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जी-20 पर भारत की राह में क्या रूस बनेगा रोड़ा
By EditorialPublished on
हर्ष वी. पंत : भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भारत अजित डोभाल पिछले सप्ताह रूस गए। वहां उन्होंने सुरक्षा परिषद सचिवों / राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की पांचवीं बहुपक्षीय बैठक में शिरकत की। मॉस्को में डोभाल की रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से भी मुलाकात हुई।

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हर्ष वी. पंत : भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भारत अजित डोभाल पिछले सप्ताह रूस गए। वहां उन्होंने सुरक्षा परिषद सचिवों / राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की पांचवीं बहुपक्षीय बैठक में शिरकत की। मॉस्को में डोभाल की रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से भी मुलाकात हुई। बड़ी बात यह है कि पुतिन ने प्रोटोकॉल तोड़कर भारत के एनएसए के साथ 'द्विपक्षीय और क्षेत्रीय मसलों पर व्यापक बातचीत की। इससे पता चलता है कि ऐसे में जब रूस वैश्विक बिरादरी में अलग-थलग पड़ता जा रहा है और उसे चीन के जूनियर पार्टनर के रूप में देखा जाने लगा है, वह भारत के साथ अपने रिश्तों को मजबूत बनाए रखना चाहता है।
युद्ध में तेजी के आसार
इधर, भारत ने कुछ महीनों पहले जी- 20 का अध्यक्षता संभाली है। वह चाहता है कि उसका यह कार्यकाल कुछ ठोस उपलब्धियों के लिए जाना जाए। लेकिन इस पर यूक्रेन युद्ध की आंच पड़ सकती है।
- 10 दिनों में रूस- यूक्रेन युद्ध को साल भर का वक्त हो जाएगा। इस बीच, रूस हमलों की धार तेज करने के मूड में है। दूसरी ओर, यूक्रेन भी हथियारों का भंडार बढ़ा रहा है । वह रूस को मुंहतोड़ जवाब देने की तैयारी में है।
अगर युद्ध तेज होता है तो दुनिया भर में महंगाई दर बढ़ेगी, जो पहले ही काफी ऊंची है । इससे ग्लोबल इकॉनमी पर भी खराब असर होगा।
- ऐसी स्थिति में भारत की अध्यक्षता में जी-20 के लिए कुछ ठोस हासिल करना मुश्किल हो जाएगा।
रूस ने क्या कहा
अपने एक हालिया इंटरव्यू में भारत में रूस के राजदूत डेनिस अलिपोव ने माना था कि दोनों देशों के बीच रिश्ते हमेशा दोस्ताना, भरोसेमंद और मजबूत रहे हैं, लेकिन पिछले कुछ समय से भू-राजनीतिक बदलावों के कारण उनमें तनाव देखने को मिल रहा है।
- अलिपोव ने रूस के चीन का जूनियर पार्टनर बनने की अटकलों को भी खारिज किया था। उन्होंने कहा था कि रूस कभी भी किसी का जूनियर पार्टनर नहीं रहा है।
- रक्षा सहयोग पर अमेरिकी और रूसी नजरिए के फर्क पर जोर देते हुए उन्होंने कहा था, कभी-कभी भारत के साथ अमेरिकी सहयोग के बारे में पढ़ना बहुत रोचक लगता है। अडवांस्ड टेक्नॉलजी और टेक्नॉलजी ट्रांसफर पर जो कुछ हम ऑफर करते हैं, वैसा कुछ वे नहीं देते। हम टेक्नॉलजी ट्रांसफर को अपनी पॉलिसी से नहीं जोड़ते । हमारे प्रॉजेक्ट भारत की 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' नीतियों के पूरक के तौर पर काम करते हैं। पश्चिम ऐसा नहीं करता ।
भारत की दुिविधा
अलिपोव की बात पहले भले ही सच हो, लेकिन इधर अमेरिका में रूख में टेक्नॉलजी को लेकर बदलाव आया है। वह भारत को अत्याधुनिक डिफेंस टेक्नॉलजी की पेशकश करने जा रहा है। अमेरिकी * अगर युद्ध राष्ट्रपति जो बाइडन और प्रधानमंत्री नरेंद्र तेज होता है तो मोदी ने मई 2022 में इनिशटिव ऑन दुनिया भर में क्रिटिकल एंड इमर्जिंग टेक्नॉलजी का महंगाई दर एलान किया था । इस पर हाल में अमल बढ़ेगी, जो पहले शुरू हुआ है। इससे दोनों देशों के बीच को- ही काफी ऊंची प्रोडक्शन और को-डिवेलपमेंट के लिए है। इससे तकनीकी सहयोग को बढ़ावा देने वाले नए ग्लोबल इकॉनमी द्विपक्षीय डिफेंस इंडस्ट्रियल कोऑपरेशन पर भी खराब का रास्ता साफ हो रहा है। लेकिन भारत असर होगा। अपने पारंपरिक डिफेंस पार्टनर रूस को नहीं ऐसी स्थिति खोना चाहता ।
पाक से करीबी का सवाल
दिलचस्प है कि अलिपोव ने एक तरफ आश्वस्त किया कि पाकिस्तान के साथ रूस ऐसा कोई समझौता या पहल नहीं करेगा, जिससे भारत के साथ उसके रिश्तों पर आंच आए। लेकिन इसके साथ यह भी बताया, हम (रूस) पाकिस्तान के साथ अपनी आर्थिक साझेदारी का विस्तार करना चाहते हैं।
- हाल के वर्षों में पाकिस्तान और रूस दोनों तरफ से आपसी रिश्ते मजबूत करने की इच्छा दिखी है। लेकिन ऐसे समय जब पाकिस्तान अभूतपूर्व आर्थिक संकट से गुजर रहा है, रूस के साथ दोस्ती गांठना उसकी प्राथमिकताओं में शामिल नहीं हो सकता।
- यह समझना भी मुश्किल है कि जब चीन जैसा दोस्त, जो हर मुश्किल में पाकिस्तान के साथ खड़ा होने का दावा करता आया है, वह भी लंबी-चौड़ी घोषणाओं के बावजूद पड़ोसी देश की खास मदद नहीं कर सका, तब पाकिस्तान के साथ रूस किस तरह की आर्थिक साझेदारी करना चाहता है।
संतुलित विदेश नीति
बहरहाल, विदेश नीति का मतलब ही है संकेत देना और अलिपोव भी भारत को संकेत ही दे रहे हैं कि रूस अहम तकनीक साझा करते हुए ऐतिहासिक तौर पर भारत के साथ खड़ा रहा है और आज भी उसे चीन के बराबर का दर्जा देता है। लेकिन अगर वह पाकिस्तान के साथ रिश्ते बनाता है तो भारत को बुरा नहीं मानना चाहिए।
- भारत ने भी रूस के साथ अपने रिश्तों को कभी चीन या पाकिस्तान से जोड़कर नहीं देखा है । अतीत में रूसी नीति-निर्माता दिल्ली आकर भारत के हिंद-प्रशांत को अपने सामरिक चश्मे से देखने या क्वाड का सदस्य बनने पर खुला एतराज जता चुके हैं। इन सबके बीच भारत ने हमेशा यह सतर्कता बनाए रखी कि रूस और पश्चिम से उसके संबंधों में संतुलन बिगड़ने न पाए।
- यूक्रेन पर रूसी हमले को साल भर का वक्त होने को आया, लेकिन भारत ने इसकी अभी तक खुलकर निंदा नहीं की है। सच तो यह है कि पिछले कुछ महीनों में भारत ने रेकॉर्ड मात्रा में रूसी कच्चा तेल खरीदा है।
- कूटनीतिक संतुलन बनाए रखने में भारत की लगभग पूर्ण सफलता का प्रमाण अमेरिका की ओर से आए उन हालिया बयानों को माना जा सकता है, जिसमें कहा गया कि निकट भविष्य में भारत के खिलाफ प्रतिबंध लगाने का उसका कोई इरादा नहीं है।
यह कैसा विरोधाभास
इसमें दो राय नहीं कि आज भारत की स्वतंत्र विदेश नीति के सामने यूक्रेन पर रूस के हमले की वजह से चुनौती बढ़ी है। हथियारों के मामले में रूस पर निर्भरता के चलते भी भारत की परेशानी बढ़ी है। खासतौर पर चीन के साथ भारत के सीमा विवाद की वजह से । इसमें भारत के साथ रूस का खड़ा होना मुश्किल है। इन सबके बीच भारत चाहता है कि जी- 20 की उसकी अध्यक्षता निर्णायक और ठोस उपलब्धियों के लिए जानी जाए। देखना होगा कि यूक्रेन पर रूस के हमला तेज करने पर उसे महत्वाकांक्षी वैश्विक अजेंडा को आकार देने की स्थिति में रहने देते हैं या नहीं।

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