुटा है। ऐसे में पाकिस्तान खाड़ी देशों में रहने वाले अकुशल कर्मियों द्वारा भेजे जाने वाले धन पर निर्भर है और जब भी उसमें गिरावट आती है, जैसे कि अभी आई है तो पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था को तगड़ा झटका लगता है। आईएमएफ की मदद से भी तात्कालिक राहत ही मिलेगी और उससे मूल समस्याओं का समाधान नहीं होगा । ठोस समाधान के लिए देश की दिशा बदलनी होगी, जिसके लिए अभी तक न तो नेता तैयार हैं और न ही सेना ।
यदि पाकिस्तानी (Pakistan) शासकों में जरा भी जिम्मेदारी का भाव और अपने लोगों की परवाह होती तो वे पाकिस्तान का कायाकल्प करते । ऐसी किसी भी कवायद की शुरूआत के लिए उसकी भारत नीति में परिवर्तन आवश्यक होगा। वर्ष 1996 में तत्कालीन चीनी राष्ट्रपति जियांग जेमिन ने पाकिस्तानी नेशनल असेंबली में कहा था कि पाकिस्तान को इतिहास की समस्याओं को पीछे छोड़कर वर्तमान पर ध्यान केंद्रित करना होगा। उनका संकेत जम्मू- कश्मीर की ओर था ।
हालांकि यह सलाह पाकिस्तान (Pakistan) के सदाबहार मित्र की ओर से आई थी, लेकिन उसे भी अनदेखा कर दिया गया । त्रासदी यही है कि पाकिस्तानी सेना अपनी जनता को यह बरगलाने में सफल रही है कि भारत (India) उसका स्थायी शत्रु है, जो उसे तबाह करने पर तुला है। जब तक पाकिस्तानी जनता को यह महसूस नहीं होगा कि पाकिस्तानी सेना का यह प्रपंच उनके नहीं, बल्कि खुद सेना की भलाई से जुड़ा है तब तक उनका देश आर्थिक रूप से वेंटिलेटर पर ही रहेगा।
Editorial

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