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राहत और चुनौती
By EditorialPublished on
जीएसटी लागू होने के छह साल बाद इसकी 49वीं बैठक में वस्तु एवं सेवा कर से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए अपीलीय प्राधिकरण के गठन को मंजूरी मिली है, जो निश्चय ही एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है।

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जीएसटी (GST) लागू होने के छह साल बाद इसकी 49वीं बैठक में वस्तु एवं सेवा कर से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए अपीलीय प्राधिकरण के गठन को मंजूरी मिली है, जो निश्चय ही एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। इसके तहत हर राज्य (State) में एक प्राधिकरण गठित होगा, जिसमें दो न्यायिक और दो तकनीकी सदस्य होंगे। 50 लाख रूपये तक के टैक्स (Tax) विवाद की सुनवाई एक ही सदस्य कर सकेगा इससे अधिक के मामले दो सदस्य सुनेंगे। जीएसटी की दरों में बदलाव करने का जो सबसे सुखद फैसला परिषद में लिया गया, वह छात्रों से संबंधित है। इसके तहत एनटीए (NTA) (नेशनल टेस्टिंग एजेंसी) और राज्यों की अन्य भर्ती परीक्षाओं के परीक्षा शुल्क को जीएसटी के दायरे से बाहर कर दिया गया है, जबकि अभी तक इनमें 18 फीसदी जीएसटी लग रहा था। यानी अब जेईई (JEE), नीट (NEET) जैसी तमाम प्रवेश परीक्षाओं (Entrance Examinations) की फीस कम हो सकती है। खुले बेचे जाने वाले राब (तरल गुड़) पर जीएसटी 18 फीसदी से घटाकर शून्य कर देने का फैसला स्वागतयोग्य है, जो बताता है कि परिषद पहले की गलती सुधार रहा है। इसके अलावा जून, 2022 तक के, जो कि जीएसटी लागू होने के पांच साल का आखिरी महीना था, जब तक राज्यों को टैक्स में हुए घाटे की भरपाई करने की जिम्मेदारी केंद्र की थी, 16,982 करोड़ रूपये के बकाये जीएसटी मुआवजे का भुगतान भी राज्यों को किया जा चुका है। इसके अतिरिक्त भी कुल पांच राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों- दिल्ली, कर्नाटक, ओडिशा, पुदुचेरी, तमिलनाडु और तेलंगाना को 16,524 करोड़ रूपये की क्षतिपूर्ति देने का फैसला हुआ, जिन्होंने अपने महालेखाकारों (एजी) द्वारा सत्यापित राजस्व क्षति के आंकड़े जीएसटी परिषद को मुहैया कराए थे। अब भी केरल, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और पंजाब जैसे कुछ राज्य हैं, जिन्होंने महालेखाकारों द्वारा सत्यापित राजस्व क्षति के आंकड़े जीएसटी परिषद को मुहैया नहीं कराए हैं। जीएसटी लागू होने के पांच साल बीत चुके हैं और इस दौरान बहुत सारी समस्याएं सुलझा ली गई हैं। लेकिन अब भी कई सारे मुद्दों-जैसे पेट्रोल- डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने, पर विचार होना शेष है। चूंकि कोविड की पृष्ठभूमि में अनेक राज्य करों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के अलावा क्षतिपूर्ति की अवधि बढ़ाने की भी केंद्र से मांग कर चुके हैं, ऐसे में, पांच साल बाद अब राज्यों के सामने नई चनौती होगी।

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